भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३०८ | मृच्छकटिकम्

विदूषकः--भो वअस्स ! एदं पि से दुदिअं सन्तावकारणं जं सहीअण-दिण्ण-संणाए पडन्तोवारिदं मुहं कदुअ, अहं उवहसिदो, ता अहं बम्हणो भविअ दाणि भवन्तं सीषेण पडिअ विण्णवेमि--णिवत्तोअदु अप्पा इमादो बहु-पच्चवाआदो गणिआपसङ्गादो। गणिआ णाम, पादुअन्तर-प्पणिठ्ठा विअ लेट्टुमा दुक्खेण पुण णिराकरीअदि। अपि च, भो वअस्स ! गणिआ, हत्थी, काअत्थओ, भिक्खु चाटो, रासहो अ, जर्हि एदे णिवसन्ति, तर्हि दुट्ठा वि ण जाअन्ति। (भो वयस्य ! एतदपि मे द्वितीयं सन्तापकारणम्, यत् सखीजन-दत्त-संज्ञया पटान्तापवारितं मुखं कृत्वा अहमुपहसितः, तदहं ब्राह्मणो भूत्वा इदानीं भवन्तं शीर्षेण पतित्वा विज्ञापयामि--निवर्त्यतामात्मा अस्मात् बहु-प्रत्यवायात् गणिकाप्रसङ्गात्। गणिका नाम पादुकान्तरप्रविष्टा इव लेष्टुका, दुःखेन पुनर्निराक्रियते। अपि च भो वयस्य ! गणिका, हस्ती, कायस्थः, भिक्षुः, चाटः, रासभश्च--यत्र एते निवसन्ति, तत्र दुष्टा अपि न जायन्ते।)

अर्थ--जिस विश्वास को मान कर हम लोगों के पास उस वसन्तसेना ने धरोहर रखी थी उस महान् विश्वास का ही यह मूल्य चुकाया जा रहा है; (दिया जा रहा है) ॥ ७ ॥

टीका--त्वया अल्पस्य हेतो बहु हारितमिति विदूषकवचनस्य प्रत्युत्तरं वदति--यमिति। यम्=लोकोत्तरम्, विश्वासम्=प्रत्ययम्, समालम्ब्य=समाश्रित्य, तया=वसन्तसेनया, अस्मासु=अस्मादृशेषु, न्यासः=अलङ्कारनिक्षेपः, कृतः=निहितः, महतः = अमितमूल्यस्य, तस्य, प्रत्ययस्य = विश्वासस्य, एतत् = इदम्, मूल्यम्=निष्क्रयम्, दीयते = समर्प्यते । इयं रत्नावली विश्वासस्यैव प्रतिदानम्, न तु अलङ्कारभाण्डस्येति भावः पद्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ७ ॥

विमर्श--संकुचित वृत्तिवाले विदूषक के कथन का निराकरण करने के लिये यहाँ चारुदत्त का कथन उसके व्यक्तित्व की महत्ता एवम् उदारता प्रकट करता है ॥ ७ ॥

अर्थ--विदूषक--मित्र ! मेरे सन्ताप का दूसरा यह भी कारण है कि अपनी सखियों की ओर इशारा करके अपने आंचल के किनारे से मुख ढक करके (छिपा करके) उस (वसन्तसेना) ने मेरी हँसी भी उड़ायी, तो अब मैं ब्राह्मण होकर भी (आपके पैरों पर) शिर रखकर आप से यह निवेदन करता हूँ कि बहुत कठिनाइयों से भरे हुये इस वेश्यासंसर्ग से अपने को मुक्त कर लीजिये। वेश्या तो जूते में पड़ी हुयी कंकड़ी के समान बाद में बहुत कष्ट से निकाली जाती है। और भी मित्र ! जहाँ वेश्या, हाथी, कायस्थ, भिक्षुक, शठ और गधे रहते हैं वहाँ दुष्ट भी नहीं रह सकते।

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