भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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चतुर्थोऽङ्कः २४३

वसन्तसेना--पसण्णा से आकिदी, साहसकम्मदाए उण उव्वेअणीआ । प्रसन्ना अस्य आकृतिः, साहसकर्मतया पुनरुद्वेजनीया । )

मदनिका--सव्विलअ ! इत्थीकल्लवत्तस्स कारणेण उहअं पि संसए विणिक्खित्तं । ( शर्विलक ! स्त्रीकल्यवर्त्तस्य कारणेन उभयमपि संशये विनि- क्षिप्तम् ! )

शर्विलकः--किं किम् ? ।

मदनिका--सरीरं चारित्तं च । ( शरीरं चारित्रञ्च )

शर्विलकः--अपण्डिते ! साहसे श्रीः प्रतिवसति ।

मदनिका--सव्विलअ ! अखण्डिदचारित्तोसि । ता ण क्खु ते मम कार- णादो साहसं करन्तेण अच्चन्तविरुद्धं आचरिदं ? ( शर्विलक ! अखण्डित- चारित्रोऽसि, तत् न खलु त्वया मम कारणात् साहसं कुर्वता अत्यन्तविरुद्धमा- चरितम् ? )

शर्विलकः--

नो मुष्णाम्यबलां विभूषणवतीं फुल्लामिवाहं लतां


वचन के अनुसार बलपूर्वक अथवा अविचारपूर्वक जो किया जाय वह 'साहस' कहा जाता है ॥ ५ ॥

अर्थ--वसन्तसेना--इसकी आकृति प्रसन्न है किन्तु दुःसाहसिक कर्म के कारण उद्वेग पैदा करनेवाली है ।

मदनिका--शर्विलक ! कलेवातुल्य स्त्री के कारण तुमने दोनों को ही सन्देह में डाल दिया ।

शर्विलक--किस-किस को ?

मदनिका--शरीर को और चरित्र को ।

शर्विलक--अरे मूर्ख ! साहस में ही लक्ष्मी निवास करती है ।

मदनिका--तुम अखण्डित [ निर्दोष ] चरित्रवाले हो । इसलिये मेरे कारण साहस करते हुये तुमने अत्यन्त विरुद्ध आचरण नहीं किया है ? [ अर्थात् अवश्य किया है । ]

टीका--प्रसन्ना=प्रसाद्युक्ता, शोभना वा, साहसकर्मतया=साहसम्=चौर्यादिकं कर्म यस्य सः, तस्य भावस्तया, उद्वेजयतीति कर्तरि अनीयर्, स्त्रीकल्यवर्तः=स्त्री-रूपी कल्यवर्तः, तस्य, अपण्डिते = अविदुषि, अज्ञे, श्रीः = लक्ष्मीः, अखण्डितम्, चारित्रम्=वृत्तम्, यस्य सः, अत्यन्तविरुद्धम्=लोकशास्त्रमर्यादाप्रतिकूलम्, आचरितम्=कृतम् । अत्र काकुः, अवश्यमेवाचरितमितिभावः ।

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