भारतकोश
संग्रह पर लौटें

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ
३६४मृच्छकटिकम्

( ऊर्ध्वमवलोक्य ) अये ! इन्द्रधनुः । प्रिये ! पश्य पश्य—

विद्युज्जिह्वेनेदं महेन्द्रचापोच्छ्रितायतभुजेन । जलधर-विवृद्ध-हनुना विजृम्भितमिवान्तरीक्षेण ॥ ५१ ॥

हिलने लगा है ऐसा, वितानम् = वितान=तम्बू, शीर्णत्वात्=सड़ा जीर्ण होने के कारण, स्तम्भेषु=आधारभूत खम्भों पर, कथमपि=किसी प्रकार, धार्यते=धारण किया जा रहा है, च=और, एषा=यह, चित्रभित्तिः=चित्रयुक्त दीवार, स्फुटित-द्रवानुलेपात्=सुधाद्रव=सफेदी के लिये प्रयुक्त किये गये चूने के फूट जाने के कारण, सलिलभरेण=अत्यधिक पानी से, संक्लिन्ना=भीग गई है ।। ५० ।।

**अर्थ—**प्रिय वसन्तसेना जी !

जिसकी [ आधारभूत ] वेदियों के समूह का अन्तभाग हिलने लगा है ऐसा वितान=तम्बू जीर्ण होने के कारण खम्भों पर जिस किसी प्रकार धारण किया=रोका जा रहा है और यह चित्रों से युक्त दीवार चूना के लेप के फूट जाने ( अलग हो जाने ) के कारण अत्यधिक पानी से भीग गई है ।। ५० ।।

**टीका—**निजगृहस्य जीर्णतां दर्शयन् वर्षया प्रभावितं तद् वसन्तसेनां प्रति वर्णयति—स्तम्भेष्विति । प्रचलितः=वायुवेगेन प्रकम्पितः, वेदीनां सञ्चयानाम्=समूहानाम्, अन्तः=पर्यन्तभागः यस्य तादृशम्, वितानम्=वस्त्रनिर्मितम् आवरणम् 'तम्बू' इत्यादिनाम्ना लोके प्रसिद्धम्, शीर्णत्वात्=जीर्णत्वात्, स्तम्भेषु=आधार-स्थूणासु, कथमपि=येन केनापि प्रकारेण, धार्यते=अवलम्ब्यते, स्थीयते इति भावः, एषा च=पुरोदृश्यमाना इयं च, चित्रभित्तिः = विविधचित्रमयी भित्तिः=कुड्यम्, स्फुटितः=यत्र तत्र गलितः, त्रुटितः वा यः सुधाद्रवस्य=श्वेतताधायकपदार्थविशेषस्य द्रव्यस्य 'चूना' इति लोके ख्यातस्य, अनुलेपः=विलेपः, तस्मात्, 'स्फुटित' इदमनु-लेपस्य विशेषणम्, यत्र तत्र भागे सुधाद्रवस्य पतनं जातमिति हेतोरिति भावः, सलिलभरेण = जलाधिक्येन, सुधाद्रवरहितांशे जलप्रभावस्याधिक्येन, संक्लिन्ना=अतिसिक्ता, आर्देति भावः जातेति शेषः । एवञ्चात्र स्थातुं नोचितमिति चारुदत्तस्य तात्पर्यम् । प्रहर्षिणी वृत्तम्—त्र्याशाभिर्मनजरगाः प्रहर्षणीयम् ।। ५० ।।

**विमर्श—**चारुदत्त कपड़े के तम्बू या चन्दोवा के नीचे वर्षा का आनन्द ले रहा है । परन्तु उसकी सभी चीजें पुरानी होने से वेगवती वर्षा से रक्षा नहीं कर पा रही हैं । सामने की दीवारों पर लगा चूना छूट गया है ऐसी जगहों पर पानी का जोर अधिक हो रहा है । इसलिये वसन्तसेना को वहाँ से भीतर चलने का संकेत कर रहा है ।। ५० ।।

**अन्वयः—**विद्युज्जिह्वेन, महेन्द्रचापोच्छ्रितायतभुजेन, जलधरविवृद्धहनुना, अन्तरीक्षेण, इदम्, विजृम्भितम्, इव ॥ ५१ ॥

पञ्चमोऽङ्कः ३६५

तदेहि, अभ्यन्तरमेव प्रविशावः। (इत्युत्थाय परिक्रामति।)
प्रिये पश्य—

तालीषु तारं विटपेषु मन्द्रं शिलासु रूक्षं सलिलेषु चण्डम्।
सङ्गीतवीणा इव ताड्यमानास्तालानुसारेण पतन्ति धाराः ॥ ५२ ॥


शब्दार्थविद्युज्जिह्वेन=बिजलीरूप जीभवाले, महेन्द्रचापोच्छ्रितायतभुजेन=इन्द्रधनुष रूपी ऊपर उठी हुई और लम्बी भुजाओं वाले, जलधरविवृद्धहनुना=मेघरूपी बढ़ी हुई ठोढ़ीवाले, अन्तरीक्षेण = आकाश ने, इदम्=यह, विजृम्भितम् इव=मानो जम्हाई ली है ॥ ५१ ॥

अर्थ—( ऊपर देखकर ) अरे इन्द्रधनुष, प्रिये ! देखो, देखो—
बिजलीरूपी जीभवाले, इन्द्रधनुषरूपी ऊपर उठी हुई और लम्बी भुजाओंवाले, मेघरूपी बढ़ी हुई ठोढ़ीवाले आकाश ने मानों यह जम्हाई ली है ॥ ५१ ॥

टीकाआकाशसौन्दर्यं प्रतिपादयति—विद्युदिति। विद्युत् एव=तडित् एव जिह्वा=रसना यस्य सः तेन, महेन्द्रस्य=शक्रस्य चापः=धनुः एव, उच्छ्रितौ=उत्थापितौ, आयतौ=विशालौ च, भुजौ यस्य तेन, जलधरः=वारिदः एव, विवृद्धा=वृद्धिं प्राप्ता, लम्बितेति भावः, हनुः = चिबुकप्रदेशः यस्य तेन, अन्तरीक्षेण=आकाशेन, विजृम्भितम् इव=मुखव्यादानम् इव कृतमित्यर्थः। अत्र विद्युदादौ जिह्वाद्यारोपात् रूपकम्, अन्ते चोत्प्रेक्षेति। आर्या वृत्तम् ॥ ५१ ॥

