मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२८२ मृच्छकटिकम्
तुम्हे बन्धुला णाम ? (आश्चर्यं भोः ! इहाऽपि पञ्चमे प्रकोष्ठे अयं दरिद्र-जन-लोभोत्पादनकरः आहरति उपचितो हिङ्गुतैलन्धः । विविध-सुरभि-धूमो-द्गारैः नित्यं सन्ताप्यमानं निःश्वसितीव महानसं द्वारमुखैः । अधिकमुत्सुकायते मां साध्यमानबहुविध-भक्ष्य-भोजनगन्धः । अयमपरः पटच्चरमिव पेशिं धावति रूपिदारकः । बहुविधाहार-विकारमुपसाधयति सूपकारः । बध्यन्ते मोदकाः, पच्यन्ते च पूपकाः । अपि इदानीमिह वर्द्धितं भुङ्क्ष्व इति पादोदकं लप्स्ये ? इह गन्धर्व्वाप्सरोगणैरिव विविधाsubकारशोभितैः गणिकाजनैः बन्धुलैश्च यत्सत्यं स्वर्गीयते इदं
ले रहा है। **साध्यमानबहुविध-भक्ष्य-भोजन-गन्धः=**पकाये जाते हुये अनेक प्रकार के भक्षणीय भोजनों की गन्ध, **माम्=**मुझ विदूषक को, **उत्सुकायते=**उत्सुक कर रही है। **पटच्चरम् इव=**पुराने वस्त्रखण्ड के समान, **हतपशूदरपेशिम्=**मारे गये पशुओं की अंतड़ियों को, **रूपिदारकः=**कसाई, **धावति=**धो रहा है, स्वच्छ कर रहा है। **सूपकारः=**रसोइया, **बहुविधाहार-विकारम्=**अनेक प्रकार के भोजन, **उपसाधयति=**पका रहा है। **बध्यन्ते=**बाँधे जा रहे हैं। **अपूपकाः=**मालपुआ, **पच्यन्ते=**पकाये जा रहे हैं। **वर्द्धितम्=**उत्कृष्ट, **भुङ्क्ष्व=**खाइये, **इति=**इस लिये, **पादोदकम्=**पैर धोने के लिये पानी, **लप्स्ये=**प्राप्त कर सकूंगा । **गन्धर्वाप्सरोगणैः इव=**गन्धर्वों एवम् अप्सराओं के समुदायों के सामन, **विविधालंकारशोभितैः=**अनेक प्रकार के आभूषणों से शोभित, गणिकाजनैः = गणिका लोगों से, बन्धुलैश्च = बन्धुलों से, **स्वर्गीयते=**स्वर्ग के समान हो रहा है।
अर्थ-विदूषक- (प्रवेश करके और देखकर) अरे आश्चर्य है, आश्चर्य ! यहाँ पाँचवें प्रकोष्ठ (भवनखण्ड) में भी गरीबों को ललचाने वाली तीव्र हींग-मिश्रित तैल की गन्ध [मुझे] अपनी ओर आकृष्ट कर रही है। सदैव आग से जलता हुआ (अग्नियुक्त) रसोई घर अनेक प्रकार की गन्धों से युक्त धुंये को प्रकट करने वाले द्वाररूपी मुखों से मानो उच्छ्वास ले रहा है, [अपना कष्ट व्यक्त कर रहा है।] पकाये जाते हुये अनेक प्रकार के भोज्य पदार्थों की गन्ध मुझे अधिक उत्सुक बना रही है। यह कसाई जीर्ण वस्त्रखण्डों के समान मांस-पेशियाँ (मृत पशु के मांसखण्डों) को धो रहा है। रसोइया अनेक प्रकार के भोजन पका रहा है। लड्डू बाँधे जा रहे हैं, मालपुए पकाये जा रहे हैं। (अपने आप में) 'अब आप (विदूषक) इधर आइये, बढ़िया भोजन करिये [ऐसी प्रार्थना कर किसी से] मैं पैर धोने के लिये जल पा सकूंगा ? (दूसरी ओर देखकर) यहाँ गन्धर्वों एवम् अप्सराओं की भाँति विविध आभूषणों से सुशोभित गणिकाओं और बन्धुलों के कारण यह घर वास्तव में स्वर्ग के समान प्रतीत हो