भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३०४मृच्छकटिकम्

एतत्तद्धृतराष्ट्रवक्त्रसदृशं मेघान्धकारं नभो दृष्टो गर्जति चातिदर्पितबलो दुर्योधनो वा शिखी । अक्षद्यूतजितो युधिष्ठिर इवाध्वानं गतः कोकिलो हंसाः सम्प्रति पाण्डवा इव वनादज्ञातचर्यां गताः ॥ ६ ॥

अन्वयः—मेघान्धकारम्, एतत्, नभः, तद्धृतराष्ट्रवक्त्रसदृशम्, [ अस्ति ]; अतिदर्पितबलः, शिखी, दुर्योधनः, वा, दृष्टः [ सन् ], गर्जति; कोकिलः, अक्षद्यूत-जितः, युधिष्ठिरः, इव, अध्वानम्, गतः, सम्प्रति, हंसाः, पाण्डवाः, इव, वनात्, अज्ञातचर्याम्, गताः ॥ ६ ॥

शब्दार्थ—मेघान्धकारम् = मेघों के कारण अन्धकारयुक्त, एतत्=यह, नभः=आकाश, तद्धृतराष्ट्रवक्त्रसदृशम्=उस धृतराष्ट्र के मुख के समान, [ अस्ति=है ]; अतिदर्पितबलः=रूप के अति घमण्डवाला [ दुर्योधनपक्ष में—अत्यन्त अभिमानयुक्त सेनावाला ], शिखी=मोर, दुर्योधनः वा=दुर्योधन के समान, हृष्टः=हर्षित होता हुआ, गर्जति = चिल्ला रहा है; कोकिलः=कोयल, अक्षद्यूतजितः=पासे के खेल में पराजित, युधिष्ठिरः=ज्येष्ठ पाण्डव, इव=के समान, अध्वानम्=मौन [ अध्वानम् । युधिष्ठिर पक्ष में वनमार्ग ] को, गतः = चली गयी है, सम्प्रति=इस वर्षाकाल में, हंसाः=हंस पक्षी, पाण्डवाः=पाण्डवों के, इव=समान, वनात्=वनसे, अज्ञातचर्याम्=अज्ञातवास को, गताः=चले गये ॥ ६ ॥

अर्थ—[ दुर्योधन के कुशासन की तुलना वर्षा के साथ है । ] बादलों के कारण अन्धकारयुक्त यह आकाश धृतराष्ट्र ( दुर्योधन के पिता ) के मुख के समान है । [ आंखों से रहित धृतराष्ट्र का मुख और चन्द्रसूर्यरहित आकाश इन दोनों की समानता है । ] अपने रूप के घमण्डवाला मोर [ दुर्योधनपक्ष में अतिघमण्डी सेनावाला ] दुर्योधन के समान प्रसन्न होता हुआ शब्द कर रहा है । कोयल पांसे में हारे हुये युधिष्ठिर के समान मौन [ युधिष्ठिर पक्ष में—वनमार्ग ] को प्राप्त हो गयी है । इस वर्षाऋतु में हंस पाण्डवों के समान वन [ हंसपक्ष में पानी ] से अज्ञातवास को चले गये हैं [ अर्थात् वन से जैसे पाण्डव अज्ञातस्थान पर चले गये उसी प्रकार यहाँ के वन=जल को छोड़कर हंस मानसरोवर चले गये । ] ॥ ६ ॥

टीकावर्षाकाले विविधप्राणिनां स्वाभाविकीं स्थितिं वर्णयतिएतदिति । मेघैः=अभ्रैः, अन्धकारः=तमो यत्र तत्, एतत्=दृश्यमानम्, नभः=गगनम्, तस्य=प्रसिद्धस्य महाभारतीस्य धृतराष्ट्रस्य=दुर्योधनजनकस्य, वक्त्रसदृशम्=आननतुल्यम्; सादृश्यञ्चोभयोः आलोकनासामर्थ्यरूपम्, यथा नेत्रशून्यतया धृतराष्ट्रोऽवलोकयितुं न समर्थः तथैव सूर्यचन्द्राभावात् गगनमपि प्रकाशशून्यमस्तीति भावः, अतिदर्पितबलः = मयूरपक्षे—मेघावलोकनजन्मानन्दाभिव्यञ्जकम्, बलम् = रूपम् यस्य