विमर्श—वसन्तसेना चारुदत्त के समीप प्रदोषकाल में पहुँचती है। वार्तालाप के प्रसंग में और अधिक देर होने से रात हो जाती है। जैसा कि श्लोक संख्या ४४ के 'अनुव्यसनाद्' आदि पदों से स्पष्ट है। इस परिस्थिति में 'इन्द्रधनुष' की कल्पना का औचित्य नहीं प्रतीत होता है। यदि यह मान लिया जाय कि पहले बादलों की अधिकता से असमय में ही सन्ध्या की प्रतीत होने लगी थी, वर्षा हो जाने पर आकाश स्वच्छ हो गया और कुछ प्रकाश आ गया। फलतः इन्द्रधनुष की कल्पना हो सकती है। अथवा वसन्तसेना की कामुकता बढ़ाने के लिये चारुदत्त ने यों ही कह दिया हो। बिजली, इन्द्रचाप और जलधर पर जिह्वा, भुजा और हनु का आरोप होने से रूपक है। और इव से उत्प्रेक्षा प्रतीत हो रही है। 'अन्तरीक्षेण' और 'अन्तरिक्षेण' दोनों पाठ मिलते हैं। आर्या छन्द है ॥ ५१ ॥

अर्थ—तो आइये, [ हम लोग ] भीतर ही चलें। ( ऐसा कहकर उठ कर घूमता है।)---

अन्वयः—तालानुसारेण, ताड्यमानाः, सङ्गीतवीणाः, इव, धाराः, तालीषु, तारम्, विटपेषु, मन्द्रम्, शिलासु, रूक्षम्, सलिलेषु, चण्डम्, पतन्ति ॥ ५२ ॥

शब्दार्थतालानुसारेण=लयताल के अनुसार, ताड्यमानाः=बजाई जाती हुईं, संगीतवीणाः=संगीत की वीणाओं के, इव=समान, धाराः=जलधारायें, तालीषु=

३६६ | मृच्छकटिकम्

( इति निष्क्रान्ताः सर्वे । )

दुर्द्दिनो नाम पञ्चमोऽङ्कः ।

—: ० :—

ताड़ के पत्तों पर, तारम्=ऊँचे स्वर से, विटपेषु=पेड़ों पर, मन्द्रम्=गम्भीर ध्वनि के साथ, शिलासु=पहाड़ों की चट्टानों पर, रुक्षम्=कर्कश, और, सलिलेषु=जल में, चण्डम्=प्रचण्ड ध्वनि के साथ, पतन्ति=गिर रहीं हैं ।। ५२ ।।

अर्थ—प्रिये ! देखो—
लय के अनुसार बजायी जातीं हुईं संगीत की वीणाओं के समान ये पानी की धारायें ताड़ के पत्तों पर ऊँची ध्वनि से, पेड़ों पर गंभीर ध्वनि से, चट्टानों पर कर्कश ध्वनि से और पानी में प्रचण्ड ध्वनि से गिर रहीं हैं ।। ५२ ।।

( सब निकल जाते हैं । )

इस प्रकार दुर्द्दिन नामक पाँचवाँ अङ्क समाप्त हुआ ।

टीका—जलधारापातेन जन्यं विविधध्वनिं निरूपयति—तालीष्विति । तालानुसारेण = संगीतशास्त्रप्रतिपादिततालसिद्धान्तानुसारेण, ताड्यमानाः=वाद्यमानाः, संगीतवीणाः=संगीतकार्यक्रमे प्रयुक्तवीणाः, इव, धाराः=वर्षाजलधाराः, तालीषु=तालाख्यवृक्षस्य पत्रेषु, तारम्=उच्चैः यथा स्यात् तथा, विटपेषु=पादपेषु, मन्द्रम्=गम्भीरं यथा स्यात् तथा, शिलासु=पाषाणखण्डेषु रुक्षम्=कर्कशं कठिनं वा यथा स्यात् तथा, सलिलेषु = तडागादिस्थितजलेषु, चण्डम् = प्रचण्डं यथा स्यात् तथा, पतन्ति=क्षरन्ति, वर्षन्तीति भावः । अत्रोपमालङ्कारः, उपजातिर्वृत्तम् ।। ५२ ।।

**विमर्श—**वर्षा के समय में बादलों से गिरने वाली जलधाराओं की भिन्न-भिन्न पदार्थों पर अलग-अलग प्रकार की आवाजें होना सर्वानुभवसिद्ध है । जलधारा सभी देखने में एक-सी होती हैं । परन्तु ध्वनियाँ अलग-अलग होती हैं । जैसे वीणा के तार देखने में एक जैसे ही लगते हैं परन्तु उनकी ध्वनियां अलगअलग प्रतीत होती हैं, वही सादृश्य यहाँ प्रतिपादित है । 'धाराः' और 'ताड्यमानाः' ये दोनों बहुवचनान्त हैं अतः उपमान 'वीणाः' भी बहुवचनान्त रहना उचित है । यहाँ वीणा का तात्पर्य वीणा के तारों से है जिन्हें बजाया जाता है ।। ५२ ।।

॥ इस प्रकार जयशङ्कर लाल त्रिपाठी-विरचित 'भावप्रकाशिका' संस्कृत-हिन्दी व्याख्या में मृच्छकटिक का पञ्चम अङ्क समाप्त हुआ ॥

—: ० :—

षष्ठोऽङ्कः (प्रवहणविपर्यय)

षष्ठोऽङ्कः

( ततः प्रविशति चेटी )

