भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२७६ मृच्छकटिकम्

सुहोबविट्टो णिद्दाअदि दोवारिओ । सदहिणा कलमोदणेण पलोहिदा ण भक्खन्ति वाअसा वलिं सुधासवण्णदाए । आदिसदु भोदी । ( आश्चर्यं भोः ! इहाऽपि प्रथमे प्रकोष्ठे शशि-शङ्ख-मृणालसच्छायाः, विनिहितचूर्णमुष्टि-पाण्डुराः विविध-रत्न-प्रतिबद्ध-काञ्चन-सोपान-शोभिताः, प्रासादपङ्क्तयः, अवलम्बितमुक्तादामभिः स्फटिकवातायनमुखचन्द्रैर्निध्यायन्तीव उज्जयिनीम् । श्रोत्रिय इव सुखोपविष्टो निद्राति दौवारिकः । सदध्ना कलमौदनेन प्रलोभिता न भक्षयन्ति वायसा बलिं सुधासवर्णतया । आदिशतु भवती )


**शब्दार्थ—**शशिशंखमृणाल-सच्छाया = चन्द्रमा, शंख एवं मृणाल के समान कान्तिवाली, विनिहितचूर्णमुष्टिपाण्डुरा = मुट्ठी भर आटा रखने से सफेद, विविध-रत्न-प्रतिबद्ध-कांचन-सोपान-शोभिताः = अनेक प्रकार के रत्नों से जड़ी हुयी सोने की सीढ़ियों से सुशोभित, प्रासादपङ्क्तयः = महलों की पङ्क्तियाँ ( कतारें ), अवलम्बितमुक्तादामभिः = लटकती हुई मोतियों की मालाओं से युक्त, स्फटिक-वातायन-मुखचन्द्रैः = स्फटिक मणि से बने हुये झरोखे रूपी मुखचन्द्रों से, उज्जयिनीम् = उज्जायिनी नगरी को, निध्यायन्ति इव = एकाग्रचित्त से मानों देख रहीं हैं । श्रोत्रियः = वेदपाठी, निद्राति = औंघ रहा है, सदध्ना = दही के साथ, कलमौदनेन = 'कलम' नामक चावलों के भात से, प्रलोभिताः = आकृष्ट किये गये, वायसाः = कौवे, सुधा-सवर्णतया = चूने के समान होने के कारण, बलिम् = दहीमिश्रित बलि के अन्न को, न भक्षयन्ति = नहीं खाते हैं ।

अर्थ-विदूषक—(प्रवेश करके देख कर) अरे आश्चर्य है ! इधर पहले प्रकोष्ठ में भी चन्द्रमा, शंख और कमलनाल के समान कान्तिवाली, समान मात्रा में रखे गये ( चूना अथवा अन्न के ) चूर्ण की मुट्ठियों से धवल वर्णवाली, अनेक प्रकार के रत्नों से जड़ी गयीं सोने की सीढ़ियों से युक्त, विशाल भवनों की श्रेणियां, लटकनेवाली मुक्तामालाओं से युक्त, स्फटिक मणि के बने झरोखे रूपी मुखचन्द्रों से मानों उज्जयिनी नगरी को ध्यान से देख रहीं हैं । आनन्दपूर्वक बैठा हुआ द्वारपाल श्रोत्रिय ( वेदादिपाठकर्ता ) के समान ऊँघ सा रहा है, सो रहा है । दही में सने हुये कलम ( उत्कृष्ट ) चावल के भात से ललचाये गये भी कौवे बलि ( बलिहेतु प्रस्तुत ) को चूने के समान सफेद होने के कारण नहीं खा रहे हैं । ( दही की सफेदी भात में कौवों को चूना मिला होने का भ्रम हो रहा है । अतः वे नहीं खा रहे हैं । ) श्रीमती ! आप आदेश करें ।

टीका— शशि-शङ्खमृणाल-सच्छायाः—चन्द्रस्य, कम्बोः, विसस्य च सच्छायाः = समाना कान्तिर्यासां ताः, विनिहितैः = स्थापितैः, तुल्यरूपेण प्रकीर्णैः, चूर्णस्य = सुधाचूर्णस्य, अन्नादीनां श्वेतचूर्णस्य, मुष्टिभिः = परिमाणविशेषैः, पाण्डुराः = शुभ्रवर्णाः