भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३५६मृच्छकटिकम्

विदूषकः— (जनान्तिकम् ।) भो ! अलं अदिमेत्तं सन्तप्पिदेण ( प्रकाशं सपरिहासम् ।) भोदि ! समप्पीअदु मम केरिआ व्हाणा-साडिआ । ( भोः ! अलमतिमात्रं सन्तापितेन ।) ( भवति ! समर्प्यतां मम स्नानशाटिका ।)


च, समाः, खलु, यद्, दृष्टपूर्वजनसंगमविस्मृतानाम्, ( दरिद्राणाम् ) परितोषकालाः, एवम्, विफलीभवन्ति ॥ ४२ ॥

शब्दार्थ— दरिद्राः = गरीब, पुरुषाः=लोग, शून्यैः=सूने, गृहैः=घरों के, च=और, तोयरहितैः=पानी से रहित, कूपैः=कुओं के, च=और, शीर्णैः=सूख कर नष्ट हुये, तरुभिः=वृक्षों के, समाः=बराबर हैं, यत्=क्योंकि, दृष्टपूर्वजनसंगमविस्मृतानाम्=पूर्व-परिचित लोगों के मिलने पर आतुरता में अपनी वर्तमान दरिद्रता को भूल जाने वाले, ( दरिद्राणाम् = निर्धनों के ) परितोषकालाः=परितोष-प्रदान के अवसर, एवम्=इसी प्रकार, विफलाः=फलशून्य, भवन्ति=होते हैं ॥ ४२ ॥

अर्थ—और भी— गरीब लोग सूने घरों, पानीरहित कुओं और सूखे वृक्षों के समान हैं, क्योंकि पूर्व काल के परिचित लोगों के मिलने पर आतुरता के कारण अपनी वर्तमान दरिद्रता को भूल जाने वाले दरिद्र लोगों के परितोषकाल ( पुरस्कार-प्रदान करने के अवसर ) इसी प्रकार व्यर्थ होते हैं। (जैसे मैं पुरस्कार के समय भी पुरस्कार नहीं दे पा रहा हूँ क्योंकि निर्धन हूँ।) ॥ ४२ ॥

टीका— दरिद्राणामन्यैः पदार्थैः साम्यं प्रतिपादयन् परितोषकालस्य वैयर्थ्यमाह-शून्यैरिति । दरिद्राः = निर्धनाः, पुरुषाः=जनाः, शून्यैः=निवासिजनरहितैः, गृहैः=भवनैः, तोयरहितैः=जलरहितैः, कूपैः, च=तथा, शीर्णैः=शुष्कतया पत्रादिरहितैः, तरुभिः=वृक्षैः, समाः=समानाः, खलु=निश्चयेन; यतः=यस्मात्, दृष्टपूर्वजनस्य=परिचितजनस्य, सङ्गमेन=संगमजन्यानन्दातिशयेन हेतुना, विस्मृतानाम्=विद्यमाननिजदैन्यविस्मरणवताम्, दरिद्राणाम्, परितोषकालाः=परितोषप्रदानावसराः, एवम्=अनेन रूपेण मम यथा, विफलाः=निष्फलाः, भवन्ति=जायन्ते । प्रकृष्टानन्ददायकसमाचारप्रदर्शनादिकाले दानयोग्यसमयेऽपि निर्धनतया दानकरणासामर्थ्यात् तस्य कालस्य वैफल्यमिति भावः। अत्रापि मालोपमाऽप्रस्तुतप्रशंसा च । वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ ४२ ॥

विमर्श— पहले धनी होकर बाद में जो निर्धन हो जाता है उसे जब अपने पूर्वपरिचित व्यक्ति मिलते हैं तो हर्षातिरेक में अपनी वर्तमान दरिद्रता का ध्यान न रखकर परितोष आदि देने की इच्छा करने लगता है, परन्तु धनाभाव के कारण दे नहीं पाता है। इस प्रकार उस समय की विफलता हो जाती है ॥ ४२ ॥

अर्थ-विदूषकः- [जनान्तिक] हे मित्र ! अत्यधिक सन्ताप मत करिये [प्रकट-