चेटी— कहं अज्ज वि अज्जआ ण विवुज्झदि । भोदु, पविसिअ पडि- वोधइस्सं । ( कथमद्यापि आर्या न विबुध्यते । भवतु, प्रविश्य प्रतिबोधयिष्यामि ।)
( इति नाट्ये'न परिक्रामति । )
( ततः प्रविशति आच्छादितशरीरा प्रसुप्ता वसन्तसेना । )
चेटी— ( निरूप्य ) उत्थेदु उत्थेदु अज्जआ । पभादं संवृत्तं । ( उत्तिष्ठतु उत्तिष्ठतु आर्या । प्रभातं संवृत्तम् )
वसन्तसेना— ( प्रतिबुध्य ) कहं रत्ति ज्जेव पभादं संवृत्तं ? ( कथं रात्रिरेव प्रभातं संवृत्तम् ? )
चेटी— अम्हाणं एसो पभादो, अज्जआए उण रत्तिज्जेव । ( अस्माक-मेतत् प्रभातम् आर्यायाः पुनः रात्रिरेव )


शब्दार्थ— विबुध्यते = जाग रही है। प्रतिबोधयिष्यामि = जगाऊँगी । आच्छादितशरीरा = चादर आदि से ढके हुये शरीरवाली । प्रसुप्ता = गंभीर रूप से सोती हुई । पुष्पकरण्डकम् = यह एक बगीचे का नाम है । समादिश्य = आदेश देकर । प्रवहणम् = गाड़ी । कस्मिन् = किस स्थान पर । निध्यातः = देखा गया । अभ्यन्तरचतुःशालकम् = भीतर के चौशाल में । सन्तप्यते = दुःखी हो रहे हैं । परिजनः = सम्बन्धी जन । सन्तप्तव्यम् = दुःखी होना चाहिये । गुणनिर्जिता = गुणों से वशीभूत । कण्ठाभरणम् = गले का गहना = शोभा । प्रसादीकृता = सेवा में समर्पित की है । आभरणविशेषः = विशेष अलङ्कार ।

अर्थ— ( इसके बाद चेटी प्रवेश करती है । )
चेटी— क्या आर्या [ वसन्तसेना ] सोकर अभी भी नहीं जागीं=उठीं है ? अच्छा, ( भीतर ) जाकर जगाऊँगी । [ जगाती हूँ । ]
[ ऐसा कहकर अभिनय के साथ घूमती है । ]
[ इसके बाद वस्त्रादि से ढके हुये शरीरवाली सोती हुई वसन्तसेना प्रवेश करती है । ]
चेटी— ( देख कर ) आर्ये ! उठिये, उठिये । सबेरा हो गया ।
वसन्तसेना— ( जाग कर ) क्या रात ही सबेरा बन गयी ?
चेटी— हम लोगों का तो यह सबेरा है, किन्तु आर्या की तो रात ही है ।

३६८ मृच्छकटिकम्

**वसन्तसेना--**हज्जे ! कहिं उण तुम्हाणं जूदिअरो ? ( हञ्जे ! कस्मिन् पुनर्युष्माकं द्यूतकरः ? )

**चेटी--**अज्जए ! वड्ढमाणअं समादिसिअ पुप्फकरण्डअं जिण्णुज्जाणं गदो अज्जचारुदत्तो । ( आर्ये ! वर्द्धमानकं समादिश्य पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं गतः आर्यचारुदत्तः । )

**वसन्तसेना--**किं समादिसिअ ? ( किं समादिश्य ? )

**चेटी--**जोएहि रात्तीए पवहणं । वसन्तसेना गच्छदु, त्ति । ( योजय रात्रौ प्रवहणम् । वसन्तसेना गच्छतु इति )

**वसन्तसेना--**हज्जे ! कहिं मए गन्तव्वं ? ( हञ्जे ! कस्मिन् मया गन्तव्यम् ? )

**चेटी--**अज्जए ! जहिं चारुदत्तो । ( आर्ये ! यस्मिन् चारुदत्तः । )

वसन्तसेना--( चेटीं परिष्वज्य ) हज्जे ! सुट्ठु ण णिज्झाइदो रात्तीए, ता अज्ज पच्चक्खं पेक्खिस्सं । हज्जे ! किं पविट्ठा अहं इह अब्भन्तरचदुस्सालअं ? ( हञ्जे ! सुष्ठु न निध्यातो रात्रौ, तदद्य प्रत्यक्षं प्रेक्षिष्ये । हञ्जे ! किं प्रविष्टा अहमिह अभ्यन्तरचतुःशालकम् ? )

**चेटी--**ण केवलं अब्भन्तरचदुस्सालअं, सव्वजणस्स वि हिअअं पविट्ठा । ( न केवलमभ्यन्तरचतुःशालकम्, सर्वजनस्यापि हृदयं प्रविष्टा । )


**वसन्तसेना--**सखि ! तुम लोगों का जुआड़ी ( चारुदत्त ) कहाँ है ?

**चेटी--**आर्ये ! वर्धमानक [ गाड़ीवान ] को आदेश देकर आर्य चारुदत्त पुष्पकरण्डक नामक जीर्ण बगीचे में गये हैं ।

**वसन्तसेना--**क्या आदेश देकर ?

**चेटी--**रात में ही गाड़ी तैयार कर लो । वसन्तसेना चली जाय [ यह कहा है ] ।

**वसन्तसेना--**सखि ! मुझे कहाँ जाना है ?

**चेटी--**आर्ये ! जहाँ आर्य चारुदत्त गये हैं ।

वसन्तसेना--( चेटी का आलिंगन करके ) सखि ! रात में ( मैंने चारुदत्त को ) अच्छी तरह नहीं देखा था, अतः आज ( दिन में ) प्रत्यक्ष=अच्छी तरह से देखूंगी । सखि ! क्या मैं यहाँ भीतरी चौशाल में आ गयी हूँ ?

