मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३२४ मृच्छकटिकम्
विटः—वसन्तसेने ! पश्य पश्य ! अयमपरः—
पवन-चपल-वेगः स्थूलधारा-शरौघः स्तनित-पटह-नादः स्पष्टविद्युत्पताकः । हरति करसमूहं खे शशाङ्कस्य मेघो नृप इव पुरमध्ये मन्दवीर्यस्य शत्रोः ॥ १७ ॥
**अन्वयः—**पवनचपलवेगः, स्थूलधाराशरौघः, स्तनितपटहनादः, स्पष्टविद्युत्पताकः, मेघः, मन्दवीर्यस्य, शत्रोः, पुरमध्ये, नृपः, इव, खे, शशाङ्कस्य, करसमूहम्, हरति ॥ १७ ॥
**शब्दार्थ—**पवनचपलवेगः = हवा के द्वारा चञ्चल वेगवाला [ नृपपक्ष में—हवा के समान तेज गति वाला ] स्थूलधाराशरौघः = मोटी जलधारारूपी वाणों वालों [ नृपपक्ष में—मोटी जलधाराओं के समान वाणसमूह वाला ] स्तनितपटहनादः = गर्जनरूपी नगाड़े की आवाजवाला, [ नृपपक्ष में—मेघों की गर्जन के समान युद्ध के नगाड़ों की आवाजवाला ], स्पष्टविद्युत्पताकः = स्पष्ट बिजलिरूपी पताकावाला [ नृपपक्ष में—चमकती हुयी बिजली के समान पताकाओं वाला ] मेघः = बादल, मन्दवीर्यस्य = अल्पपराक्रमी, शत्रोः = शत्रु के, पुरमध्ये = नगर के मध्य में, नृपः = आक्रमणकारी राजा, इव = के समान, खे = आकाश में, शशाङ्कस्य = चन्द्रमा के, करसमूहम् = किरणसमुदाय को [ नृपपक्ष में—टैक्ससमुदाय को ], हरति = छीन ले रहा है ॥ १७॥
**अर्थ—विट—**वसन्तसेना ! देखो, देखो । यह दूसरा—
मोटी पानी की धारारूपी वाणों वाला, गर्जनारूपी नगाड़े की आवाजवाला, स्पष्ट बिजलिरूपी पताकावाला मेघ कम पराक्रमवाले शत्रु के नगर के बीच में [ आक्रमणकारी ] राजा के समान आकाश में चन्द्रमा की किरणों के समूह का हरण कर ले रहा है। राजापक्ष में हवा के समान चञ्चल या तीव्रगतिवाला, मोटी मोटी जलधाराओं के समान वाणसमूह वाला, बादलों की गर्जन के समान युद्ध के नगाड़ों की आवाजवाला, चमकती हुई बिजली के समान पताकावाला विजयी राजा कमजोर शत्रु के नगर में उससे कर=टैक्स लेने लग जाता है ॥ १७ ॥
**टीका—**वसन्तसेनोक्तं मेघोपद्रवं समर्थयमानो विट आह पवनेति । पवनेन = वायुना, चपलः = चञ्चलः, वेगः =जवः यस्य सः, नृपपक्षे—पवन इव चपलवेगः, स्थूला चासो धारा = वर्षणप्रवाहः, शरौघः = वाणसमूह इव यस्य सः, नृपपक्षे—स्थूलधारा-इव शरौघः यस्य सः, निरन्तरवाणवर्षीयर्थः, स्तनितम् = घनगर्जितम्, पटहनादः = रणवाद्यविशेषरवः इव यस्य सः, अन्यत्र स्तनितमिव पटहनादो यस्य सः, स्पष्टा = सुव्यक्ता, विद्युत् = चपला, पताका =ध्वज इव यस्य सः, अन्यत्र स्पष्ट-