भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 399, कुल 760 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 399

पञ्चमोऽङ्कः ३११

विदूषकः—( अधोऽवलोक्य, स्वगतम् ) जधा एसो उद्धं पेक्खिअ दीहं णिस्ससदि, तथा तक्केमि मए विणिवारिअन्तस्स अधिअदरं वड्ढिदा से उक्कण्ठा। ता सुट्ठु क्खु एव्वं वुच्चदि—'कामो वामो'त्ति। ( प्रकाशम् ) भो वअस्स ! भणिदं अ ताए—'भणेहि चारुदत्तं अज्ज पओसे मए एत्थ आअन्तव्वं'त्ति। ता तक्केमि रअणावलीए अवसिट्टुट्ठा अवरं मग्गिदुं आअमिस्सदि'त्ति। ( यथा एष ऊर्ध्वं प्रेक्ष्य दीर्घं निःश्वसिति; तथा तर्कयामि-मया निवार्यमाणस्य अधिकतरं वृद्धा अस्य उत्कण्ठा। तत् सुष्ठु खल्वेवमुच्यते 'कामो वामः' इति। भो वयस्य ! भणितञ्च तया 'भण चारुदत्तम्—अद्य प्रदोषे मया अत्र आगन्तव्यम्, इति, तत् तर्कयामि रत्नावल्या अपरितुष्टा अपरं याचितुमागमिष्यतीति। )
चारुदत्तः—वयस्य ! आगच्छतु, परितुष्टा यास्यति।
चेटः—( प्रविश्य ) अवेध माणहे ! ( अवेत मानवाः ! )

जधा जधा वरशदि अभ्रखण्डे तथा तथा तिम्मदि पुट्ठिचम्मे।
जधा जधा लग्गदि शीदवादे तथा तथा वेवदि मे हअक्के ॥ १० ॥
यथा यथा वर्षति अभ्रखण्डम्, तथा तथा तिम्यति पृष्ठचर्म।
यथा यथा लगति शीतवातस्तथा तथा वेपते मे हृदयम् ॥ १० ॥


एव। एवञ्च तस्याः परित्यागविषये विदूषकेण न किमपि कर्तव्यमिति भावः। अत्र श्लोके चतुर्थपादस्यार्थं प्रति तृतीयपादस्य अर्थस्य हेतुतया काव्यलिङ्गमलङ्कारः ॥ ९ ॥

अर्थ—विदूषक—( नीचे की ओर देखकर अपने में ) जिस प्रकार ये ऊपर देखकर लम्बी सांसें ले रहे हैं ( आहें भर रहे हैं ) इससे मैं अनुमान कर रहा हूँ कि मेरे द्वारा वेश्यासंग से रोके जानेवाले इनकी उत्कण्ठा और अधिक बढ़ रही है। इसलिये यह ठीक ही कहा गया है—'कामविकार उल्टा होता है।' (प्रकट में) हे मित्र ! और उसने यह कहा है—'चारुदत्त से कहना कि आज सायंकाल मुझे उनके पास आना है।' इससे यह सोंचता हूँ कि रत्नावली से सन्तुष्ट न होनेवाली वह वेश्या कुछ और लेने के लिये आयेगी।'

चारुदत्त—मित्र, आने दो। सन्तुष्ट होकर जायेगी।

अन्वयः—अभ्रखण्डम्, यथा, यथा, वर्षति, पृष्ठचर्म, तथा, तथा, तिम्यति; शीतवातः, यथा, यथा, लगति, तथा, तथा, मे, हृदयम्, वेपते ॥ १० ॥

शब्दार्थअभ्रखण्डम् = बादलों का टुकड़ा, यथा यथा = जैसे जैसे, वर्षति = बरस रहा है, पृष्ठचर्म = पीठ का चमड़ा, तथा तथा = वैसे वैसे, तिम्यति = भीग रहा है; शीतवातः = ठण्डी हवा, यथा, यथा = जैसे जैसे, लगति = लग रही है, तथा तथा = वैसे वैसे, मे-मेरा, हृदयम् = हृदय, वेपते = काँप रहा है ॥ १० ॥