**चेटी--**केवल भीतरी चौशाल=अन्तःपुर में ही नहीं, अपितु सभी लोगों के हृदय में प्रवेश कर चुकी हैं ।

३६९

षष्ठोऽङ्कः

वसन्तसेना— अवि सन्तप्पदि चारुदत्तस्स परिअणो? (अपि सन्तप्यते चारुदत्तस्य परिजनः ? )

चेटी— सन्तप्पिस्सदि । ( सन्तप्स्यति । )

वसन्तसेना— कदा ? ( कदा ? )

चेटी— जदा अज्जआ गमिस्सदि । ( यदा आर्या गमिष्यति । )

वसन्तसेना— तदो मए पढमं सन्तप्पिदव्वं । ( सानुनयम् ) हज्जे ! गेण्ह एदं रअणावलिं, मम बहिणिआए अज्जाधूदाए गदूअ समप्पेहि । भणिदव्वं अ—‘अहं सिरिचारुदत्तस्स गुणणिज्जिदा दासी, तदा तुम्हाणं पि; ता एसो तुह ज्जेव कण्ठाहरणं होदु रअणावली । ( ततो मया प्रथमं सन्तप्तव्यम् । हञ्जे ! गृहाण एतां रत्नावलीम्, मम भगिन्यै आर्याधूतायै गत्वा समर्पय, वक्तव्यञ्च—‘अहं श्रीचारुदत्तस्य गुणनिर्जिता दासी, तदा युष्माकमपि; तदेषा तवैव कण्ठाभरणं भवतु रत्नावली' । )

चेटी— अज्जए ! कुविस्सदि चारुदत्तो अज्जाए दाव । ( आर्ये ! कुपिष्यति चारुदत्त आर्यायै तावत् । )

वसन्तसेना— गच्छ, ण कुविस्सदि । ( गच्छ, न कोपिष्यति । )

चेटी— ( गृहीत्वा ) जं अज्जआ आणवेदि । ( इति निष्क्रम्य पुनः प्रविशति । )
अज्जए ! भणादि अज्जा धूदा—अज्जउत्तेण तुम्हाणं पसादीकिदा, ण जुत्तं मम एदं गेण्हिदुं । अज्जउत्तो ज्जेव मम आहरणविसेसो त्ति


वसन्तसेना— क्या चारुदत्त के सम्बन्धी लोग ( मेरे यहाँ आने के कारण ) दुःखी हो रहे हैं ?

चेटी— दुःखी होंगे ।

वसन्तसेना— कब ?

चेटी— जब आर्या चली जायेंगी ।

वसन्तसेना— तब तो सबसे पहले मैं ही दुःखी होऊँगी ( अनुनय के साथ ) सखि ! यह रत्नावली लीजिये । जाकर मेरी बहिन आर्या धूता को दे दीजिये । और यह कह दीजिये —‘गुणों से वश में की गयी यह मैं ( वसन्तसेना ) श्रीमान् चारुदत्त की दासी हूँ, अतः आपकी भी दासी बन गयी हूँ । इस कारण यह रत्नावली आपके ही कण्ठ का गहना बने ।' [ आप इस रत्नावली को स्वीकार कर गले में पहन लें । ]

चेटी— आर्ये ! आर्य चारुदत्त आर्या [ धूता ] पर नाराज हो जायेंगे ।

वसन्तसेना— जाओ, नहीं नाराज होंगे ।

चेटी— ( लेकर ) जैसी आपकी आज्ञा । ( ऐसा कहकर निकल कर पुनः

२४ मृ०

३७०मृच्छकटिकम्

आणावेदु भोदी । (यदाज्ञापयति ।) (आर्ये ! भणति भार्या धूता —'आर्यपुत्रेण युष्माकं प्रसादीकृता न युक्तं ममैतां ग्रहीतुम् । आर्यपुत्र एव मम आभरणविशेष इति जानातु भवती' ।')

( ततः प्रविशति दारकं गृहीत्वा रदनिका । )


प्रवेश करती है ।) आयें ! आर्या धूता यह कह रही हैं—'आर्यपुत्र ने प्रसन्न होकर आपको समर्पित की है, मेरा लेना ठीक नहीं है । आर्यपुत्र ही मेरे विशेष [ सर्व-श्रेष्ठ ] आभूषण हैं—यह आप जान लीजिये ।'

टीका—अद्यापि = इदानीमपि, विबुध्यते = जागर्ति, निद्रां परित्यजति, प्रति-बोधयिष्यामि = जागरयिष्यामि; आच्छादितम् = वस्त्रादिना आवृतं शरीरं=कलेबरं यस्याः सा, प्रसुप्ता = गभीरं सुप्ता, कामक्रीडोत्तरं दीर्घस्वापस्य स्वाभाविकत्वात्, वर्धमानम् = एतन्नामकं शकटवाहकम्, समादिश्य = सम्यग्रूपेण बोधयित्वा, पुष्पाणां करण्डकम् = मधुकोषः, यस्मिन् तत्, जीर्णोद्यानम् = जीर्णं च तद् उद्यानम्, योजय = सन्नद्धं कुरु, निध्यातः = अवलोकितः, अद्य = दिने इति भावः, प्रत्यक्षम् = स्वयमेवेत्यर्थः, चतसृणां शालानां समाहारः चतुःशालम्, आभ्यन्तरं च चतुःशालं चेति कर्मधारयः, षष्ठीतत्पुरुषो वा, सन्तप्यते = वेश्यागमनजन्यं कष्टमनुभवतीति भावः, परिजनः = संबन्धिजनः, जातावेकवचनम्, सन्तप्तव्यम् = सन्तापयुक्त्या भवितव्यम्, भगिन्ये = सम्मानातिशयबोधनार्थमिदम्, समर्पय = समर्पितं कुरु, गुणैः = दयादाक्षिण्यादिगुणैः, निर्जिता = वशीकृता, दासी = सेविका, तत्तुल्येति भावः, कोपिष्यति = कोपं करिष्यति, प्रसादीकृता = प्रसन्नतापूर्वकं समर्पिता, आभरणविशेषः = सर्वोत्कृष्टं भूषणमित्यर्थः, जानातु = अवगच्छतु । मत्कृते चारुदत्त एव सर्वस्वमिति ज्ञात्वैव भवत्या व्यवहरणीय-मिति भावः ।

