मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २४१
मदनिका--सव्विलअ ! कहेहि । ( शर्विलक ! कथय । )
( शर्विलकः--सशङ्कं दिशोऽवलोकयति । )
मदनिका--सव्विलअ ! किं ण्णेदं ? ससङ्को विअ लक्खीअसि । ( शर्विलक ! किं न्विदम् ? सशङ्क इव लक्ष्यसे । )
शर्विलकः--वक्ष्ये त्वां किञ्चित् रहस्यम्, तद्विविक्तमिदम् ?
मदनिका--अध इं ? ( अथ किम् ? )
वसन्तसेना--कधं परमरहस्सं । ता ण सुणिस्सं । ( कथं परमरहस्यम् ? तत् न श्रोष्यामि । )
शर्विलकः--मदनिके ! किं वसन्तसेना मोक्ष्यति त्वां निष्क्रयेण ?
वसन्तसेना--कधं मम सम्बन्धिणी कथा । ता सुणिस्सं इमिणा गबक्खण ओवारिदसरीरा । ( कथं मम सम्बन्धिनी कथा । तत् श्रोष्यामि अनेन गवाक्षेण अपवारितशरीरा । )
मदनिका--सव्विलअ ! भणिदा मए अज्जआ । तदो भणादि, जइ मम सच्छन्दो, तदा विणा अत्यं सव्वं परिजनं अभुजिस्सं करइस्सं । अध सव्विलअ ! कुदो दे एत्तिओ विहवो, जेण मं अज्जआसआसादो मोआ-इस्सि । ( शर्विलक ! भणिता मया आर्या; ततो भणति--यदि मम स्वच्छन्दः
इसे [ मदनिका को ] दासी के कार्य से मुक्त कराना चाहता है। तो रमण करे, रमण करे [ आनन्द उठाये ], किसी का भी प्रीतिच्छेद [ प्रेमव्यापारभंग ] न हो । [ अतः इसे ] नहीं बुलाऊँगी ।
मदनिका--शर्विलक ! बताओ ।
( शर्विलक शंकाभरी दृष्टि से चारों ओर देखता है । )
मदनिका--शर्विलक ! यह क्या है ? तुम शंकाग्रस्त से दिखाई दे रहो ।
शर्विलक--तुम्हें कुछ रहस्य=गुप्त बातें बताऊँगा । तो क्या यह एकान्त स्थान है ?
मदनिका--और क्या ?
वसन्तसेना--क्या बहुत गोपनीय बात है । तो नहीं सुनूंगी ।
शर्विलक--मदनिके ! क्या वसन्तसेना धन के बदले तुम्हें मुक्त कर देगी ?
वसन्तसेना--क्या मेरे विषय में बात है ? तो शरीर छिपाकर इस झरोखे से बात सुनूंगी ।
मदनिका--शर्विलक ! मैंने आर्या ( वसन्तसेना ) से कहा था, तो उन्होंने उत्तर दिया था-'यदि मेरी स्वतन्त्रता ( शक्ति ) होती तब तो बिना धन लिये ही
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