भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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१५४ | मृच्छकटिकम्

चारुदत्तः— भद्रे ! न कदाचित् प्रियनिवेदनं निष्फलीकृतं मया । तद् गृह्यतां पारितोषिकमिदमङ्गुलीयकम् । (इत्यनङ्गुलीयकं हस्तमवलोक्य लज्जां नाटयति ।)

वसन्तसेना— ( आत्मगतम् ) अदो ज्जेव कामीअसि । ( अत एव काम्यसे । )

चारुदत्तः— ( जनान्तिकम् । ) भोः ! कष्टम् ।

धनेवियुक्तस्य नरस्य लोके किं जीवितेनादित एव तावत् ।
यस्य प्रतीकारनिरर्थकत्वात् कोपप्रसादा विफलीभवन्ति ॥ ४० ॥


चारुदत्त— भद्रे ! मैंने अच्छी बात कहना कभी निष्फल नहीं किया है। [अर्थात् वक्ता को उसका पुरस्कार अवश्य दिया है । ] इसलिये पुरस्कार रूप में यह अँगूठी ग्रहण करो। ( ऐसा कह कर अंगूठीशून्य हाथ को देखकर लज्जा का अभिनय करता है।)

वसन्तसेना— ( स्वागत ) इसीलिये तो मैं तुम्हें चाहती हूँ ।

अन्वयः— लोके, धनैः, वियुक्तस्य, नरस्य, आदितः, एव जीवितेन, किम्, तावत्; यस्य, कोपप्रसादाः, प्रतीकारनिरर्थकत्वात्, विफलीभवन्ति ॥ ४० ॥

शब्दार्थ— लोके=संसार में, धनैः=धन से, वियुक्तस्य=रहित, नरस्य=मनुष्य के, आदितः=आदिकाल अर्थात् जन्मसमय से, एव=ही, जीवितेन=जीवित रहने से, किं तावत्=क्या लाभ ? अर्थात् कोई लाभ नहीं; यस्य=जिसके, कोपप्रसादाः=प्रसन्नता और अप्रसन्नता, खुशी और नाराजगी, प्रतीकारनिरर्थकत्वात्=प्रतीकार में समर्थ न होने के कारण, विफलीभवन्ति=बेकार हो जाते हैं ॥ ४० ॥

अर्थ— चारुदत्त— (जनान्तिक) मित्र ! कष्ट है—

संसार में धनहीन व्यक्ति के जन्म से ही लेकर जीवित रहने का क्या लाभ ? जिसकी प्रसन्नता और अप्रसन्नता दोनों ही, बदला चुकाने में असमर्थ होने के कारण, व्यर्थ हो जाती है, अर्थात् धनहीन व्यक्ति खुश होकर कुछ दे नहीं सकता और नाराज होकर कुछ बिगाड़ नहीं सकता ॥ ४० ॥

टीका— प्रियसम्वादप्रदायिन्यै चेट्यै स्वप्रकृत्यनुसारं पुरस्कारं प्रदातुमसमर्थः चारुदत्तः धनहीनस्य नरस्य जीवनवैफल्यं प्रतिपादयति—धनैरिति । लोके=संसारे, धनैः=सम्पद्भिः, वियुक्तस्य=रहितस्य, नरस्य=पुरुषस्य, आदितः एव=जन्मकालादेव, जीवितेन = प्राणधारणेन, किम्, न कोऽपि लाभ इत्यर्थः, यस्य = धनहीनपुरुषस्य, कोपप्रसादाः = क्रोधानुग्रहाः, प्रतीकारे = प्रतिशोधे निरर्थकत्वात्=निर्विषयकत्वात्, प्रतीकारकरणासमर्थत्वादिति भावः, विफलीभवन्ति=निष्फलाः जायन्ते । निर्धनो नरः प्रसन्नो भूत्वाऽपि किमपि दातुं न समर्थः, रुष्टो भूत्वापि किमप्यनिष्ठं कर्तुं न

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