मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३२७
वसन्तसेना-भाव ! पेक्ख पेक्ख । ( भाव ! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व । )
एतैराद्रं-तमालपत्र-मलिनैरापोतसूर्य नभो वल्मीकाः शरताडिता इव गजाः सीदन्ति धाराहताः । विद्युत्काञ्चनदीपिकेव रचिता प्रासादसञ्चारिणी ज्योत्स्ना दुर्बलभर्तृकेव वनिता प्रोत्सार्य मेघैर्हृता ॥ २० ॥
समान हिलते हुये चामर से युक्त ) आकाश को मतवाले हाथी के समान करने के इच्छुक से ( इस दूसरे बादल को देखो ) ॥ १६ ॥
टीका- बलाकादिभिः कृतस्याकाशस्य सौन्दर्यातिशयं विटो वर्णयति-बलाकेति । बलाका=बकपङ्क्तिरेव, पाण्डुरम्=श्वेतम्, उष्णीषम्=किरीटम्, यस्य तादृशम्, गजपक्षे-बकपङ्क्तिरिव श्वेतम् उष्णीषं यस्य तादृशम्, विद्युदेव=तडिदेव उत्क्षिप्तः=ऊर्ध्वीकृतः, चामरः=बालव्यजनं यस्यं तादृशम्, पक्षे तडिदिव उत्क्षिप्त-चामरविशिष्टम्, अम्बरम्=गगनम्, मत्तस्य=मदोन्मत्तस्य, वारणस्य=गजस्य, सारूप्यम्=समानरूपताम्, कर्तुकामम्=कर्तुमिच्छुकमिव, पश्येति गद्यस्थेनान्वयः, यद्वा-वर्तते इति बोध्यम् ॥ १९ ॥
विमर्श- प्रस्तुत श्लोक में क्रिया पद नहीं है । कुछ व्याख्याकारों ने 'वर्तते' जैसे क्रियापद आक्षिप्त किये हैं । परन्तु इसकी अपेक्षा 'इदम् अपरं पश्य' इस गद्यवाक्य में स्थित दर्शन क्रिया का कर्म मानना उचित प्रतीत है । इस प्रकार के बादल को दिखाना विट का उद्देश्य है ॥१९॥
अन्वयः- आर्द्रतमालपत्रमलिनैः, एतैः, ( मेघैः ) नभः, आपीतसूर्यम्, ( कृतम् ), धाराहताः, वल्मीकाः, शरताडिताः, गजाः, इव, सीदन्ति; विद्युत्, प्रासादसञ्चारिणी, काञ्चनदीपिका, इव, रचिता, दुर्बलभर्तृका, वनिता, इव, ज्योत्स्ना, मेघैः, प्रोत्सार्य, हृता ॥ २० ॥
शब्दार्थ- आर्द्रतमालपत्रमलिनैः=तमालवृक्ष के गीले पत्तों के समान मलिन, एतैः=इन्होंने, (मेघैः=बादलों ने), नभः=आकाश, आपीतसूर्यम्=ढके हुये सूरजवाला, कृतम्=कर दिया है। धाराहताः = वर्षा की धारा से गिराये गये, वल्मीकाः=दीमकों के पुञ्ज, शरताडिताः=बाणों से मारे गये, गजाः=हाथियों, इव=के समान सीदन्ति=नष्ट हो रहे हैं। विद्युत्=बिजली, प्रासादसञ्चारिणी = महल में घूमने वाली, कांचनदीपिका=सोने की लालटेन, इव=के समान, रचिता=बना दी गयी है, दुर्बलभर्तृका = कमजोर पतिवाली, वनिता = स्त्री, इव = के समान, ज्योत्स्ना=चांदनी, मेघैः = बादलों द्वारा, प्रोत्सार्य = बलपूर्वक छीनकर, हृता = हर ली गयी है ॥ २० ॥
अर्थ-वसन्तसेना-भाव ! देखो, देखो-