भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 454

३६६ | मृच्छकटिकम्

( इति निष्क्रान्ताः सर्वे । )

दुर्द्दिनो नाम पञ्चमोऽङ्कः ।

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ताड़ के पत्तों पर, तारम्=ऊँचे स्वर से, विटपेषु=पेड़ों पर, मन्द्रम्=गम्भीर ध्वनि के साथ, शिलासु=पहाड़ों की चट्टानों पर, रुक्षम्=कर्कश, और, सलिलेषु=जल में, चण्डम्=प्रचण्ड ध्वनि के साथ, पतन्ति=गिर रहीं हैं ।। ५२ ।।

अर्थ—प्रिये ! देखो—
लय के अनुसार बजायी जातीं हुईं संगीत की वीणाओं के समान ये पानी की धारायें ताड़ के पत्तों पर ऊँची ध्वनि से, पेड़ों पर गंभीर ध्वनि से, चट्टानों पर कर्कश ध्वनि से और पानी में प्रचण्ड ध्वनि से गिर रहीं हैं ।। ५२ ।।

( सब निकल जाते हैं । )

इस प्रकार दुर्द्दिन नामक पाँचवाँ अङ्क समाप्त हुआ ।

टीका—जलधारापातेन जन्यं विविधध्वनिं निरूपयति—तालीष्विति । तालानुसारेण = संगीतशास्त्रप्रतिपादिततालसिद्धान्तानुसारेण, ताड्यमानाः=वाद्यमानाः, संगीतवीणाः=संगीतकार्यक्रमे प्रयुक्तवीणाः, इव, धाराः=वर्षाजलधाराः, तालीषु=तालाख्यवृक्षस्य पत्रेषु, तारम्=उच्चैः यथा स्यात् तथा, विटपेषु=पादपेषु, मन्द्रम्=गम्भीरं यथा स्यात् तथा, शिलासु=पाषाणखण्डेषु रुक्षम्=कर्कशं कठिनं वा यथा स्यात् तथा, सलिलेषु = तडागादिस्थितजलेषु, चण्डम् = प्रचण्डं यथा स्यात् तथा, पतन्ति=क्षरन्ति, वर्षन्तीति भावः । अत्रोपमालङ्कारः, उपजातिर्वृत्तम् ।। ५२ ।।

**विमर्श—**वर्षा के समय में बादलों से गिरने वाली जलधाराओं की भिन्न-भिन्न पदार्थों पर अलग-अलग प्रकार की आवाजें होना सर्वानुभवसिद्ध है । जलधारा सभी देखने में एक-सी होती हैं । परन्तु ध्वनियाँ अलग-अलग होती हैं । जैसे वीणा के तार देखने में एक जैसे ही लगते हैं परन्तु उनकी ध्वनियां अलगअलग प्रतीत होती हैं, वही सादृश्य यहाँ प्रतिपादित है । 'धाराः' और 'ताड्यमानाः' ये दोनों बहुवचनान्त हैं अतः उपमान 'वीणाः' भी बहुवचनान्त रहना उचित है । यहाँ वीणा का तात्पर्य वीणा के तारों से है जिन्हें बजाया जाता है ।। ५२ ।।

॥ इस प्रकार जयशङ्कर लाल त्रिपाठी-विरचित 'भावप्रकाशिका' संस्कृत-हिन्दी व्याख्या में मृच्छकटिक का पञ्चम अङ्क समाप्त हुआ ॥

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