मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३५१
( भोः ! भणितं मया—यथा अल्पमूल्या रत्नावली, बहुमूल्यं सुवर्णभाण्डकम्, न परितुष्टा, अपरं याचितुमागता । )
चेटी— सा क्खु अज्जआए अत्तणकेरकेत्ति भणिअ जूदे हारिदा, सोअ सहिअ राम्रो-वात्यहारी ण जाणीअदि कहिं गदो त्ति । ( सा खलु आर्यया आत्मीयेति भणित्वा द्यूते हारिता । स च सभिको राजवार्त्ताहारी न ज्ञायते कुत्र गत इति । )
विदूषकः— भोदि ! मन्तिदं ज्जेव मन्तोअदि । ( भवति ! मन्त्रितमेव मन्यते । )
चेटी— जाव सो अण्णेसीअदि, ताव एदं ज्जेव गेण्ह सुवण्णभण्डअं । ( इति दर्शयति । ) ( यावत् सः अन्विष्यते, तावदिदमेव गृहाण सुवर्णभाण्डकम् । )
( विदूषको विचारयति । )
चेटी— अदिमत्तं अज्जो णिज्झाअदि, ता कि दिट्ठपुरुव्वं दे ?
( अतिमात्रमार्यो निध्यायति, तत् किं दृष्टपूर्वं ते ? )
विदूषकः— भोदि ! सिप्पकुसलदाए ओवन्धेदि दिट्ठि । ( भवति ! शिल्प-कुशलतया अवबध्नाति दृष्टिम् । )
चेटी— अज्ज ! वञ्चिदोसि दिट्ठोए । तं ज्जेव एदं सुवण्णभण्डअं ।
( आर्य ! वञ्चितोऽसि दृष्ट्या । तदेवैतत् सुवर्णभाण्डकम् । )
की है और सुवर्णभाण्ड अधिक कीमत का, अतः असन्तुष्ट यह और मांगने के लिये आई है ।
चेटी— उस रत्नावली को 'अपनी है यह मानकर' आर्या जुआ में हार गयीं है। और वह जुआ खिलाने वाला, राजा का सन्देशवाहक कहीं चला गया है; पता नहीं चला ।
विदूषक— श्रीमती जी ! आप तो (मेरी) कही हुई ही बात दोहरा रही हैं ।
चेटी— जब तक वह प्रधान जुआड़ी खोजा जाता है तब तक इस सुवर्णभाण्ड को ग्रहण कर लीजिये । ( ऐसा कह कर सुवर्णभाण्ड दिखलाती है । )
( विदूषक सोचता है । )
चेटी— आर्य ! आप बहुत गम्भीरता से देख रहें हैं, तो क्या यह पहले से देखा हुआ है ।
विदूषक— श्रीमतीजी ! निर्माण की कुशलता के कारण यह आँख को आकृष्ट कर रहा है ।
चेटी— आर्य ! आपकी आंखें धोखा दे रहीं हैं, यह वही सुवर्णभाण्ड है ।