भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

पृष्ठ 427, कुल 760 में से

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पृष्ठ 427

पञ्चमोऽङ्कः ३३६


अर्थ—और भी—

हे इन्द्र ! तुमने अहल्या [के साथ रति करने] के लिये जिस प्रकार 'मैं इन्द्र हूँ' ऐसा झूठ बोला था, उसी प्रकार मेरी भी पीड़ा को अच्छी प्रकार समझ कर बादलों को हटा दो ॥ ३० ॥

**टीका—**पुरा इन्द्रेण कृतमपराधं स्मारयित्वा आत्मनोऽपि तादृशीमेवावस्थां वर्णयन्ती इन्द्रस्यानुरोधं करोति वसन्तसेना—यदवदिति। हे शक्र ! = हे इन्द्र !, अहल्या=गौतमपत्नी, तस्याः हेतो=तां सम्भोक्तुमित्यर्थः यद्वत्=यथा, गौतमोऽस्मि=कामसन्तापनिवारणाय गौतमस्वरूपं धारयित्वा 'अहं गौतम अस्मि' इति मृषा=असत्यम्, वदसि = कथयसि, अकथयः इति भावः । तद्वत्=तथैव, मम=वसन्तसेनायाः, दुःखम् = प्रियसम्भोगलालसाजनितं कष्टम्, निरवेक्ष्य=निःशेषेण विचार्य, जलदः=मेघः, जातावेकवचनम्; निवार्यताम्=निषिध्यताम्, प्रिय-समागम-विरोधिनी मेघान् निवारयेति भावः । अत्र 'वदसि' इत्यत्र लट्लकारस्यौचित्यं साधयन्तो बुधाः भ्रान्ता एव । कामातुराया वसन्तसेनायास्तादृशप्रयोगस्यौचित्यस्य अनुभवसिद्धत्वात् । अत एव भाष्यादौ परोक्षे लिट्-प्रयोगसाधनाय 'मत्तोऽहं किहं विललाप, मत्तोऽहं किल विचचार' इत्यादौ उत्तमपुरुषत्वं साधित्वम्, अन्यथाऽत्मनः परोक्षत्वोपपादनं सर्वथासम्भवमिति विचारणीयम् । अत्र पुराणादौ वैदिकसाहित्ये च वर्णिता इन्द्राहल्याकथाऽनुसन्धेया । आर्या वृत्तम् ॥ ३० ॥

**विमर्श—**इन्द्र मेघों का देवता है। मेघ प्रियमिलन में बाधक बन रहे हैं। अतः वसन्तसेना इन्द्र को उसकी पुरानी कामावस्था में किये गये अपराध का स्मरण कराकर अपनी कामावस्था की असहनीयता का प्रतिपादन कर रही है।

इन्द्र और अहल्या का आख्यान वेदों और पुराणों में प्राप्त होता है। यह एक रूपक है। कथा के अनुसार गौतम स्नानादि के लिये अपनी कुटिया से बाहर गये थे, उसी समय कामातुर इन्द्र गौतम का रूप बनाकर आया और अहल्या से अपने को गौतम ही बता कर अपनी इच्छा की पूर्ति कर ली। बाद में रहस्योद्घाटन होने पर अहल्या ने इन्द्र को शाप दे दिया। वसन्तसेना इन्द्र को यह कह कर काम की असहनीयता का वर्णन करके उससे विघ्न न करने का अनुरोध करती है।

आख्यानों में इन्द्र जल का देवता है, अहल्या [ अ ÷ हल ÷ यत् ] बिना जोती हुई जमीन है, उसमें इंद्र द्वारा जलवर्षण का रूपक है। इसी प्रकार इन्द्र = सूर्य, रात्रि को अहल्या=रात और गौतम=चंद्र है।

'मृषा वदसि' यहाँ लट् के प्रयोग का औचित्य अनेक प्रकार से सोचा गया है। वास्तव में कामातुरा वसन्तसेना द्वारा भूत के लिये भी लट् का प्रयोग अनुचित नहीं है। क्योंकि मानसिक अनवधानता में सब उचित माना जाता है--जैसे 'मत्तोहं किल विललाप' 'बहु जगद पुरस्तात्तस्य कामातुराहम्' आदि प्रयोगों में

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