मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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षष्ठोऽङ्कः
वसन्तसेना— अवि सन्तप्पदि चारुदत्तस्स परिअणो? (अपि सन्तप्यते चारुदत्तस्य परिजनः ? )
चेटी— सन्तप्पिस्सदि । ( सन्तप्स्यति । )
वसन्तसेना— कदा ? ( कदा ? )
चेटी— जदा अज्जआ गमिस्सदि । ( यदा आर्या गमिष्यति । )
वसन्तसेना— तदो मए पढमं सन्तप्पिदव्वं । ( सानुनयम् ) हज्जे ! गेण्ह एदं रअणावलिं, मम बहिणिआए अज्जाधूदाए गदूअ समप्पेहि । भणिदव्वं अ—‘अहं सिरिचारुदत्तस्स गुणणिज्जिदा दासी, तदा तुम्हाणं पि; ता एसो तुह ज्जेव कण्ठाहरणं होदु रअणावली । ( ततो मया प्रथमं सन्तप्तव्यम् । हञ्जे ! गृहाण एतां रत्नावलीम्, मम भगिन्यै आर्याधूतायै गत्वा समर्पय, वक्तव्यञ्च—‘अहं श्रीचारुदत्तस्य गुणनिर्जिता दासी, तदा युष्माकमपि; तदेषा तवैव कण्ठाभरणं भवतु रत्नावली' । )
चेटी— अज्जए ! कुविस्सदि चारुदत्तो अज्जाए दाव । ( आर्ये ! कुपिष्यति चारुदत्त आर्यायै तावत् । )
वसन्तसेना— गच्छ, ण कुविस्सदि । ( गच्छ, न कोपिष्यति । )
चेटी— ( गृहीत्वा ) जं अज्जआ आणवेदि । ( इति निष्क्रम्य पुनः प्रविशति । )
अज्जए ! भणादि अज्जा धूदा—अज्जउत्तेण तुम्हाणं पसादीकिदा, ण जुत्तं मम एदं गेण्हिदुं । अज्जउत्तो ज्जेव मम आहरणविसेसो त्ति
वसन्तसेना— क्या चारुदत्त के सम्बन्धी लोग ( मेरे यहाँ आने के कारण ) दुःखी हो रहे हैं ?
चेटी— दुःखी होंगे ।
वसन्तसेना— कब ?
चेटी— जब आर्या चली जायेंगी ।
वसन्तसेना— तब तो सबसे पहले मैं ही दुःखी होऊँगी ( अनुनय के साथ ) सखि ! यह रत्नावली लीजिये । जाकर मेरी बहिन आर्या धूता को दे दीजिये । और यह कह दीजिये —‘गुणों से वश में की गयी यह मैं ( वसन्तसेना ) श्रीमान् चारुदत्त की दासी हूँ, अतः आपकी भी दासी बन गयी हूँ । इस कारण यह रत्नावली आपके ही कण्ठ का गहना बने ।' [ आप इस रत्नावली को स्वीकार कर गले में पहन लें । ]
चेटी— आर्ये ! आर्य चारुदत्त आर्या [ धूता ] पर नाराज हो जायेंगे ।
वसन्तसेना— जाओ, नहीं नाराज होंगे ।
चेटी— ( लेकर ) जैसी आपकी आज्ञा । ( ऐसा कहकर निकल कर पुनः
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