मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपंचमोऽङ्कः ३५३
विदूषकः—भो वअस्स ! सच्चं सवामि बम्हण्णेण । ( भो वयस्य ! सत्यं शपे ब्राह्मण्येन ।)
चारुदत्तः—प्रियं नः प्रियम् ।
विदूषकः—(जनान्तिकम् । ) भो ! पुच्छामि णं कुदो एदं समासादिदं त्ति ? ( भोः ! पृच्छामि ननु कुत इदं समासादितमिति ? )
चारुदत्तः—को दोषः ?
विदूषकः—( चेट्याः कर्णे ) एव्वं विअ । ( एवमिव । )
चेटी—( विदूषकस्य कर्णे ) एव्वं विअ । ( एवमिव । )
चारुदत्तः—किमिदं कथ्यते ? कि वयं बाह्याः ?
विदूषकः—( चारुदत्तस्य कर्णे । ) एव्वं विअ । ( एवमिव । )
चारुदत्तः—भद्रे ! सत्यं तदवेदं सुवर्णभाण्डम् ?
चेटी—अज्ज ! अध इं ? ( आर्य ! अथ किम् ? )
रूपेण वसन्तसेनया प्रकटीकृतः, किन्तु, सत्यम्, इयम्, बिडम्बना एव=प्रतारणा एव । अस्माभिस्तु तन्न्यासस्य प्रत्यर्पणाय छलमाश्रित्य रत्नावली प्रेषिता किन्तु वसन्तसेनया अस्माकं छलं जानन्त्या तदत्र प्रकटीकृतमिति भावः । अत्र विषमालङ्कारः, पथ्यावक्त्रं वृत्तम् ॥ ३६ ॥
विमर्श—चारुदत्त वसन्तसेना द्वारा दिखाये गये सुवर्णभाण्ड को देख कर अपने उस छल को सोंचने लगता है। उसे दुःख है कि उसने धरोहर के बदले में जो रत्नावली भेजी थी और जिस प्रकार बहाना बनाया था वही अस्त्र वसन्तसेना ने भी अपना लिया। साथ ही उसका व्याज सत्य प्रतीत हो रहा है ॥ ३६ ॥
अर्थ—विदूषक—हे मित्र ! मैं अपने ब्राह्मणत्व की शपथ लेकर कहता हूँ कि यह सच है।
चारुदत्त—हमारे लिये अच्छा है, अच्छा है।
विदूषक—( जनान्तिक ) मित्र ! पूछूँ—'यह कहाँ से प्राप्त हुआ है ।'—
चारुदत्त—क्या बुराई है ? ( अर्थात् पूछो । )
विदूषक—( चेटी के कान में ) ऐसा ही था ?
चेटी—( विदूषक के कान में ) वह ऐसा ही था ।
चारुदत्त—यह क्या कहा जा रहा है ? क्या हम लोग बाहरी हैं ?
विदूषक—( चारुदत्त के कान में ) ऐसा ही था ।
चारुदत्त—भद्रे ! सच ही यह वही सुवर्णभाण्ड है ?
चेटी—आर्य ! और क्या ?
२३ मृ०