मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ें३२८ मृच्छकटिकम्
विटः—वसन्तसेने ! पश्य पश्य—
एते हि विद्युद्गुण-बद्ध-कक्षा गजा इवान्योन्यमभिद्रवन्तः । शक्राज्ञया वारिधराः सधारा गां रूप्यरज्ज्वेव समुद्धरन्ति ॥ २१ ॥
तमालवृक्ष के गीले पत्तों के समान मलिन इन मेघों द्वारा आकाश को ढके हुये सूर्यवाला बना दिया गया है अर्थात् आकाश में सूर्य को ढँक लिया है। वर्षा की जलधाराओं से गिराये गये बल्मीकों (दीमक) के घर बाणों से मारे गये हाथियों के समान नष्ट हो रहे हैं। बिजली महलों में घुमाई जानेवाली दीपिका (लालटेन) के समान बना दी गयी है (अर्थात् कभी कहीं, कभी कहीं चमकती रहती है।) कमजोर पतिवाली स्त्री के समान चाँदनी मेघों द्वारा बलपूर्वक छीनकर हर ली गयी है ॥ २० ॥
टीका—मेघानां बाहुल्यं तेन कृतञ्च प्राकृतिकं वर्णनं प्रस्तौति-एतैरिति । आर्दाणि = जलसिक्तानि, तमालपत्राणि = एतन्नामकवृक्षविशेषपत्राणि, मलिनैः= श्यामवर्णैः, एतैः=पुरो दृश्यमानैः, मेघैः, नभः=गगनम्, आपीतः=आच्छादितः, सूर्यः=दिनकरः, यस्मिन्, तादृशम्, कृतम्, जातं पश्येत्यादि क्रिया-पदमध्याहार्यम् । धाराभिः=वर्षाजलधाराभिः, आहता=प्रताडिताः, वल्मीकाः=कीटविशेषरचित-मृत्तिकास्तूपाः, शरताडिताः=शरैराहताः, गजाः=हस्तिनः, इव=यथा, सीदन्ति=विनाशं यान्ति । विद्युत्=तडित्, कर्मदम्, प्रासादसंचारिणी=प्रासादे सञ्चरणशीला, कांचनदीपिका = सुवर्णदीपिका, इव, रचिता = विहिता, दुर्बलः = क्षीणशक्तिकः, भर्त्ता=पतिर्यस्याः सा, तादृशी, वनिता=भार्या, इव, ज्योत्स्ना=चन्द्रिका, मेघैः=वारिदैः, प्रोत्सार्य=बलाद् आकृष्य, हृता=नीता । निर्बलपुरुषस्य समक्षमेव यथा तस्य भार्या शत्रुहरति तथैव मेघैः चन्द्रभार्या ज्योत्स्नापि हृतेति भावः ॥ अत्रोपमा-लङ्कारः, शार्दूलविक्रीडतम् वृत्तम् ॥ २० ॥
अन्वयः—विद्युद्गुणबद्धकक्षाः, अन्योन्यम्, अभिद्रवन्तः, गजाः, इव, सधाराः, एते, वारिधराः, शक्राज्ञया, गाम्, रूप्यरज्ज्वा, समुद्धरन्ति, इव ॥ २१ ॥
शब्दार्थ—विद्युद्गुणबद्धकक्षः=बिजलीरूप रस्सी से बंधी हुई कमर वाले, [गजपक्ष में—बिजली के समान रस्सी से कसी हुयी कमर वाले] अन्योन्यम्=एक दूसरे को, अभिद्रवन्तः=पीछे धक्का देते हुये, गजाः=हाथियों, इव=के समान, एते=ये, सधाराः=जलधारासहित, वारिधराः=बादल, शक्राज्ञया=इन्द्र की आज्ञा से, गाम्=पृथ्वी को, रूप्यरज्ज्वा=चाँदी की रस्सियों से, समुद्धरन्ति इव=ऊपर उठा से रहे हैं ॥ २१ ॥