मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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मदनिका—(दृष्ट्वा) अम्मो ! कथं सव्विलओ ? सव्विलअ ! साअदं ते । कहिं तुमं ? । ( अहो कथं शर्विलकः ! शर्विलक ? स्वागतं ते । कस्मिन् त्वम् ? )
शर्विलकः—कथयिष्यामि ।
( इति सानुरागमन्योन्यं पश्यतः । )
वसन्तसेना—चिरअदि मदणिआ, ता कहिं णु क्खु सा ? ( गवाक्षकेण दृष्ट्वा ) कधं एसा केणावि पुरिसकेण सह मन्तअन्ती चिट्ठदि । जधा अदिसिणिद्धाए णिच्चलदिट्ठिए आपिवन्ती विअ एदं णिज्झाअदि, तधा तक्केमि, एसो सो जणो एदं इच्छदि अभुजिस्सं कादुं । ता रमदु रमदु । मा कस्सावि पीदिच्छेदो भोदु । ण क्खु सद्दाविस्सं । ( चिरयति मदनिका । तत् कस्मिन् नु खलु सा ? कथमेषा केनापि पुरुषकेण सह मन्त्रयन्ती तिष्ठति । यथा अतिस्निग्धया निश्चलदृष्ट्या आपिबन्तीव एतं निध्यायति तथा तर्कयामि—एष स जन एनामिच्छति अभुजिष्यां कर्तुम् । तत् रमतां रमताम् । मा कस्यापि प्रीतिच्छेदो भवतु । न खलु शब्दापयिष्यामि । )
यन्ती=जयन्ती, आकर्षयन्ती वा, मूर्तिमती = शरीरधारिणी, रतिः = कामदेवभार्या, इव= यथा, विभाति= सुशोभते, ( सा= पूर्वोक्तविशेषणविशिष्टा ), इयम्= दृश्यमाना, अनङ्गवह्नितप्तम्= कामानलसन्तप्तम्, मम= शर्विलकस्य, हृदयम्= चित्तम्, भृशम्= अत्यधिकम्, चन्दनशीतलम् = चन्दनानुलेपवत् शीतस्पर्शम्, इव= यथा, करोति= विदधाति। ॥ ४ ॥
विमर्श—मदनमपि-- जिसने कामदेव को भी जीत लिया उसके लिये मुझ जैसे को आकृष्ट करना आश्चर्य की बात नहीं है । विशेषयन्ती= जीतती हुयी, अथवा मोहित करती हुयी । चन्दनशीतलम्= चन्दनम् इव शीतलम् । यहाँ पूर्वार्द्ध में मदनिका की मूर्तिमती रति के रूप में सम्भावना के कारण द्रव्योत्प्रेक्षा तथा विना चन्दन के शीतल होने वाले हृदय में चन्दनशीलता की सम्भावना के कारण गुणोत्प्रेक्षा है । पुष्पिताग्रा छन्द है ॥ ४ ॥
अर्थ—मदनिका-- ( देखकर ) अहो क्या शर्विलक ? शर्विलक ! तुम्हारा स्वागत है । तुम कहाँ ?
शर्विलक— बताऊँगा ।
( इस प्रकार दोनों प्रेम से एक दूसरे को देखते हैं । )
वसन्तसेना— मदनिका देर लगा रही है । तो कहाँ चली गई होगी ? ( झरोखे से देखकर ) क्या, यह तो किसी प्रिय पुरुष से बातचीत करती हुई बैठी है । अत्यन्त प्रेम से युक्त, निश्चल दृष्टि से इस पुरुष का पान-सा करती हुई, जिस प्रकार से देख रही है उससे मैं यह अनुमान कर रही हूँ कि यह वही पुरुष है जो