मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 453, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽङ्कः ३६५
तदेहि, अभ्यन्तरमेव प्रविशावः। (इत्युत्थाय परिक्रामति।)
प्रिये पश्य—
तालीषु तारं विटपेषु मन्द्रं शिलासु रूक्षं सलिलेषु चण्डम्।
सङ्गीतवीणा इव ताड्यमानास्तालानुसारेण पतन्ति धाराः ॥ ५२ ॥
शब्दार्थ—विद्युज्जिह्वेन=बिजलीरूप जीभवाले, महेन्द्रचापोच्छ्रितायतभुजेन=इन्द्रधनुष रूपी ऊपर उठी हुई और लम्बी भुजाओं वाले, जलधरविवृद्धहनुना=मेघरूपी बढ़ी हुई ठोढ़ीवाले, अन्तरीक्षेण = आकाश ने, इदम्=यह, विजृम्भितम् इव=मानो जम्हाई ली है ॥ ५१ ॥
अर्थ—( ऊपर देखकर ) अरे इन्द्रधनुष, प्रिये ! देखो, देखो—
बिजलीरूपी जीभवाले, इन्द्रधनुषरूपी ऊपर उठी हुई और लम्बी भुजाओंवाले, मेघरूपी बढ़ी हुई ठोढ़ीवाले आकाश ने मानों यह जम्हाई ली है ॥ ५१ ॥
टीका—आकाशसौन्दर्यं प्रतिपादयति—विद्युदिति। विद्युत् एव=तडित् एव जिह्वा=रसना यस्य सः तेन, महेन्द्रस्य=शक्रस्य चापः=धनुः एव, उच्छ्रितौ=उत्थापितौ, आयतौ=विशालौ च, भुजौ यस्य तेन, जलधरः=वारिदः एव, विवृद्धा=वृद्धिं प्राप्ता, लम्बितेति भावः, हनुः = चिबुकप्रदेशः यस्य तेन, अन्तरीक्षेण=आकाशेन, विजृम्भितम् इव=मुखव्यादानम् इव कृतमित्यर्थः। अत्र विद्युदादौ जिह्वाद्यारोपात् रूपकम्, अन्ते चोत्प्रेक्षेति। आर्या वृत्तम् ॥ ५१ ॥
विमर्श—वसन्तसेना चारुदत्त के समीप प्रदोषकाल में पहुँचती है। वार्तालाप के प्रसंग में और अधिक देर होने से रात हो जाती है। जैसा कि श्लोक संख्या ४४ के 'अनुव्यसनाद्' आदि पदों से स्पष्ट है। इस परिस्थिति में 'इन्द्रधनुष' की कल्पना का औचित्य नहीं प्रतीत होता है। यदि यह मान लिया जाय कि पहले बादलों की अधिकता से असमय में ही सन्ध्या की प्रतीत होने लगी थी, वर्षा हो जाने पर आकाश स्वच्छ हो गया और कुछ प्रकाश आ गया। फलतः इन्द्रधनुष की कल्पना हो सकती है। अथवा वसन्तसेना की कामुकता बढ़ाने के लिये चारुदत्त ने यों ही कह दिया हो। बिजली, इन्द्रचाप और जलधर पर जिह्वा, भुजा और हनु का आरोप होने से रूपक है। और इव से उत्प्रेक्षा प्रतीत हो रही है। 'अन्तरीक्षेण' और 'अन्तरिक्षेण' दोनों पाठ मिलते हैं। आर्या छन्द है ॥ ५१ ॥
अर्थ—तो आइये, [ हम लोग ] भीतर ही चलें। ( ऐसा कहकर उठ कर घूमता है।)---
अन्वयः—तालानुसारेण, ताड्यमानाः, सङ्गीतवीणाः, इव, धाराः, तालीषु, तारम्, विटपेषु, मन्द्रम्, शिलासु, रूक्षम्, सलिलेषु, चण्डम्, पतन्ति ॥ ५२ ॥
शब्दार्थ—तालानुसारेण=लयताल के अनुसार, ताड्यमानाः=बजाई जाती हुईं, संगीतवीणाः=संगीत की वीणाओं के, इव=समान, धाराः=जलधारायें, तालीषु=