मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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पञ्चमोऽङ्कः
अपि च। पश्य—
महावाताध्मातैर्महिष-कुल-नीलैर्जलधरैः
चलैर्विद्युत्पक्षैर्जलधिभिरिवान्तःप्रचलितैः।
इयं गन्धोद्दामा नव-हरित-शष्पाङ्कुरवती
धरा धारापातैर्मणिमयशरैर्भिद्यत इव ॥ २२ ॥
**अर्थ—विट—**वसन्तसेना जी ! देखो, देखो—
बिजलीरूपी रस्सी से बंधी हुयी कमरवाले [ गजपक्ष में—बिजली के समान रस्सी से बंधी कमरवाले ], आपस में एक दूसरे को धक्का देते हुये जलधारा वाले ये बादल इन्द्र की आज्ञा से मानो पृथ्वी को चाँदी की रस्सियों से ऊपर उठा रहे हैं ॥ २१ ॥
**टीका—**मेघसौन्दर्यमेवाह—एत इति। विद्युत्=तडित् एव गुणः=रज्जुः, तेन बद्धाः=संयमिताः, कक्षाः=मध्यभागः येषां ते, गजपक्षे—विद्युदिव गुणः, तेन बद्धाः=आबद्धाः, कक्षाः—उदरभागाः येषां ते, अन्योन्यम्=परस्परम्, अभिद्रवन्तः=संघर्षयन्तः, गजाः = दन्तिनः, इव, सधाराः = जलधारासहिता एते वारिभ्रगः=वारिदाः, शक्रस्य = इन्द्रस्य, आज्ञया = आदेशेन, गाम् = पृथवीम्, रूप्यरज्ज्वा=रजतमयीरज्ज्वा, समुद्धरन्ति इव=ऊर्ध्वं कर्षन्तीव । अत्रोपमोत्प्रेक्षे अलङ्कारौ, उपजातिः वृत्तम् ॥ २१ ॥
**अन्वयः—**महावाताध्मातैः, महिषकुलनीलैः, विद्युत्पक्षैः, अन्तः प्रचलितैः, जलधिभिः-इव, चलैः जलधरैः, मणिमयशरैः, धारापातैः, गन्धोद्दामा, नवहरित-शष्पाङ्कुरवती, इयम्, धरा, भिद्यते, इव ॥ २२ ॥
**शब्दार्थ—**महावाताध्यातैः=प्रचण्डवायु के कारण गर्जन करने वाले अथवा प्रबल वायु से परिपूर्ण, महिषकुलनीलैः=भैंसों के समुदाय के समान नीले=काले वर्ण वाले, विद्युत्पक्षैः=बिजलीरूपसहायक से युक्त, अन्तःप्रचलितैः=अन्तरिक्ष में घूमने वाले, चलैः=इधर उधर सञ्चरणशील, जलधिभिः=समुद्रों, इव=के समान, जलधरैः=बादल समुदाय, मणिमयशरैः मणि से बने हुये वाणों के द्वारा, धारा-सम्पतैः=धारारूप से वर्षा के द्वारा, गन्धोद्यामा=उठने वाली उत्कट गन्ध से युक्त, नवहरितशष्पांकुरवती=नवीन हरे घास के अंकुरों से व्याप्त, इयम्=इस, धरा=पृथिवी को, भिद्यते इव=विदीर्ण सा कर रहे हैं ॥ २२ ॥
अर्थ—और भी देखो—
प्रचण्ड वायु के कारण गर्जन करने वाले अथवा प्रबल वायु से परिपूर्ण, भैंसों के समुदाय के समान नीले=काले रंगवाले, समुद्रों के समान इधर उधर घूमते हुये बादल [ कर्ता ] मणिमय बाणों से धारारूप से वर्षा के द्वारा गन्ध से युक्त, नवीन हरे घास से व्याप्त इस पृथिवी को विदीर्ण सा कर रहे हैं ॥ २२ ॥