शब्दार्थ—दारकम् = बच्चे को, शकटिकया = छोटी गाड़ी से, मृत्तिकाशकटिकया = मिट्टी की गाड़ी से, सनिर्वेदम् = दुःख के साथ, सुवर्णव्यवहारः = सोने का प्रयोग, अनलंकृतशरीरोऽपि = आभूषणरहित शरीरवाला भी, पुत्रकः = प्रिय बेटा, अनुकृतम् = पितृसदृश ही रूप धारण किया है, प्रतिवेशिकगृहपतिदारकस्य = पड़ोस के घरवाले के बच्चे की, सन्तप्यते = दुःखी हो रहा है, पुष्करपत्रपतितजलबिन्दुसदृशैः = कमलपत्र पर गिरे हुये पानी की बूंद के समान, पुरुषभागधेयैः = मनुष्य के भाग्य से, गुण-निर्जिता = गुणों से वश में की गयी, अतिकृच्छ्रम् = अत्यन्त दुःखद, अवतार्य = उतार कर, घटय = बनवा लो, पूरयित्वा = भर कर, कारय = बनवा लो ।

अर्थ—( इसके बाद बच्चे को लेकर रदनिका प्रवेश करती है ।)

षष्ठोऽङ्कः ३७१

रदनिका-एहि बच्छ ! सअड़िआए कीलम्ह । ( एहि वत्स ! शकटिकया क्रीडावः । )

दारकः---( सकरुणम् ) रदणिए ! किं मम एदाए मट्टिआसक्कडिआए, तं ज्जेव सोवण्ण-सअड़िअं देहि । ( रदनिके ! किं मम एतया मृत्तिकाशकटिकया; तामेव सौवर्णशकटिकां देहि । )

रदनिका--( सनिर्वेदं निश्वस्य ) जाद ! कुदो अम्हाणं सुवण्णववहारो ? तादस्स पुणो वि रिद्धीए सुवण्णसअड़िआए कीलिस्ससि । ता जाव विणोदेमि णं, अज्जआ-वसन्तसेणाआए समीवं उवसप्पिस्सं । ( उपसृत्य ) अज्जए ! पणमामि । ( जात ! कुतोऽस्माकं सुवर्णव्यवहारः ? तातस्य पुनरपि ऋद्ध्या सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि । तद्यावद्विनोदयाम्येनम् । आर्यावसन्तसेनायाः समीपमुपसर्पिष्यामि । ) ( आर्ये ! प्रणमामि । )

वसन्तसेना--रदणिए ! साअदं दे । कस्स उण अअं दारओ ? अणलंककिद-सरीरो वि चन्दमुहो आणन्देदि मम हिअअं । ( रदनिके ! स्वागतं ते । कस्य पुनरयं दारकः ? अनलङ्कृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम् । )

रदनिका--एसो क्खु अज्जचारुदत्तस्स पुत्तो रोहसेणो णाम । ( एष खलु आर्यचारुदत्तस्य पुत्रो रोहसेनो नाम । )

वसन्तसेना--( बाहू प्रसार्य ) एहि मे पुत्तअ ! आलिङ्ग । ( इत्यङ्क उपवेश्य ) अणुकिदं अणेण पिदुणो रूवं । ( एहि मे पुत्रक ! आलिङ्ग । अनुकृतमनेन पितुः रूपम् । )


रदनिका-- आओ बच्चे ! गाड़ी से खेलें ।

बालक --( करुणा के साथ ) रदनिके, इस मिट्टी की गाड़ी से मेरा क्या [ प्रयोजन ] ? मुझे वही सोने की बनी गाड़ी दीजिये ।

रदनिका --( दुःख के साथ निःश्वास लेकर ) बेटे ! हम लोगों का सोने का व्यवहार कहाँ ? पिता की पुनः सम्पन्नता से सोने की गाड़ी से खेलोगे । तब तक इस बालक का मन बहलाती हूँ, आर्या वसन्तसेना के पास चलती हूँ । ( पास जाकर ) आर्ये ! प्रणाम करती हूँ ।

वसन्तसेना--रदनिके ! तुम्हारा स्वागत है । यह किसका बेटा है ? आभूषण-शून्य शरीरवाला भी चन्द्रतुल्य मुखवाला यह मेरे हृदय को आनन्दित कर रहा है ।

रदनिका-- यह आर्यचारुदत्त का पुत्र रोहसेन है ।

वसन्तसेना--( दोनों हाथ फैलाकर ) आओ मेरे प्यारे बेटे ! आलिङ्गन करो । ( यह कह कर गोद में बैठा कर ) इसने अपने पिता के रूप की नकल की है, वह भी अपने पिता के समान ही है ।

३१३ | मृच्छकटिकम्

रदनिका--ण केवलं रूवं सीलं पि तक्केमि, एदिणा अज्जचारुदत्तो अत्ताणं विणोदेदि । ( न केवलं रूपम्, शीलमपि तर्कयामि । एतेन आर्यचारुदत्त आत्मानं विनोदयति । )

वसन्तसेना--अध किं णिमित्तं एसो रोअदि ? ( अथ किं निमित्तमेष रोदिति ? )

रदनिका--एदिणा पडिवेसअ-गहवइ-दारअ-केरिआइए सुवण्ण-सअड़िआए कीलिदं, तेण अ सा णीदा, तदो उण तं मग्गन्तस्स मए इमं मट्टिआ-सअड़िआ कडुअ दिण्णा । तदो भणादि-रदणिए ! किं मम एदाए मट्टिआ-सअड़िआए, तं ज्जेव सोवण्ण-सअड़िअं देहि' त्ति । ( एतेन प्रतिवेशिकगृहपति-दारकस्य सुवर्णशकटिकया क्रीडितम्, तेन च सा नीता, ततः पुनस्तां याचतो मया इयं मृत्तिकाशकटिका कृत्वा दत्ता । ततो भणति—'रदनिके ! किं मम एतया मृत्तिका-शकटिकया, तामेव सौवर्ण-शकटिकां देहि' इति । )

वसन्तसेना--हद्धी हद्धी ! अअं पि णाम पर-सम्पत्तीए सन्तप्पदि ! भअवं कदन्त ! पोक्खर-पत्त-वडिद-जलविन्दु-सरिसेहिं कीळसि तुमं पुरिस-भाअधेएहि ( इति सास्त्रा ) जाद ! मा रोद, सोवण्ण-सअड़िआए केलिस्ससि । ( हा धिक्, हा धिक्, अयमपि नाम परसम्पत्त्या सन्तप्यते । भगवन् कृतान्त ! पुष्कर-पत्र-पतित-जलविन्दु-सदृशैः क्रीडसि त्वं पुरुषभाग-धेयैः । जात ! मा रोदिहि, सौवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि । )

दारकः--रदणिए ! का एसा ? ( रदनिके ! का एषा ? )


रदनिका—केवल रूप की ही नहीं, स्वभाव की भी ( नकल की है ); ऐसा सोचती हूँ । आर्य चारुदत्त इसके साथ अपना मनोविनोद करते हैं ।

वसन्तसेना—अच्छा, यह किसलिये रो रहा है ?

