भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 398
३१०मृच्छकटिकम्

अपि च—वयस्य !

यस्यार्थास्तस्य सा कान्ता, धनहार्यो ह्यसौ जनः ।
( स्वगतम् ) न, गुणहार्यो ह्यसौ जनः । ( प्रकाशम् )
वयमर्थैः परित्यक्ताः, ननु त्यक्तैव सा मया ॥ ६ ॥

विमर्श— किसी समय तेज दौड़नेवाला घोड़ा भी शक्तिस्रीण होने पर चाह कर भी जैसे नहीं दौड़ पाता है, उसी प्रकार असमर्थ मनुष्य की चित्तवृत्तियाँ भी दौड़कर मनमें ही रह जाती हैं। चारुदत्त का स्वभाव वसन्तसेना के पास गया हुआ भी अर्थाभाव के कारण दुःखी होकर वहाँ से वापस लौट आया'—इस विशेष के प्रस्तुत रहते उसी प्रकार के अप्रस्तुत सामान्य का कथन होने से उत्तरार्ध में अप्रस्तुतप्रशंसा है और वह—शीघ्र चलने की इच्छा करता हुआ भी घोड़ा असमर्थ होने के कारण नहीं चल पाता—इस प्रकार समान धर्मवाली वस्तु का प्रतिबिम्बित होने से पूर्वार्द्ध के दृष्टान्त अलङ्कार से सङ्कीर्ण है। दोनों का संकर अलङ्कार है ॥८॥

अन्वयः— यस्य, अर्थाः, (सन्ति), तस्य, सा, कान्ता, हि, असौ, जनः, धनहार्यः, न, असौ, जनः, गुणहार्यः (अस्ति), वयम्, अर्थैः, परित्यक्ताः, (अतः), सा, मया, ननु, त्यक्ता, एव ॥ ६ ॥

शब्दार्थ— यस्य=जिसके पास, अर्थाः=धन, सन्ति=हैं, तस्य=उसकी, सा=वह वसन्तसेना, कान्ता=प्रेयसी है, हि=क्योंकि, असौ=वह, जन=वेश्या, धनहार्यः=धन से खरीदी जाने योग्य, न=नहीं, असौ जनः=वह वसन्तसेना, गुणहार्यः=गुणों से वश में होने वाली, अस्ति=है, वयम्=हम लोग, अर्थैः=धन के द्वारा, परित्यक्ताः=छोड़ दिये गये हैं, (अतः=इसलिये), ननु=निश्चित ही, सा=वह वसन्तसेना, मया=मुझ चारुदत्त के द्वारा, त्यक्ता एव=छोड़ ही दी गयी ॥ ६ ॥

अर्थ— और भी मित्र !

जिसके पास धन है, उसी की वह वसन्तसेना है क्योंकि वह वेश्या धन से खरीदी जाने योग्य है।

(अपने में) नहीं, वह तो गुणों से वश में होने योग्य है।

(प्रकाश) धन ने हम लोगों को छोड़ दिया, अतः निश्चित ही हम लोगों ने वेश्या को छोड़ दिया ॥ ६ ॥

टीका— मद्गुणवशवर्त्तिनी वसन्तसेना निर्धनमपि मां न परित्यजतीति सम्यग् जानन्नपि विदूषकस्य सन्तोषायस्यान्यथा वदति-यस्येति। यस्य=पुरुषस्य, समीपे, अर्थाः =धनानि, सन्ति; तस्य=जनस्य, सा=वसन्तसेना, कान्ता=प्रेयसी, हि=यतः, असौ= वेश्यारूपी जनः, धनेन=वित्तेन, हार्यः=वश्यः, अस्ति, परन्तु वयम्, अर्थैः=धनैः, परित्यक्ताः=विरहिताः, अतः, मया=चारुदत्तेन, सा=वसन्तसेना, त्यक्ता=परित्यक्ता