भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पञ्चमोऽङ्कः ३४५

चारुदत्तः— (आकर्ण्य) वयस्य ! ज्ञायतां किमेतदिति ।
विदूषकः—जं भवं आणवेदि । (वसन्तसेनामुपगम्य सादरम्) सोत्थि भोदीए । (यद्भवानाज्ञापयति ।) (स्वस्ति भवत्यै ।)
वसन्तसेना—अज्ज ! वन्दामि । साअदं अज्जस्स । (विटं प्रति) एसा छत्तधारिआ भावस्स ज्जेव भोदु । (आर्य वन्दे । स्वागतमार्यस्य ।) (भाव एषा छत्रधारिका भावस्यैव भवतु ।)
विटः— (स्वगतम्) अनेनोपायेन निपुणं प्रेषितोऽस्मि । (प्रकाशम्) एवं भवतु । भवति ! वसन्तसेने !

साटोप-कूट-कपटानृतजन्मभूमेः शाठ्यात्मकस्य रति-केलिकृतालयस्य ।
वेश्यापणस्य सुरतोत्सवसंग्रहस्य दाक्षिण्यपण्य-सुख-निष्क्रय-सिद्धिरस्तु ॥३६॥


विमर्श— 'तूलं च नीपप्रियककदम्बास्तु हलिप्रियं' [अमरकोश २।४।४२] के अनुसार नीप और कदम्ब पर्यायवाची हैं। अतः एक साथ प्रयोग में इनके अर्थ का अन्तर करना चाहिये। अतः नीप का अर्थ बन्धूक पुष्प करना चाहिये। अथवा कदम्ब को पुष्पवाची मानकर कदम्बपुष्पों से युक्त नीप वृक्षों से सुगन्धित—यह अर्थ करना चाहिये। यह भी सम्भव है जैसे कमलसामान्य और कमलविशेष के लिये कुछ शब्द हैं उसी प्रकार कदम्बसामान्य और विशेष के लिये यहाँ अलग-अलग शब्दों का प्रयोग हों ॥ ३५ ॥

अर्थ—चारुदत्त— (सुनकर) मित्र ! पता लगाओ यह किसकी आवाज है ?

विदूषक— आपकी जैसी आज्ञा। (वसन्तसेना के पास जाकर) आपका कल्याण हो।

वसन्तसेना— आर्य ! प्रणाम करती हूँ। आर्य आपका स्वागत है। (विट से) भाव ! यह छत्रधारिणी (परिचारिका) आपकी ही (आपके ही साथ) रहे।

अन्वयः— साटोपकूटकपटानृतजन्मभूमेः, शाठ्यात्मकस्य, रतिकेलिकृतालयस्य, सुरतोत्सवसंग्रहस्य, वेश्यापणस्य, दाक्षिण्यपण्य-सुखनिष्क्रयसिद्धिः, अस्तु ॥ ३६ ॥

शब्दार्थ— साटोपकूटकपटानृतजन्मभूमेः = आटोप = दम्भ के सहित जो कूट = माया, कपट = छल और असत्यभाषण उसकी उत्पत्तिस्थान, शाठ्यात्मकस्य = धूर्तता-रूपी, रतिकेलिकृतालयस्य = कामक्रीडा द्वारा अपना घर बनायी गयी, सुरतोत्सव-संग्रहस्य = रमण के आनन्दरूपी उत्सव के संग्रहवाली, वेश्यापणस्य = वेश्यारूपी बाजार की, दाक्षिण्यपण्यसुखनिष्क्रयसिद्धिः = उदारता से यौवनरूपी विक्रेयवस्तु का सुखपूर्वक (बिना कष्ट के) विनिमय (आदान-प्रदान) की सिद्धि, अपनी उदारता से अपने यौवन का दान करते हुये चारुदत्त के यौवन के सुख की उपलब्धि, अस्तु = हो ॥ ३६ ॥