मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः
( ततः प्रविशति चेटी )
चेटी— कहं अज्ज वि अज्जआ ण विवुज्झदि । भोदु, पविसिअ पडि-
वोधइस्सं । ( कथमद्यापि आर्या न विबुध्यते । भवतु, प्रविश्य प्रतिबोधयिष्यामि ।)
( इति नाट्ये'न परिक्रामति । )
( ततः प्रविशति आच्छादितशरीरा प्रसुप्ता वसन्तसेना । )
चेटी— ( निरूप्य ) उत्थेदु उत्थेदु अज्जआ । पभादं संवृत्तं । ( उत्तिष्ठतु उत्तिष्ठतु आर्या । प्रभातं संवृत्तम् )
वसन्तसेना— ( प्रतिबुध्य ) कहं रत्ति ज्जेव पभादं संवृत्तं ? ( कथं रात्रिरेव प्रभातं संवृत्तम् ? )
चेटी— अम्हाणं एसो पभादो, अज्जआए उण रत्तिज्जेव । ( अस्माक-मेतत् प्रभातम् आर्यायाः पुनः रात्रिरेव )
शब्दार्थ— विबुध्यते = जाग रही है। प्रतिबोधयिष्यामि = जगाऊँगी । आच्छादितशरीरा = चादर आदि से ढके हुये शरीरवाली । प्रसुप्ता = गंभीर रूप से सोती हुई । पुष्पकरण्डकम् = यह एक बगीचे का नाम है । समादिश्य = आदेश देकर । प्रवहणम् = गाड़ी । कस्मिन् = किस स्थान पर । निध्यातः = देखा गया । अभ्यन्तरचतुःशालकम् = भीतर के चौशाल में । सन्तप्यते = दुःखी हो रहे हैं । परिजनः = सम्बन्धी जन । सन्तप्तव्यम् = दुःखी होना चाहिये । गुणनिर्जिता = गुणों से वशीभूत । कण्ठाभरणम् = गले का गहना = शोभा । प्रसादीकृता = सेवा में समर्पित की है । आभरणविशेषः = विशेष अलङ्कार ।
अर्थ— ( इसके बाद चेटी प्रवेश करती है । )
चेटी— क्या आर्या [ वसन्तसेना ] सोकर अभी भी नहीं जागीं=उठीं है ? अच्छा, ( भीतर ) जाकर जगाऊँगी । [ जगाती हूँ । ]
[ ऐसा कहकर अभिनय के साथ घूमती है । ]
[ इसके बाद वस्त्रादि से ढके हुये शरीरवाली सोती हुई वसन्तसेना प्रवेश करती है । ]
चेटी— ( देख कर ) आर्ये ! उठिये, उठिये । सबेरा हो गया ।
वसन्तसेना— ( जाग कर ) क्या रात ही सबेरा बन गयी ?
चेटी— हम लोगों का तो यह सबेरा है, किन्तु आर्या की तो रात ही है ।