भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 420
३३२मृच्छकटिकम्

विश्चेष्टं स्वपितीव सम्प्रति पयोधारा-गृहान्तर्गतं
स्फीताम्भोघर-धाम-नैक-जलद-च्छत्रापिधानं जगत् ।। २४ ।।

अन्वयः—निष्पन्दीकृत-पद्मषण्डनयनम्, नष्टक्षपा-वासरम्, विद्युद्भिः, क्षण-नष्टदृष्टतिमिरम्, प्रच्छादिताशामुखम्, पयोधरागृहान्तर्गतम्, ‘स्फीताम्भोधरधाम-नैकजलदच्छत्रापिधानम्, जगत्, सम्प्रति, निश्चेष्टम्, स्वपिति, इव ।। २४ ।।

शब्दार्थ—निष्पन्दीकृत-पद्मषण्डनयनम् = कमलसमूहरूपी नेत्रों को जिसने बन्द कर लिया है, नष्टक्षपावासरम्=रात और दिन का भेद जिसमें समाप्त हो गया है अर्थात् एक रूप, विद्युद्भिः = बिजली के द्वारा, क्षणनष्टदृष्टतिमिरम्= जिसमें क्षण में अन्धकार नष्ट हो गया, दूसरे क्षण में दिखाई दे रहा है, प्रच्छा-दिताशामुखम्=जिसका दिशारूपी मुख ढंक गया है, मेघों की धारारूपी गृहों के मध्य में स्थित, स्फीताम्भोधरधामनैक-जलद-छत्रापिधानम् = विस्तृत, मेघों के स्थान आकाश में अनेक बादलरूपी छातों से ढंका हुआ, जगत्=संसार, सम्प्रति=इस समय, निश्चेष्टम्=निष्क्रिय होकर, स्वपिति इव=सो सा रहा है ।। २४ ।।

अर्थविट—यह ऐसा ही है। जैसा कि देखो ...

जिसकी कमलसमूहरूपी आंखें निश्चल हो गयी हैं, जिसमें दिन और रात [के भेद] का ज्ञान नहीं हो रहा है, जिसमें बिजली के कारण कभी अन्धकार दिखाई देता है, कभी नहीं दिखाई देता है, जिसमें सारी दिशारूपी मुख बन्द हो गये हैं, जो जलधाराओं के मध्य में स्थित है, जो विशाल मेघों के गृहभूत आकाश में अनेक बादलरूपी छातों से आच्छादित है, ऐसा जगत् इस समय निश्चेष्ट= क्रियाशून्य होकर सो सा रहा है ।। २४ ।।

टीका—मेघाच्छन्नत्वेन तात्कालिकीं जगदवस्थां वर्णयति—निष्पन्दीति । निष्पन्दीकृतानि = सूर्योदयाभावात् अविकसितीकृतानि, पद्मषण्डानि एव=कमल-बृन्दानि एव नयनानि = नेत्राणि यस्य तत्, प्रथमान्तानि पदानि ‘जगत्’ इत्यस्य विशेषणानि, नष्टाः=अदर्शनं प्राप्ताः क्षपाः=रात्रयः, वासराश्च=दिवसाश्च यस्मिन् तत्, विद्युद्भिः = तडिद्भिः, तडित्प्रकाशेनेति भावः, क्षणम् = निमेषक्रियायाः चतुर्थभागपरिमितकालविशेषं व्याप्य, नष्टम्=अपसृतम्, दृष्टम्=पश्चात् विद्युत्प्र-काशाभावे सति दृष्टञ्च, तिमिरम्=अन्धकारः यत्र तथाभूतम्, प्रच्छादितानि= आवृतानि, आशाः दिशा, एव मुखानि यस्य तत्, पयोधाराः=जलधारा एव गृहाणि=भवनानि, तेषामन्तर्गतम्, तन्मध्यस्थितम्, स्फीते = विशाले, अम्भोघराणाम् = मेघानाम्, धामनि = आश्रये आकाशे इत्यर्थः यद्वा स्फीतानाम् अम्भसां धराणि= धारकाणि, धामानि=आधाराः, ये नैके=अनेके, जलदः=मेघाः, ते छत्राणि=आतप-त्राणि इव तानि अपिधानानि = आच्छादनानि यस्य तथोक्तम्, जगत्=विश्वम्,