भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 452
३६४मृच्छकटिकम्

( ऊर्ध्वमवलोक्य ) अये ! इन्द्रधनुः । प्रिये ! पश्य पश्य—

विद्युज्जिह्वेनेदं महेन्द्रचापोच्छ्रितायतभुजेन । जलधर-विवृद्ध-हनुना विजृम्भितमिवान्तरीक्षेण ॥ ५१ ॥

हिलने लगा है ऐसा, वितानम् = वितान=तम्बू, शीर्णत्वात्=सड़ा जीर्ण होने के कारण, स्तम्भेषु=आधारभूत खम्भों पर, कथमपि=किसी प्रकार, धार्यते=धारण किया जा रहा है, च=और, एषा=यह, चित्रभित्तिः=चित्रयुक्त दीवार, स्फुटित-द्रवानुलेपात्=सुधाद्रव=सफेदी के लिये प्रयुक्त किये गये चूने के फूट जाने के कारण, सलिलभरेण=अत्यधिक पानी से, संक्लिन्ना=भीग गई है ।। ५० ।।

**अर्थ—**प्रिय वसन्तसेना जी !

जिसकी [ आधारभूत ] वेदियों के समूह का अन्तभाग हिलने लगा है ऐसा वितान=तम्बू जीर्ण होने के कारण खम्भों पर जिस किसी प्रकार धारण किया=रोका जा रहा है और यह चित्रों से युक्त दीवार चूना के लेप के फूट जाने ( अलग हो जाने ) के कारण अत्यधिक पानी से भीग गई है ।। ५० ।।

**टीका—**निजगृहस्य जीर्णतां दर्शयन् वर्षया प्रभावितं तद् वसन्तसेनां प्रति वर्णयति—स्तम्भेष्विति । प्रचलितः=वायुवेगेन प्रकम्पितः, वेदीनां सञ्चयानाम्=समूहानाम्, अन्तः=पर्यन्तभागः यस्य तादृशम्, वितानम्=वस्त्रनिर्मितम् आवरणम् 'तम्बू' इत्यादिनाम्ना लोके प्रसिद्धम्, शीर्णत्वात्=जीर्णत्वात्, स्तम्भेषु=आधार-स्थूणासु, कथमपि=येन केनापि प्रकारेण, धार्यते=अवलम्ब्यते, स्थीयते इति भावः, एषा च=पुरोदृश्यमाना इयं च, चित्रभित्तिः = विविधचित्रमयी भित्तिः=कुड्यम्, स्फुटितः=यत्र तत्र गलितः, त्रुटितः वा यः सुधाद्रवस्य=श्वेतताधायकपदार्थविशेषस्य द्रव्यस्य 'चूना' इति लोके ख्यातस्य, अनुलेपः=विलेपः, तस्मात्, 'स्फुटित' इदमनु-लेपस्य विशेषणम्, यत्र तत्र भागे सुधाद्रवस्य पतनं जातमिति हेतोरिति भावः, सलिलभरेण = जलाधिक्येन, सुधाद्रवरहितांशे जलप्रभावस्याधिक्येन, संक्लिन्ना=अतिसिक्ता, आर्देति भावः जातेति शेषः । एवञ्चात्र स्थातुं नोचितमिति चारुदत्तस्य तात्पर्यम् । प्रहर्षिणी वृत्तम्—त्र्याशाभिर्मनजरगाः प्रहर्षणीयम् ।। ५० ।।

**विमर्श—**चारुदत्त कपड़े के तम्बू या चन्दोवा के नीचे वर्षा का आनन्द ले रहा है । परन्तु उसकी सभी चीजें पुरानी होने से वेगवती वर्षा से रक्षा नहीं कर पा रही हैं । सामने की दीवारों पर लगा चूना छूट गया है ऐसी जगहों पर पानी का जोर अधिक हो रहा है । इसलिये वसन्तसेना को वहाँ से भीतर चलने का संकेत कर रहा है ।। ५० ।।

**अन्वयः—**विद्युज्जिह्वेन, महेन्द्रचापोच्छ्रितायतभुजेन, जलधरविवृद्धहनुना, अन्तरीक्षेण, इदम्, विजृम्भितम्, इव ॥ ५१ ॥