मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३४७
विदूषकः---( स्वगतम् ) हीही भो ! जुदिअरो त्ति भणन्तीए अलङ्किदो पिअवअस्सो । ( प्रकाशम् ) भोदि ! एसो क्खु सुक्खरुक्ख-वाडिआए ! ( हीही भोः ! द्यूतकर इति भणन्त्या अलङ्कृतः प्रियवयस्यः । भवति ! एष खलु शुष्क-वृक्ष-वाटिकायाम् । )
वसन्तसेना—अज्ज ! का तुम्हाणं सुक्ख-रुक्ख-बाडिआ वुच्चदि ?
( आर्ये ! का युष्माकं शुष्क-वृक्ष-वाटिका उच्यते ? )
विदूषकः—भोदि ! जहिं ण खाईअदि ण पीईअदि । ( भवति ! यस्मिन् न खाद्यते न पीयते । )
( वसन्तसेना स्मितं करोति । )
विदूषकः---ता पविसदु भोदी ! ( तत्प्रविशतु भवती । )
वसन्तसेना— ( जनान्तिकम् ) एत्थ पविसिअ कं मए भणिदव्यं ? ( अत्र प्रविश्य किं मया भणितव्यम् ? )
चेटी—जूदिअर ! अवि सुहो दे पदोसो ? त्ति । ( द्यूतकर ! अपि सुखस्ते प्रदोषः ? इति । )
वसन्तसेना—अवि पारइस्सं ? ( अपि पारयिष्यामि ? )
चेटी—अवसरो ज्जेव पारइस्यदि । ( अवसर एव पारयिष्यति । )
विदूषकः---पविसदु भोदी । ( प्रविशतु भवती । )
वसन्तसेना— ( प्रविश्योपसृत्य च पुष्पैस्ताडयन्ती ) अइ जूदिअर ! अवि-सुहो दे पदोसो ? ( अयि द्यूतकर ! अपि सुखस्ते प्रदोषः ? )
विदूषक— ( अपने में ) आश्चर्य है ! जुँआरी ऐसा कहती हुई इसने आर्य चारुदत्त को विभूषित कर दिया है । ( प्रकट रूप में ) माननीये ! वे इस सूखे वृक्षों वाली फुलवाड़ी में हैं ।
**वसन्तसेना—**आर्ये ! सूखे वृक्षों वाली आपकी फुलवाड़ी कौन है ?
**विदूषक—**माननीये ! जहाँ न कुछ खाया जाता है और न पिया जाता है ।
( वसन्तसेना मुस्कराती है । )
**विदूषक—**तो आप भीतर चलिये ।
वसन्तसेना— ( जनान्तिक ) यहाँ जाकर मुझे क्या कहना चाहिये ?
**चेटी—**जुआरी ! आपकी शाम सुखद तो है ? [ ऐसा कहिये । ]
**वसन्तसेना—**ऐसा कह सकूँगी ?
**चेटी—**समय ही तुम्हें समर्थ बना देगा ।
**विदूषक—**आप भीतर चलें ।
वसन्तसेना— ( प्रवेश करके, पास जाकर ) फूलों से मारती हुई जुआरी ! तुम्हारी आपकी शाम सुखद तो है ?