मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ | मृच्छकटिकम्
( इति परिक्रामति )
वसन्तसेना—हञ्जे ! इमं दाव चित्तफलं मम सअणीए ठाविअ तालवेण्टअं गेण्हिअ लहु आअच्छ । (हञ्जे ! इदं तावत् चित्रफलकं मम शयनीये स्थापयित्वा तालवृत्तकं गृहीत्वा लघु आगच्छ । )
उसमें नहीं घुसा; नरपतिबले = राजा के सिपाहियों के, पार्श्वयाते=समीप में आ जाने पर, गृहदारुवत् = मकान में लगे लकड़ी के खम्भों के समान अर्थात् निश्चल, स्थितम्=खड़ा हो गया, एवम्प्रायैः=इसी प्रकार के, व्यवसितशतै=सैंकड़ों, प्रयासों=कार्यों के द्वारा, निशा=रात को, दिवसीकृता=दिन बना दिया ॥ ३ ॥
अर्थ—( मैंने ) अपने परिवारवालों से बातचीत करते हुये किसी व्यक्ति की उपेक्षा कर दी ( वहाँ चोरी नहीं की )। कहीं पर केवल स्त्री को मालिक देखकर उस घर को भी छोड़ दिया । ( वहाँ भी चोरी नहीं की । ) राजा के सिपाहियों के पास में आ जाने पर मकान में लगे हुये लकड़ी के खम्भे के समान निश्चल खड़ा हो गया । इस प्रकार के सैकड़ों कार्यों से रात को दिन बना दिया ॥ ३ ॥
( ऐसा कहकर घूमता है । )
टीका—मया—इति गद्यस्थेनात्रापि अन्वयः, परिजनकथासक्तः = परिवारिक-जनैः, भृत्यादिजनैः वा सह वार्त्तालापे संलग्नः, कश्चित् नरः=कोपि पुरुषः, समुपेक्षितः=उपेक्षाविषयीकृतः, तत्र चौर्यं न कृतमिति भावः; क्वचिदपि=कुत्रचित् च, गृहम्=भवनम्, नारीनाथम् = स्त्रीमात्ररक्षितम्, निरीक्ष्य=अवलोक्य, विवर्जितम्=परित्यक्तम्, तत्रापि चौर्यं न कृतमिति भावः, नरपतिबले=राजपुरुषसमुदाये, पार्श्वयाते = समीपागते सति, गृहदारुवत् = भवने आधारतया निर्मितकाष्ठस्तम्भ इव, स्थितम्=अवस्थितम्; एवम्प्रायैः=एवम्भूतैः, व्यवसितशतैः=व्यापाराणाम्, प्रयासानां वा शतैः=अगणितैः, निशा=रात्रिः, दिवसीकृता=अदिवसः अपि दिवसवत् कृता। अत्र काव्यलिङ्गम्, अलंकारः हरिणीवृत्तम् ॥ ३ ॥
विमर्श—नारीनाथम् – नारी मात्र है नाथ=सहायक या रक्षक जिसकी । गृहदारुवत् – गृह = गृह में लगाये गये, दारु = स्तम्भादि के समान । व्यवसितशतैः—व्यवसितानां शतानि, यहाँ शत के बाद बहुवचन विवक्षित है । दिवसीकृता—अदिवसः दिवसः कृतः – अभूत-तद्भाव अर्थ में च्वि-प्रत्ययान्तरूप है । निशा को दिन बनाना रूपी कार्य के लिये सैंकड़ों उपायों का कारणरूप से उल्लेख होने से काव्यलिङ्ग अलंकार है और हरिणी छन्द है—न स म र स ला गः षड्वेदैर्हयैर्हरिणी मता ॥ ३ ॥
अर्थ—वसन्तसेना—चेटि ! इस चित्रफलक ( तस्वीर ) को मेरे शयनकक्ष में रखकर पंखा लेकर जल्दी से आ जाओ ।