मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 423, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३३५
विटः-—एवमेतत् ।
विद्युद्भिर्ज्वलतीव संविहसतीवोच्चैर्बलाकाशतै- माहेन्द्रेण विवल्गतीव धनुषा धाराशरोद्गारिणा । विस्पष्टाशनि-निस्वनेन रसतीवाघूर्णतोवानिलै- र्नीलैः सान्द्रमिवाहिभिर्जलधरैर्धूपायतीवाम्बरम् ॥ २७ ॥
सम्पत्ति प्राप्त करता है, धनी बन जाता है, तब वह नाना प्रकार के व्यवहार प्रकट करने लगता है। यही दशा बादलों की है ।
यहाँ मेघरूपी एक कर्ता का उन्नमन आदि अनेक क्रियाओं के साथ सम्बन्ध होने के कारण 'दीपक' अलंकार है । उत्तरार्ध में उपमा है । दोनों सापेक्ष हैं । अतः संकर अलंकार है ॥ २६ ॥
**अन्वयः-—**अम्बरम्, विद्युद्भिः, ज्वलति, इव, बलाकाशतैः, उच्चै, संविहसति, इव, धाराशरोद्गारिणा, माहेन्द्रेण, धनुषा, विवल्गति, इव, विस्पष्टाशनिस्वनेन, रसति, इव, अनिलैः आघूर्णति, इव, अहिभिः, इव, नीलैः, जलधरैः, सान्द्रम्, धूपायति, इव ॥ २७ ॥
**शब्दार्थ-—**अम्बरम् = आकाश, विद्युद्भिः = बिजलियों [ की आग ] से ज्वलति इव = जल सा रहा है; बलाकाशतैः = सैकड़ों बगुलियों से, संविहसति इव = हंस सा रहा है; धाराशरोद्गारिणा = जलधारारूपी बाणों की वर्षा करने वाले, माहेन्द्रेण = इन्द्रसम्बन्धी, धनुषा = धनुष से अर्थात् इन्द्रधनुष से, विवल्गति इव = विशेष गति अर्थात् पैंतरे बदल रहा है; विस्पष्टाशनिनिस्वनेन = वज्र [ बिजली ] के स्पष्ट स्वर से, रसति इव = गर्जन सा कर रहा है; अनिलैः = हवाओं से, आघूर्णति इव = चारो ओर घूम सा रहा है; अहिभिः इव = सापों के समान, नीलैः = काले, जलधरैः = बादलों से, सान्द्रम् = घना, धूपायति इव = धूप के समान आचरण कर रहा है अर्थात् धूप से उठने वाले धूमसमूह के समान प्रतीत हो रहा है । कहीं कहीं 'धूमायति' यही पाठ है ॥ २७ ॥
**अर्थ - विट—**ऐसा ही है—
यह आकाश बिजलियों से जल सा रहा है; सैकड़ों बगुलियों के द्वारा जोर से हंस सा रहा है; जलधारारूपी बाणों की वर्षा करने वाले इन्द्रधनुष से विशेष गति=पेंतरे दिखा सा रहा है; वज्र=बिजली के स्पष्ट स्वर से गर्जन सा कर रहा है; वायुओं के द्वारा चारो ओर घूम सा रहा है; सापों के समान नीले बादलों से घना धूपित [ धूप के धुयें ] सा प्रतीत हो रहा है ॥ २७ ॥
**टीका-—**विटोपि वसन्तसेनाकथनं समर्थयन्नाह—विद्युद्भिरिति । अम्बरम् = गगनम् [कर्तृपदमेतत्] विद्युद्भिः = तडिद्भिः, तस्याः प्रकाशैरितिभावः, ज्वलति इव =