रदनिका—इसने पड़ोस के घर के मालिक के बच्चे की सोने की गाड़ी से खेला है, और उसने वह गाड़ी ले ली है, इसके बाद उसको मांगते हुये इसे मैंने मिट्टी की गाड़ी बनाकर दे दी । इसके बाद यह कह रहा है—'रदनिके ! इस मिट्टी की गाड़ी से मेरा क्या ( प्रयोजन ) ? वही सोने की बनी हुई गाड़ी दो ।'

वसन्तसेना—हाय ! हाय ! यह भी दूसरे की सम्पत्ति के कारण दुःखी हो रहा है । भगवन् भाग्य ! तुम कमलपत्र पर गिरे हुये पानी के बूंद के समान पुरुष के भाग्य से खेल करते हो । ( इस प्रकार अश्रुयुक्त होकर ) बेटा ! मत रोओ, (फिर) सोने की गाड़ी से खेलोगे ।

बालक—रदनिके ! यह कौन है ?

षष्ठोऽङ्कः ३७३

वसन्तसेना—पिदुणो दे गुणणिज्जिदा दासी। (पितुस्ते गुणनिर्जिता दासी।)

रदनिका—जाद ! अज्जआ दे जणणी भोदि। (जात ! आर्या ते जननी भवति।)

दारकः—रदणिए ! अलिअं तुमं भणासि, जइ अम्हाणं अज्जआ जणणी, ता कीस अलङ्किदा ? (रदनिके ! अलीकं त्वं भणसि, यद्यस्माकमार्या जननी, तत् केन अलङ्कृता ?)

वसन्तसेना—जाद ! मुद्धेण मुहेण अतिकरुणं मन्तेसि। (नाट्येनाभरणान्यवतार्य रोदती।) एसा दाणिं दे जणणी संवृत्ता, ता गेण्ह एवं अलङ्कारं सोवण्ण-सअडिअं घड़ावेहि। (जात ! मुग्धेन मुखेन अतिकरुणं मन्त्रयसि।) (एषा इदानीं ते जननी संवृत्ता। तत् गृहाणैतमलङ्कारम्, सौवर्णशकटिकां घटय।)

दारकः—अवेहि, ण गेण्हिस्सं, रोदसिं तुमं। (अपेहि, न ग्रहीष्यामि, रोदिषि त्वम्।)

वसन्तसेना—(अश्रूणि प्रमृज्य) जाद ! ण रोदिस्सं गच्छ, कील। (अलङ्कारैर्मृच्छकटिकां पूरयित्वा) जाद ! कारेहि सोवण्णसअडिअं। (जात ! न रोदिष्यामि, गच्छ, क्रीड।) (जात ! कारय सौवर्णशकटिकाम्।)

(इति दारकमादाय निष्क्रान्ता रदनिका।)


वसन्तसेना—तुम्हारे पिता के गुणों से वश में की गयी दासी।

रदनिका—बेटा ! यह तुम्हारी माता लगती हैं।

बालक—रदनिके ! तुम झूठ बोलती हो, यदि आर्या हमारी जननी है, तो किसलिये सजी हुयी हैं ?

वसन्तसेना—बेटे ! भोले मुख से अति कठिन बात कह रहे हो। (अभिनय के साथ गहने उतार कर रोती हुई) लो, यह मैं अब तुम्हारी जननी बन गई। तो इन गहनों को ले लो, सोने की गाड़ी बनवा लो।

बालक—हट जाओ, नहीं लूंगा, तुम रो रही हो।

वसन्तसेना—(आंसू पोंछकर) बेटे ! नहीं रोऊँगी, जाओ, खेलो। बेटे ! सोने की गाड़ी बनवा लो।

(इस प्रकार बच्चे को लेकर रदनिका चली जाती है।)

टीका—दारकम्=बालकम्, सनिर्वेदम्=निर्वेदः=कष्टम्, तेन सह, सौवर्णशकटिकाम्=सुवर्णेन निर्मिता सौवर्णा, सा चासौ शकटिका=यानम्, सुवर्णव्यवहारः=हेम्नो व्यवहारः=प्रयोगः, अनलंकृतं शरीरं यस्य तादृशः=आभूषणशून्यदेहः, चन्द्रमुखः=चन्द्र-सदृशमुखः, अनुकृतम् = धृतम्, प्रतिवेशिगृहपतेः=प्रतिवेशिगृहस्वामिनः, शारकस्य=

३७४मृच्छकटिकम्

( प्रविश्य प्रवहणाधिरूढः )

चेटः—रदणिए ! रदणिए ! णिवेदेहि अज्जआए वशन्तशेणाए—'ओहालिअं पक्खदुआलाए शज्जं पवहणं चिट्ठति ।' ( रदनिके ! रदनिके ! निवेदय आर्यायं वसन्तसेनायै—'अपवारितं पक्षद्वारके सज्जं प्रवहणम् तिष्ठति' । )

( प्रविश्य )

रदनिका—अज्जए ! एसो वड्ढमाणओ विष्णवेदि—'पक्खदुआरए


बालकस्य, सन्तप्यते=सन्तापमनुभवति, पुष्करपत्रे=कमलपत्रे, पतितः=निपतितो यो जलबिन्दुः, तेन सदृशः = समानः, पुरुषभागधेयैः=मनुष्यभाग्यैः, 'भागरूपनामभ्यो धेयः' इति स्वार्थे धेयप्रत्ययः, सास्त्रा=अश्रुसहिता, जननी भवति=जननी लगति, न तु वस्तुतः जन्मदात्रीति भावः, अतिकरुणम्=सकारुण्यम्, मन्त्रयसि=वदसि, अवतार्य=स्वशरीरात् पृथक्कृत्य, घटय=निर्मापय, अपेहि=दूरं याहि, मृच्छकटिकाम्=मृन्मयीं शकटिकामित्यर्थः ॥

