मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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विदूषकः-- जं भवं आणवेदि । ( यद्भावानाज्ञापयति । )
चेटी-- अज्जमित्तेअ ! चिट्ठ तुमं, अहं ज्जेव अज्जअं सुस्सूसइस्सं । ( आर्यमैत्रेय ! तिष्ठ त्वम्, अहमेवार्यां शुश्रूषयिष्यामि । ) ( तथा करोति । )
विदूषकः-- ( अपवारितकेन । ) भो वअस्स ! पुच्छामि दाव तत्थभोदिं किं पि । ( भो वयस्य ! पृच्छामि तावदत्रभवतीं किमपि । )
चारुदत्तः-- एवं क्रियताम् ।
विदूषकः-- ( प्रकाशम् । ) अध किं णिमित्तं ष्ण इदिस पणट्ठचन्दालोए दुद्दिण अन्धआरे आभदा भोदि ? ( अथ किं निमित्तं पुनरीदृशे प्रणष्टचन्द्रा-लोके दुर्दिनान्धकारे आगता भवती ? )
चेटी-- अज्जए ! उजुओ वम्हणो । ( आर्ये ! ऋजुको ब्राह्मणः । )
वसन्तसेना-- णं णिउणोत्ति भणाहि । ( ननु निपुण इति भण । )
चेटी-- एषा क्खु अज्जआ एव्वं पुच्छिदुं आवदा,—केत्तिअं ताए रअणावलीए मुल्लं त्ति । ( एषा खलु आर्या एवं प्रष्टुमागता,—'कियत्तस्या रत्नावल्या मूल्यम्' इति । )
विदूषकः-- ( जनान्तिकम् । ) भो ! भणितं मए, जहा अप्पमुल्ला रअणावली, बहुमुल्लं सुवण्णभण्डअं, ण परितुट्ठा, अवरं मग्गिदुं आवदा ।
होता है। यहाँ ऐसी उपमा देनी चाहिये थी जिससे दोनों स्तनों का महत्त्व सिद्ध होता ॥ ३८ ॥
अर्थ-- इस लिये हे मित्र ! वसन्तसेना के दोनों वस्त्र गीले हो गये हैं, दूसरे उत्कृष्ट कोटि के वस्त्र ( साड़ी आदि ) ले आइये ।'
विदूषक-- आपकी जो आज्ञा ।
चेटी-- आर्य मैत्रेय ! आप बैठिये=रहने दीजिये, मैं ही आर्या की सेवा करूँगी । ( वैसा ही करने लगती है । )
विदूषक-- ( जनान्तिक ) हे मित्र ! श्रीमती वसन्तसेना से कुछ पूछूँ ?
चारुदत्त-- ऐसा ही करो, अर्थात् पूछो ।
विदूषक-- ( प्रकटरूप में ) चन्द्रमा की चाँदनी से शून्य दुर्दिन से होने वाले इस अन्धकार में आप किस लिये आयीं हैं ?
चेटी-- आर्ये ! यह ब्राह्मण बड़ा सीधा है ।
वसन्तसेना-- अरे, चालाक है, ऐसा कहो ।
चेटी-- आर्या यह पूछने के लिये आई हैं कि 'उस रत्नावली की क्या कीमत है ।'
विदूषक-- ( जनान्तिक ) हे मित्र ! मैंने कहा था 'वह रत्नावली कम कीमत