मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचतुर्थोऽङ्कः २८५.
जणेहिं जे मुक्का आसआ ताइं पिअन्ति । आदिसदु भोदी । (आश्चर्यं भोः ! इहाऽपि षष्ठे प्रकोष्ठे अमूनि तावत् सुवर्णरत्नानां कर्मतोरणानि नील-रत्न-विनि-क्षिप्तानि इन्द्रायुधस्थानमिव दर्शयन्ति । वैदूर्य-मौक्तिक-प्रवाल-पुष्परागेन्द्र-नील-कर्केतरकपद्मराग-मरकतप्रभृतीन् रत्नविशेषान् अन्योन्यं विचारयन्ति शिल्पिनः । बध्यन्ते जातरूपैर्मणिक्यानि, घट्यन्ते सुवर्णालङ्काराः, रक्तसूत्रेण ग्रथ्यन्ते मौक्ति-काभरणानि, घृष्यन्ते धीरं वैदूर्याणि; छिद्यन्ते शङ्खाः, शाण्यन्ते प्रबालकाः, शोष्यन्ते आर्द्रकुङ्कुमप्रस्तराः, सार्य्यते कस्तूरिका, विशेषेण घृष्यते चन्दनरसः, संयोज्यन्ते गन्धयुक्तयः, दीयते मणिकाकामुकयोः सकर्पूरं ताम्बूलम्, अवलोक्यते सकटाक्षम्, प्रवर्त्तते हासः, पीयते च अनवरतं ससीत्कारं मदिरा । इमे चेटाः, इमाश्चेटिकाः,
शब्दार्थ—नीलरत्नविनिक्षिप्तानि = इन्द्रनीलमरकत आदि मणियों से जड़े हुये, सुवर्णरत्नानाम् = रत्नजटित सोने के, कर्मतोरणानि = कलाकृतियुक्त ( नक्काशी-दार ) बाहरी दरवाजे, इन्द्रायुधस्थानम् इव = इन्द्रधनुष के प्रदेश, या सौन्दर्य को, दर्शयन्ति = दिखा रहे हैं । शिल्पिनः = कारीगर लोग, वैदूर्य-मौक्तिक-प्रवाल-पुष्प-राग-इन्द्रनील-कर्केतरक-पद्मराग-मरकतप्रभृतीन् = वैदूर्य, मोती, मूंगा, पुखराज, इन्द्रनील, कर्केतरक, पद्मराग, मरकत आदि, रत्नविशेषान् = विशेष विशेष रत्नों के विषय में, विचारयन्ति = विचार करते हैं । जातरूपैः = सोने के द्वारा, बध्यन्ते = बांधे जा रहे हैं । घृष्यन्ते = घिसी जा रहीं हैं, तरासी जा रहीं हैं, आर्द्रकुंकुमप्रस्तराः = गीले कुंकुम के पत्थर, शोष्यन्ते = सुखाये जा रहे हैं । अवधीरित-पुत्रदारवृत्ताः = पुत्र एवं पत्नी की उपेक्षा करनेवाले, आसवकरकापीतः = मदिरा के प्यालों ( गिलासों ) में मदिरा पी चुकनेवाली, गणिकाजनैः = गणिकाओं द्वारा, मुक्ताः = पीकर छोड़ी गयीं ।
अर्थ—विदूषक—(प्रवेश करके और देखकर) अरे आश्चर्य है इस छठे प्रकोष्ठ ( भवन खण्ड ) में भी मरकत मणि से जटिल, सोने और रत्नों के ( बने हुये ) चित्रकलायुक्त ( नक्काशीदार ) तोरण इन्द्रधनुष की छटा दिखा रहे हैं । कारीगर ( जौहरी लोग ) वैदूर्य, मोती, मूंगा, पुष्पराज ( पुखराज ) इन्द्रनील, कर्केतरक, पद्मराग, तथा मरकत आदि रत्नों के विषय में परस्पर विचार विनिमय कर रहे हैं । सोने के साथ मणियाँ जड़ी जा रही हैं । सोने के गहने गढ़े जा रहे हैं । लाल सूत्रों में मोती के गहने गूंथे जा रहे हैं । वैदूर्य धीरे-धीरे घिसे जा रहे हैं । शंख छेदे जा रहे हैं । मूंगे शान द्वारा खरादे जा रहे हैं । गीली केशर की परतें सुखाई जा रहीं हैं । कस्तूरी (सूखने के लिये बार-बार) ऊपर नीचे की जा रही है । चन्दन का रस (सन्दल) विशेष रूप से घिसा जा रहा है । कई प्रकार की सुगन्धित वस्तुयें मिलाई जा रहीं है । गणिकाओं और कामुकों को कपूरयुक्त पान दिये जा रहे