विमर्श—इस प्रकरण के नाम का आधार यहीं की घटना है। मिट्टी की गाड़ी से न खेलने की जिद करनेवाले रोहसेन के साथ वसन्तसेना का व्यवहार अनुकरणीय है। वह गणिका केवल चारुदत्त के साथ वासनात्मक सम्बन्ध की ही भूखी नहीं है, वह उसके प्रत्येक सुख-दुःख की भागीदार बनना चाहती है। वह चारुदत्त के बालक की मार्मिक बात "यदि अस्माकमार्या जननी, तत् केन अलंकृता' सुनकर स्त्रीसुलभ करुणा से पिघल जाती है और तत्काल सभी आभूषण उतारकर बच्चे को सोने की गाड़ी बनाने के लिये दे देती है।

यद्यपि यह घटना अत्यल्पकालिक है तथापि वसन्तसेना के चरित्र को उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने के लिये पर्याप्त है।

शब्दार्थअपवारितम्=वस्त्रादि से ढकी हुई, प्रवहणम्=बैलगाड़ी, पक्षद्वारके=बगलवाले दरवाजे पर, सज्जम्=हर प्रकार की सुविधा से सजी हुई, प्रसाधयामि=सजा लूं, यानास्तरणम् = गाड़ी का बिछौना, नस्यरज्जुकटुका=नाक में पड़ी हुई रस्सी के कारण और तेज भागने वाले, गतागतिम् = आना-जाना। उपनय=ले आओ ।

( गाड़ी पर बैठा हुआ प्रवेश करके )

अर्थचेट—रदनिके ! रदनिके ! आर्या वसन्तसेना से यह निवेदन कर दो कि---'वस्त्र=पर्दे से ढकी हुई गाड़ी बगलवाले दरवाजे पर तैयार खड़ी है ।'

( प्रवेश करके )

रदनिका—आर्ये ! यह वर्धमानक सूचित कर रहा है कि—बगलवाले दरवाजे

षष्ठोऽङ्कः | ३७५

सज्जं पवहणं' त्ति । (आर्ये ! एष वर्द्धमानको विज्ञापयति—'पक्षद्वारे सज्जं प्रवहणम्' इति ।)

वसन्तसेना—हञ्जे ! चिट्ठदु मुहुत्तअं, जाव अहं अत्ताणअं पसाधेमि ।
(हञ्जे ! तिष्ठतु मुहूर्त्तकम्, यावदहमात्मानं प्रसाधयामि ।)
(निष्क्रम्य)

रदनिका—वड्ढमाणअ ! चिट्ठ मुहुत्तं जाव अज्जआ अत्ताणअं पसाधेदि । (वर्द्धमानक ! तिष्ठ मुहूर्त्तकं, यावदार्या आत्मानं प्रसाधयति ।)

चेटः—ही ही भो ! मए वि जाणत्थलके विसुमरिदे, ता जाव गेण्हिअ आगच्छामि । एदे णश्या—लज्जु—कडुका वइल्ला । भोदु, पवहणेण ज्जेव गदागदिं कलिस्शं । (इति निष्क्रान्तश्चेटः ।) (हीही भोः ! मयापि यानास्तरणं विस्मृतम्, तत् यावद् गृहीत्वा आगच्छामि । एतौ नस्यरज्जु-कटुकौ बलीवर्द्दोः । भवतु, प्रवहणेनैव गतागतिं करिष्यामि ।)

वसन्तसेना—हञ्जे ! उवणेहि मे पसाधणं. अत्ताणअं पसाधइस्सं ।
(हञ्जे उपनय मे प्रसाधनम्, आत्मानं प्रसाधयिष्यामि ।) (इति प्रसाधयन्ती स्थिता ।)


पर गाड़ी तैयार खड़ी है।

वसन्तसेना—सखि ! वह कुछ देर रुक जाय, तब तक मैं अपने को सजा लेती हूँ, [ तैयार कर लेती हूँ । ]

(निकल कर)

रदनिका—वर्धमानक ! कुछ देर रुक जाओ, जब तक आर्या अपने को सजा लेती हैं।

चेट—अरे आश्चर्य है, मैं भी गाड़ी का विछावन भूल गया, तो तब तक जाकर ले आता हूँ। नथी हुई नाक में रस्सी पड़ी होने से ये बैल और तेज भागने वाले हो गये हैं। अच्छा तो मैं गाड़ी से ही जाना आना कर लेता हूँ [ गाड़ी से जाऊँगा और गाड़ी से वापस आऊँगा । ] (ऐसा कह कर चेट निकल जाता है ।)

वसन्तसेना—सखि ! सजाने की सामग्री लाओ, मैं अपने को सजाऊँगी ।
(ऐसा कह कर सजाती हुई खड़ी है ।)

टीका—प्रवहतेऽनेनेति प्रवहणम्, तत्र आरूढः=आसीनः, चेटः=सेवकविशेषः, अपवारितम्=वस्त्रादिपरिवृतम्, पक्षद्वारके=पक्षस्थं=पार्श्वस्थं द्वारम् एव द्वार कम्, तत्र, सज्जम्=अपेक्षितवस्तुयुक्तमिति भावः, मुहूर्त्तकम्=अल्पकालम्, तिष्ठतु=प्रतीक्षताम्, प्रसाधयामि = सज्जीकरोमि, यानास्तरणम्=यातस्य उपवेशनोपयोगिवस्त्रादिकम्, नस्या=नासिकायां स्थिता रज्जुः, सा चासौ तथोक्ता, तया कटुकाः=अतितीव्रधावकाः, बलीवर्दाः=वृषभाः, गतागतिम्=गमनागमनम्, उपनय=आनीय समर्पय, प्रसाधनम्=अलंकरणपदार्थम् ।

३७६ | मृच्छकटिकम्

( प्रविश्य प्रवहणाधिरूढः )

