भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२८० मृच्छकटिकम्

विदूषकः--( प्रविश्यावलोक्य च ) हो ही भोः ! इध वि चउट्ठे पओट्ठे जुवदिकर-ताड़िदा जलधरा विअ गम्भीरं णदन्ति मुदङ्गा । हीणपुण्णाओ विअ गअणादो तारआओ णिदड़न्ति कंसतालआ । महुअर-विरुअ-महुरं वज्जदि वंसो । इअं अवरा ईसाप्पणअ-कुविद-कामिणी विअ अङ्कारोविदा कररुह-परामरिसेण सारिज्जदि वीणा । इमाओ अवराओ कुसुम-रस-मत्ताओ विअ महुअरिओ अदिमहुरं पगीदाओ गणिआदारिआओ णच्ची-अन्ति, णट्टअं पढीअन्ति ससिङ्गारओ । ओवग्गिदा गवक्खेसु वादं गेण्हन्ति सलिल-गग्गरीओ । आदिसदु भोदी । ( आश्चर्यं भोः ! इहाऽपि चतुर्थे प्रकोष्ठे युवति-कर-ताडिता जलधरा इव गम्भीरं नदन्ति मृदङ्गाः । क्षीणपुण्या इव गगनात्तारका निपतन्ति कांस्यतालाः । मधुकर-विरुत-मधुरं वाद्यते वंशः । इयमपरा ईर्ष्या-प्रणयकुपितकामिनीव अङ्कारोपिता कररुहपरामर्शेन सार्यते वीणा ।

शब्दार्थ-—युवतिकरताडिता = युवतियों के हाथों से बजाये गये, जलधरा इव=मेघों के समान, नदन्ति=आवाज कर रहे हैं; क्षीणपुण्याः=जिनके पुण्य समाप्त हो चुके हैं, तारका इव=ताराओं के समान, कांस्यतालाः=करताल, निपतन्ति=एक दूसरे के ऊपर गिर रहे हैं, मधुकर-विरुतमधुरम्=भौंरें की गुंजन के समान मधुर, वंश = बांस की बनी बांसुरी, वाद्यते=बजाई जा रही है। ईर्ष्याप्रणयकुपितकामिनी=दूसरी स्त्री की ईर्ष्या के कारण प्रणय में कुपित नायिका, इव=के समान, अंकारोपिता=गोद में रखी हुई, वीणा, कररुहस्पर्शेन=नाखूनों के स्पर्श से, सार्यते=सहलाई जा रही है, बजाई जा रही है, कुसुमरसमत्ताः=फूलों के रस से मदमाती, मधुकर्यः=भ्रमरियों के समान, प्रगीताः=गातीं हुई, गणिकादारिकाः=वेश्याओं की कन्यायें, नृत्यन्ति=नाँच रही है। सशृङ्गारम् = श्रृंगारसहित, पाठम् = संगीतादि का पाठ, पाठघन्ते=पढ़ाई जा रहीं हैं। गवाक्षेषु=झरोखों में, अपवलिगताः=झुकी रखी हुई, सलिलगर्गर्यः=पानी की गगरियां=झज्झर, वातम्=हवा, गृह्णन्ति=ले रहीं हैं।

अर्थ-विदूषकः- ( प्रवेश करके और देखकर ) अरे ! आश्चर्य है । इधर चौथे प्रकोष्ठ ( भवनखण्ड ) में भी, युवतियों के हाथों से बजाये जाते हुये मृदंग मेघों के समान आवाज कर रहे हैं । पुण्य समाप्त हो जानेवाली ताराओं के समान करताल ( मंजीरे ) एक दूसरे पर गिर रहे हैं । भौंरे के गुंजन के समान मधुर वंशी बज रही है । ( दूसरी स्त्री के साथ सम्पर्क करने से उत्पन्न ) ईर्ष्या के कारण प्रणय में कुपित स्त्री के समान गोद में रखी गयी यह वीणा नाखूनों के स्पर्श से सहलाई ( बजाई ) जा रही है । पुष्पों के रसपान करने से मतवाली भौरियों के समान अत्यन्त मधुर गाती हुईं ये गणिकाकन्यायें इधर उधर घूम रहीं हैं । श्रृङ्गार