भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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२६६ मृच्छकटिकम्

विदूषकः— (स्वगतम्) सुट्ठु उवलक्खिदं दुट्टविलासिणीए। (प्रकाशम्) अध इं। (सुष्ठु उपलक्षितं दुष्टविलासिन्या। अथ किम् ?)

वसन्तसेना— अये ! किमागमनप्रयोजनम् ?

विदूषकः— सुणादु भोदी। तत्तभवं चारुदत्तो सीसे अञ्जलिं कदुअ भोदिं विष्णवेदि। (शृणोतु भवती। तत्रभवान् चारुदत्तः शीर्षे अञ्जलिं कृत्वा भवतीं विज्ञापयति।)

वसन्तसेना— (अञ्जलि बद्ध्वा) किमाज्ञापयति ?

विदूषकः— मए तं सुवण्णभण्डअं विस्सम्भादो अत्तणकेरकेत्ति कदुअ जूदे हारिदं। सो अ सहिओ राजवात्थहारी ण जाणिअदि कहिं गदो त्ति। (मया तत् सुवर्णभाण्डं विस्रम्भादात्मीयमिति कृत्वा द्यूते हारितम्। स च सभिको राजवार्ताहारी न ज्ञायते कुत्र गत इति।)

चेटी— अज्जए ! दिट्ठिआ वड्ढसि। अज्जो जूदिअरो संवृत्तो। (आर्ये ! दिष्ट्या वर्द्धसे। आर्यो द्यूतकरः संवृत्तः।)

वसन्तसेना— (स्वगतम्) कथं चोरेण अवहिदं पि सोण्डोरदाए जूदे हारिदं त्ति भणादि। अदो ज्जेव कामीअदि। (कथं चौरेणापहृतमपि शौण्डीरतया द्यूते हारितमिति भणति। अत एव काम्यते।)


फलपरिपूर्णम् तम्=पूर्वोक्तम्, चारुदत्तरूपम् साधुवृक्षम्=सज्जनमहीरुहम्, सुहृदः=मित्राणि एव विहङ्गाः=पक्षिणः, सुखम्=सानन्दं यथा स्यात् तथा आश्रयन्ति=अवलम्बन्ते, किम् ? अत्र रूपकमलङ्कारः, उपजातिः वृत्तम् ॥ ३२ ॥

अर्थ—विदूषक— (अपने में) इस कुटिल वेश्या ने ठीक ही अनुमान किया है। (प्रकटरूप में) और क्या ? [अर्थात् मित्र अभी भी उनके साथ हैं।]

वसन्तसेना— अच्छा, आपके आने का उद्देश्य क्या है ?

विदूषक— आयें सुनिये, सम्माननीय चारुदत्त सिर पर अंजिल बाँध कर आपसे प्रार्थना करते हैं।

वसन्तसेना— (हाथ जोड़ कर) क्या आज्ञा देते हैं ?

विदूषक— मैं विश्वास करके अपना मानकर उस गहनों के पात्र को जुआ में हार गया हूँ। और राजाओं का सन्देश पहुँचाने वाला वह प्रधान जुआरी न जाने कहाँ चला गया है, यह मालूम नहीं है।

चेटी— आयें ! आपकी भाग्यवृद्धि हो रही है। आर्य जुआड़ी बन गये।

वसन्तसेना— (अपने में) क्या चोर द्वारा चुराये गये भी [आभूषणों के डब्बे], को उदारता के कारण जुआ में हार गया, ऐसा कह रहें हैं ? इसी कारण इन्हें चाहती हूँ।