भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३३६ मृच्छकटिकम्

वसन्तसेना--

जलधर ! निर्लज्जस्त्वं यन्मां दयितस्य वेश्म गच्छन्तीम् । स्तनितेन भीषयित्वा धाराहस्तैः परामृशसि ॥ २८ ॥

उद्भासते इव; बलाकाशतैः=बलाकासमूहैः, उच्चैः=अत्यन्तम्, संविहसति इव=सम्यग्रूपेण हासं करोतीव; धाराः = जलधाराः, एव शराः = बाणाः, तान् उद्गिरति=उद्वमति, यत्, तेन जलधाराबाणप्रवर्षकेण, माहेन्द्रेण = महेन्द्रसम्बन्धिना, धनुषा=चापेन, इन्द्रधनुषेति भावः, विवल्गति इव=विशेषेण गतिप्रदर्शनं करोति इव; युद्धायाह्वयते इति भावः;, विस्पष्टः = विशेषरूपेण प्रकटः यो यो अशनिस्वनः=वज्रशब्दः, तेन, रसति इव = उच्चैः क्रोशति इव; अनिलैः = पवनैः, आघूर्णति=मण्डलाकरेण भ्राम्यति इव; अहिभिः इव = सर्पतुल्यैः, नीलैः=श्यामैः, जलधरैः=वारिदैः, सान्द्रम् = गाढं यथा स्यात् तथा, क्रियाविशेषणमेतत्, धूपायति इव=धूप-प्रज्वालनोत्थितधूमसमूहव्याप्तम् इव भवति । क्वचित्तु 'धूमायति' इत्येव पाठः, धूमवद्भवतीति तदर्थः । अत्रोत्प्रेक्षा मालारूपा बोध्या । शार्दूलविक्रीडितं वृत्तम् ।२७॥

**विमर्श--**यहाँ विभिन्न कारणीभूत पदार्थों के द्वारा आकाश में विभिन्न क्रियाओं की सम्भावना की गयी है। यहाँ प्रकृत-आकाश-शोभा-विधायक विद्युद्विलसित, बलाकाशत, माहेन्द्रशरासन विकाशादि का अप्रकृत प्रज्वलन, संविहसन, विजृम्भण आदि के साथ तादात्म्याध्यास होने से उत्कट-एककोटिक संशय के उदय होने से उत्प्रेक्षा है, इसके द्योतक 'इव' आदि क्रियागतों के अभिधान से वाच्य क्रियारूप है, इसके सजातीयों का बहुत बार उल्लेख होने से यह उत्प्रेक्षा मालारूपा समझना चाहिये । इन सजातीयों की अन्योन्यसापेक्ष-रूप से स्थिति होने के कारण सजातीय संकर समझना चाहिये । ऐसा जीवानन्द का कथन है ।

धूपायति--यहाँ धूप का अर्थ धूप जलाने से उठने वाले धूम के समान प्रतीत हो रहा है, यह है । कहीं-कहीं, इसीलिये 'धूमायति' यही पाठ मिलता है । 'लोहितादिडाब्भ्यः क्यष्' (पा. सू. ३।१।१३) से आकृतिगण मानकर क्यष् प्रत्यय करके यह नामधातु का रूप है । 'रसति' का अर्थ भी शब्द करना है क्योंकि पाणिनि ने 'तुस, हस, ह्लस, रस शब्दे' ऐसा धातुपाठ किया है। शार्दूलविक्रीडित छन्द है ॥ २७ ॥

अन्वयः-- (हे) जलधर ! त्वम्, निर्लज्जः, [ असि ], यत्, दयितस्य, वेश्म, गच्छन्तीम्, माम्, स्तनितेन, भीषयित्वा, धाराहस्तैः, परामृशसि ॥ २८ ॥

**शब्दार्थ--**हे जलधर !=हे मेघ !, त्वम्=तुम, निर्लज्जः=बेशर्म, [ असि=हो ], यत्=क्योंकि, दयितस्य=प्रेमी (चारुदत्त) के, वेश्म=घर को, गच्छन्तीम्=जाती