मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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**वसन्तसेना--**हज्जे ! कहिं उण तुम्हाणं जूदिअरो ? ( हञ्जे ! कस्मिन् पुनर्युष्माकं द्यूतकरः ? )
**चेटी--**अज्जए ! वड्ढमाणअं समादिसिअ पुप्फकरण्डअं जिण्णुज्जाणं गदो अज्जचारुदत्तो । ( आर्ये ! वर्द्धमानकं समादिश्य पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं गतः आर्यचारुदत्तः । )
**वसन्तसेना--**किं समादिसिअ ? ( किं समादिश्य ? )
**चेटी--**जोएहि रात्तीए पवहणं । वसन्तसेना गच्छदु, त्ति । ( योजय रात्रौ प्रवहणम् । वसन्तसेना गच्छतु इति )
**वसन्तसेना--**हज्जे ! कहिं मए गन्तव्वं ? ( हञ्जे ! कस्मिन् मया गन्तव्यम् ? )
**चेटी--**अज्जए ! जहिं चारुदत्तो । ( आर्ये ! यस्मिन् चारुदत्तः । )
वसन्तसेना--( चेटीं परिष्वज्य ) हज्जे ! सुट्ठु ण णिज्झाइदो रात्तीए, ता अज्ज पच्चक्खं पेक्खिस्सं । हज्जे ! किं पविट्ठा अहं इह अब्भन्तरचदुस्सालअं ? ( हञ्जे ! सुष्ठु न निध्यातो रात्रौ, तदद्य प्रत्यक्षं प्रेक्षिष्ये । हञ्जे ! किं प्रविष्टा अहमिह अभ्यन्तरचतुःशालकम् ? )
**चेटी--**ण केवलं अब्भन्तरचदुस्सालअं, सव्वजणस्स वि हिअअं पविट्ठा । ( न केवलमभ्यन्तरचतुःशालकम्, सर्वजनस्यापि हृदयं प्रविष्टा । )
**वसन्तसेना--**सखि ! तुम लोगों का जुआड़ी ( चारुदत्त ) कहाँ है ?
**चेटी--**आर्ये ! वर्धमानक [ गाड़ीवान ] को आदेश देकर आर्य चारुदत्त पुष्पकरण्डक नामक जीर्ण बगीचे में गये हैं ।
**वसन्तसेना--**क्या आदेश देकर ?
**चेटी--**रात में ही गाड़ी तैयार कर लो । वसन्तसेना चली जाय [ यह कहा है ] ।
**वसन्तसेना--**सखि ! मुझे कहाँ जाना है ?
**चेटी--**आर्ये ! जहाँ आर्य चारुदत्त गये हैं ।
वसन्तसेना--( चेटी का आलिंगन करके ) सखि ! रात में ( मैंने चारुदत्त को ) अच्छी तरह नहीं देखा था, अतः आज ( दिन में ) प्रत्यक्ष=अच्छी तरह से देखूंगी । सखि ! क्या मैं यहाँ भीतरी चौशाल में आ गयी हूँ ?
**चेटी--**केवल भीतरी चौशाल=अन्तःपुर में ही नहीं, अपितु सभी लोगों के हृदय में प्रवेश कर चुकी हैं ।