मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २३६
मदनिका—जं अज्जआ आणवेदि । ( यदार्या आज्ञापयति । ) (इति फलकं गृहीत्वा निष्क्रान्ता । )
शर्विलकः—इदं वसन्तसेनाया गृहम् । तद्यावत् प्रविशामि । ( प्रविश्य ) क्व नु मया मदनिका द्रष्टव्या ?
( ततः प्रविशति तालवृन्तहस्ता मदनिका । )
शर्विलकः—( दृष्ट्वा ) अये इयं मदनिका—
मदनमपि गुणैर्विशेषयन्ती
रतिरिव मूर्त्तिमती विभाति येयम् ।
मम हृदयमनङ्गवह्नितप्तं
भृशमिव चन्दनशीतलं करोति ॥ ४ ॥
मदनिके !
मदनिका—आर्या की जैसी आज्ञा । ( चित्रफलक लेकर चली जाती है । )
शर्विलक—यह वसन्तसेना का घर है । तो इसमें प्रवेश करता हूँ । ( प्रवेश करके ) मुझे कहाँ मदनिका को देखना ( ढूढ़ना ) चाहिये ।
( इसके बाद ताड़ का पंखा लिये हुये मदनिका प्रवेश करती है । )
अन्वय—या, गुणैः, मदनम्, अपि, विशेषयन्ती, मूर्तिमती, रतिः, इव, विभाति, ( सा ) इयम्, अनङ्गवह्नितप्तम्, मम, हृदयम्, भृशम्, चन्दनशीतलम्, इव, करोति ॥ ४ ॥
शब्दार्थ—या=जो, गुणैः = सौन्दर्यादि विशेषताओं से, मदनम्=कामदेव को, अपि=भी, विशेषयन्ती=जीतती हुई, मूर्तिमती=शरीर-धारिणी, रतिः=कामदेव की पत्नी के, इव=समान, विभाति=शोभित हो रही है, अच्छी लग रही है; ( सा=वही ), इयम्=यह, अनङ्गवह्नितप्तम्=कामरूपी अग्नि से सन्तप्त, मम=मेरे, हृदयम् =चित्त को, भृशम्=बहुत अधिक, चन्दनशीतलम्=चन्दन के समान शीतल=ठण्डा, इव=सा, करोति=कर रही है ॥ ४ ॥
अर्थ—शर्विलक—( देखकर ) अरे यह मदनिका !
जो ( अपने सौन्दर्यादि ) गुणों के द्वारा कामदेव को भी जीतती हुई, शरीर-धारिणी, रति के समान शोभित हो रही है; वही यह कामाग्नि से सन्तप्त मेरे हृदय को चन्दन के समान अत्यधिक शीतल कर रही है ॥ ४ ॥
मदनिके !
टीका—स्वाभिलषितां दयितां मदनिकां विलोक्य तस्याः सौन्दर्यवर्णनपूर्वकं स्वहृदयभावं प्रकटयति -मदनमपीति । या = पुरोवर्तिनी, मदनिकेत्यर्थः, गुणैः = सौन्दर्यादिवैशिष्ट्यैः, मदनम् अपि=कामदेवम् अपि, अन्येषां तु का कथा, विशेष-