भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३४६ | मृच्छकटिकम्

( इति निष्क्रान्तो विटः । )
वसन्तसेना-अज्जमित्तेअ ! कहिं तुम्हाणं जूदिअरो ? ( आर्यमैत्रेय ! कस्मिन् युष्माकं द्यूतकरः ? )


अर्थ-विट-( अपने में ) इस उपाय द्वारा बड़ी चतुरता से वापस कर दिया गया हूँ। ( प्रकट रूप में ) ऐसा ही हो, अच्छी बात है। माननीय वसन्तसेना जी !-

जो दम्भसहित माया, छल, एवं झूठ की जन्मस्थान [ उत्पत्तिस्थल ] है, धूर्तता ही जिसकी आत्मा है, सम्भोगक्रीडा ने जिसको अपना घर बना लिया है, सुरतक्रीडारूपी उत्सव का जहाँ संग्रह है, ऐसे वेश्यारूपी बाजार की उदारता से ( न कि धन से ) बिकने वाली ( तुम्हारी भरी जवानीरूपी ) वस्तु की सुखपूर्वक ( बिना किसी कष्ट के ) आदान-प्रदान की सिद्धि होवे, अर्थात् तुम धन का लोभ छोड़कर अपनी जवानी का आनन्द चारुदत्त को दो और उसकी जवानी का सुख स्वयं प्राप्त करो ॥ ३६ ॥

टीका-चारुदत्तं प्रति गमनोत्सुकां वसन्तसेनां विटः आशीर्वचोभिविभूषयति-आटोपः=दम्भः, तेन सहितम्, कूटम्=माया, कपटम्=छलम्, अनृतम्=असत्यभाषणम् च-एतेषां जन्मभूमिः = उत्पत्तिस्थलस्य, शाठ्यम्=धूर्तता एव आत्मा=स्वभावः यस्य तादृशस्य, रतिकेल्या=सुरतक्रीडया, कृतः=विहितः, आलयः=आस्पदं यत्र तस्य, यद्वा रतिकेलये=रतिक्रीडार्थं कृतः=विहितः यः आलयः=निकेतनं यथाभूतस्वसुरतम्=सम्भोग एवं उत्सवः=आनन्दः, तस्य संग्रहः=सम्यग् ग्रहणम्, आस्वादः यत्र तथाभूतस्य, वेश्यापणस्य=वेश्यारूपस्य आपणस्य=विपणेः, क्रयविक्रयस्थानस्येति भावः, दाक्षिण्येन = औदार्येण न तु अर्थविनियोगेन, पण्यस्य=विक्रेयस्य=स्वयौवनस्येति भावः, सुखेन=अनायासेन, निष्क्रयः=विनिमयः तस्य सिद्धिः=सफलता, अस्तु = भवतु । स्वकीयमसामान्यमौदार्यं प्रकटय्य चारुदत्तेन सह निरतिशयं सम्भोगसुखमनुभूयताम्, परस्परं चोभौ एतत्सुखमनुभवतामिति भावः । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ ३६ ॥

विमर्श-आटोपो दम्भः, तेन सहितम्=इति विद्याधरः । वेश्यापणस्य=वेश्या के व्यवहार की, वेश्यारूपी बाजार की । निष्क्रयः=विनिमय, अदला-बदली । दोनों की समान प्रवृत्ति से ही संभोगसुखनिष्पत्ति होती है । वसन्ततिलका छन्द है । समास के लिये संस्कृत टीका देखें ॥ ३६ ॥

( ऐसा कह कर विट निकल जाता है । )
अर्थ-वसन्तसेना-आर्य मैत्रेय ! तुम्हारा जुआरी कहाँ हैं ?