भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२४४ | मृच्छकटिकम्

विप्रस्वं न हरामि काञ्चनमथो यज्ञार्थमभ्युद्धृतम्। धात्र्युत्सङ्गतं हरामि न तथा बालं धनार्थी क्वचित् कार्य्याकार्य्यविचारिणी मम मतिश्चौर्य्येऽपि नित्यं स्थिता ॥ ६॥

**अन्वयः—**धनार्थी, अहम्, फुल्लाम्, लताम्, इव, विभूषणवतीम्, अबलाम्, नो, मुष्णामि, विप्रस्वम्, अथो, यज्ञार्थम्, अभ्युद्धृतम्, काञ्चनम्, न, हरामि, तथा, क्वचित्, धात्र्युत्सङ्गतम्, बालम्, न हरामि, चौर्ये, अपि मम, मतिः, नित्यम्, कार्या-कार्यविचारिणी, [ एव ], स्थिता ॥ ६ ॥

**शब्दार्थ—**धनार्थी = धन पाने का इच्छुक, अहम्=मैं शर्विलक, फुल्लाम्=फूली हुई, फूलों से युक्त, लताम्=लता के, इव=समान, विभूषणवतीम्=आभूषणों से सजी हुई, अबलाम्=स्त्री को, नो=नहीं, मुष्णामि=चुराता हूँ अर्थात् लूटता हूँ, विप्रस्वम्=ब्राह्मण का धन, ( नहीं चुराता हूँ ), अथो=और, यज्ञार्थम्=यज्ञ के लिये, अभ्युद्धृतम्=सुरक्षित रखे गये, काञ्चनम्=स्वर्णादि को, न=नहीं, हरामि=चुराता हूँ, तथा=और, क्वचित्=कहीं भी, धात्र्युत्सङ्गतम्=धाय की गोद में स्थित, बालम्=बच्चे को, न = नहीं, हरामि = चुराता हूँ, छीनता हूँ, चौर्ये = चोरी में, अपि=भी, मम=मेरी, मतिः=बुद्धि, नित्यम्=सदैव, कार्याकार्यविचारिणी=कर्तव्य और अकर्तव्य का विचार करनेवाली, ही, स्थिता=रहती है ॥ ६ ॥

अर्थ—शर्विलक— धन का इच्छुक मैं, फूली हुयी लता के समान आभूषणों से सजी हुई स्त्री को नहीं चुराता हूँ। (उसके आभूषण नहीं लूटता हूँ।) ब्राह्मण के धन को तथा यज्ञादि कार्यों के लिये संचित स्वर्ण को भी नहीं चुराता हूँ। कहीं भी धाय की गोद में स्थित बच्चे को नहीं चुराता हूँ (लेकर भागता हूँ)। चोरी में भी मेरी बुद्धि सदैव कर्तव्य तथा अकर्तव्य [ उचित और अनुचित ] का विचार करने वाली (ही) रहती है। अतः सोच समझकर ही मैंने चोरी की है ॥ ६ ॥

**टीका—**मदनिकयाधिक्षिप्तः विवेकानुगताचरणैः स्वकीयं निर्दोषत्वं साधयति—नो इति। धनार्थी=परकीयधनलिप्सुः, अहम् = शर्विलकः, फुल्लाम् = विकसितपुष्पयुक्ताम्, लताम्=वल्लीम् इव, विभूषणवतीम्=अलङ्कारविभूषिताम्, अबलाम्=नारीम्, तद्धनमित्यर्थः नो=नैव, मुष्णामि=चोरयामि; विप्रस्वम्=ब्राह्मणधनम्, अथो=तथा, यज्ञार्थम्=क्रत्वर्थम्, अभ्युद्धृतम्=निःसार्य सञ्चितम्, सुरक्षितम्, काञ्चनम्=स्वर्णम्, न=नैव, हरामि=चोरयामि; क्वचित्=क्वापि, धात्र्याः=पालनकर्त्र्याः, उत्संगे=अङ्के, गतम्=स्थितम्=विद्यमानम् बालम्=शिशुम्, न=नैव, हरामि=चोरयामि, चौर्ये=चौरकर्मणि, अपि, मे=शर्विलकस्य, मतिः=बुद्धिः, नित्यम् = सर्वदा, कार्याकार्यविचारिणी = कर्त्तव्याकर्त्तव्यविवेकिनी, स्थिता = तिष्ठति। चौर्यादिरूपमसत्कार्यं