भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३१२ मृच्छकटिकम्

( प्रहस्य )

वंशं वाए शत्तच्छिद्दं शुशद्दं वीणं वाए शत्ततन्ति णदन्ति ।
गीअं गाए गद्दहश्शाणुलूअं के मे गाणे तुम्बुलू णालदे वा ॥११॥
वंशं वादयामि सप्तच्छिद्रं सुशब्दं वीणां वादयामि सप्ततन्त्रीं नदन्तीम् ।
गीतं गायामि गर्दभस्यानुरूपं को मे गाने तुम्बुरुर्नारदो वा ॥ ११ ॥

आणत्तम्हि अज्जआए वसन्तसेणाए—कुम्भीलआ ! गच्छ तुमं मम


अर्थ—चेट—( प्रवेश करके ) मनुष्यों ! [ यह ] समझ जाइये—

बादलों का टुकड़ा जैसे जैसे बरस रहा है, पीठ का चमड़ा वैसे वैसे भीग रहा है; जैसे जैसे ठण्डी हवा लग रही है, वैसे वैसे मेरा हृदय काँप रहा है ॥ १० ॥

टीका—वर्षाजलेनाईशरीरः कम्पमानश्चेटोऽन्यान् सावधानान् कर्तुमाह— यथा यथेति । अभ्रखण्डम् = मेघखण्डम्, यथा यथा=येन येन प्रकारेण, वर्षति = कटति, जलवर्षणं करोति, पृष्ठचर्म=शरीरस्य पश्चाद्भागः, तथा तथा, तिम्यति = आर्दीर्भवति; शीतवातः=शीतलः पवनः, यथा यथा, लगति=शरीरं स्पृशति, तथा तथा, मे=मम, हृदयम्=मनः, अन्तःकरणम्, वेपते=कम्पते । उपेन्द्रवज्रा वृत्तम् ॥१०॥

विमर्श—वर्षा की अवस्था प्रस्तुत करने के लिये चेट का कथन है ॥ १० ॥

अन्वयः—सप्तच्छिद्रम्, सुशब्दम्, वंशम्, वादयामि; नदन्तीम्, सप्ततन्त्रीम्, वीणाम्, वादयामि; गर्दभस्य, अनुरूपम्, गीतम्, गायामि; गाने, तुम्बुरुः, नारदः, वा, मे, कः ॥ ११ ॥

शब्दार्थ—सप्तच्छिद्रम् = सात छेदों वाली, सुशब्दम् = मधुर आवाजवाली, वंशम् = बाँसुरी को, वादयामि = बजा रहा हूँ; नदन्तीम् = झंकार करनेवाली, सप्त-तन्त्रीम्=सात स्वरों के उत्पादक तन्त्रों से युक्त, वीणाम्=वीणा को, वादयामि=बजा रहा हूँ; गर्दभस्य = गधे के, अनुरूपम् = समान, गीतम्=गाना को, गायामि=गा रहा हूँ; गाने=गाने में, तुम्बुरुः=तुम्बुर, वा=अथवा, नारदः=नारद, मे=मेरे विषय में, कः=कौन हैं, अर्थात् मेरे सामने कुछ नहीं है ॥ ११ ॥

( हंस कर )

अर्थ—सात छेदोंवाली, मधुर आवाजवाली बांसुरी बजा रहा हूँ । झंकार करनेवाली, सात तारोंवाली वीणा बजा रहा हूँ । गधे के समान मैं गाता हूँ । गाने में तुम्बुरु (गन्धर्व) या नारद मेरे सामने क्या हैं ? अर्थात् कुछ नहीं है ॥११॥

टीका—इदानीं चेटः स्वगीतकौशलं प्रदर्शयितुमाह—सप्तच्छिद्रमिति । सप्त-च्छिद्रम् = षड्जादिसप्तस्वरोत्पादकसप्तरन्ध्रयुक्तम्, सुशब्दम् = सुस्वरम्, वंशम्=वेणुम्, वादयामि=ध्वनयामि । नदन्तीम्=शब्दायमानाम्, सप्ततन्त्रीम्=सप्तसंख्याक-