स्थावरकः चेटः--आणत्तोम्हि लाअ-शालअशण्ठाणेण-'थावलआ ! पवहणं गेण्हिअ पुप्फकलण्डअं जिण्णुज्जाणं तुलिदं आअच्छेहि' त्ति । भोदु, तहिं ज्जेव गच्छामि । वहध वइल्ला ! वहध । ( परिक्रम्यावलोक्य च । ) कधं गामशअलेहिं लुद्धे मग्गे । किं दाणि एत्थ कलइश्शं । ( साटोपम् ) अले ले ! ओशलध ओशलध । ( आकण्र्य ) किं भणाध-'एशे कश्श केलके पवहणे' त्ति । एशे लाअ-शालअ-शण्ठाणकेलके पवहणे त्ति । ता शिग्धं ओशलध । ( अवलोक्य । ) कधं एशे अवले शहिअं विअ मं पेक्खिअ शहश ज्जेव जूदपलाइदे विअ जूदिअले ओहालिअ अत्ताणं अण्णदो अवक्कन्ते ! ता को उण एशे ? अथवा किं मम एदिणा । तुलिदं गमिश्शं । अले ले गामेलुआ ! ओशलध ओशलध । किं भणाध-'मुहुत्तअं, चिट्ठ, चक्कपलिबट्टि देहि' त्ति । अले ले ! लाअशालअ-शष्टाण-केलके हग्गे शूले चक्केपलिबट्टि दइश्शं ? अथवा


शब्दार्थ--राजश्यालकसंस्थानेन=राजा के साले संस्थानक नामवाले के द्वारा, पुष्पकरण्डक=बगीचा-विशेष, वहतम् = दोनों चलो, ग्रामशकटैः = गांववालों की गाड़ियों से, अपसरत=अलग हटो, सभिकम्=प्रधान जुआड़ी, द्यूतपलायितः=जुये से हारकर भागा हुआ, अपवार्य=छिपा कर, अपक्रान्तः=निकल कर भाग गया, चक्र-परिवृत्तिम्=पहिये को घुमाने में सहारा, तपस्वी=असहाय, नेमीशब्दः=धुरी की आवाज, त्वरते=मिलने के लिये जल्दीबाजी कर रहा है, विश्राम्य=विश्राम करो, दक्षिणाक्षिस्पन्दम्=दाहिनी आँख का फड़कना, अधिरुह्य=चढ़कर, अनिमित्तम्=अपशकुन, प्रमार्जयिष्यति=दूर करेगा, अपसारिताः=हटा दिये, भारिकम्=वजन वाला, चक्रपरिवृत्तिकया=पहिया घुमाने में होनेवाले कष्ट के कारण, परिश्रान्तस्य=अधिक थक जानेवाले ।

( गाड़ी पर चढ़ा हुआ चेट प्रवेश करके )

अर्थ —स्थावरक-चेट—राजा के साले संस्थानक ने मुझे यह आज्ञा दी है—'स्थावरक ! गाड़ी लेकर पुष्पकरण्डक जीर्ण उद्यान में जल्दी से आ जाना।' अच्छा, वहीं चलता हूँ। अच्छा चलो बैलों ! चलो । ( घूम कर और देख कर ) क्या गाँव की गाड़ियों से रास्ता रुक गया ? अब यहाँ क्या करूँ ? (गर्व के साथ) अरे रे ! हटो,हटो । (सुनकर) क्या कह रहे हो-'यह किसकी गाड़ी है ? यह राजा के साले संस्थानक की गाड़ी है।' इसलिये जल्दी से हट जाओ । ( देखकर ) जुआ से भागे हुये जुआड़ी के समान यह दूसरा ( पुरुष ) जुआ खिलाने वाले ( प्रधान जुआरी ) के समान मुझे देखकर अपने को छिपा कर जल्दी से दूसरी ओर क्यों भाग गया ?

षष्ठोऽङ्कः ३७७

एशे एआइ तवश्शी । ता एव्वं कलेमि, एदं पवहणं अज्जचालुदत्तश्श रुक्खवाड़िआए पक्खदुआलए थावेमि । ( इति प्रवहणं संस्थाप्य । ) एशे म्हि आअदे । ( आज्ञप्तोऽस्मि राज-श्यालक-संस्थानेन-'स्थावरक ! प्रवहणं गृहीत्वा पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं त्वरितमागच्छ' इति । भवतु तत्रैव गच्छामि । वहतं बलीवदौ ! वहतम् । कथं यामशकटैः रुद्धो मार्गः । किमिदानीमत्र करिष्यामि ? अरे रे ! अपसरत अपसरत । किं भणत-'एतत् कस्य प्रवहणम् ?' इति । एतत् राज्यश्यालक-संस्थानस्य प्रवहणमिति । तत् शीघ्रमपसरत । कथम् एषः अपरः सभिकमिव मां प्रेक्ष्य सहसैव द्यूतपलायित इव द्यूतकरः अपवार्यात्मानम् अन्यतः अपक्रान्तः । तत् कः पुनरेषः ? अथवा किं मम एतेन ? त्वरितं गमिष्यामि । अरे रे ग्राम्याः ! अपसरत अपसरत । किं भणथ-‘मुहूर्त्तकं तिष्ठ, चक्रपरिवृत्तिं देहि' इति । अरे रे ! राज-श्यालक-संस्थानस्य अहं शूरः चक्रपरिवृत्तिं दास्यामि ? अथवा एष एकाकी तपस्वी । तदेगं करोमि । एतत् प्रवहणमार्यचारुदत्तस्य वृक्षवाटिकायाः पक्षद्वारके स्थापयामि । एषोऽस्मि आगतः । ) ( इति निष्क्रान्तः । )

**चेटी—**अज्जए ! णेमिसद्दो विअ सुणीअदि, ता आअदो पवहणो । ( आर्ये ! नेमिशब्द इव श्रूयते, तदागतं प्रवहणम् । )

**वसन्तसेना—**हञ्जे ! गच्छ, तुवरदि मे हिअअं । ता आदेसेहि पक्खदुआरअं । ( हञ्जे ! गच्छ, त्वरते मे हृदयम् । तदादेशय पक्षद्वारकम् । )

**चेटी—**एदु, एदु अज्जआ । ( एतु, एतु आर्या । )

वसन्तसेना—(परिक्रम्य ।) हञ्जे ! वीसम तुमं । (हञ्जे विश्राम्य त्वम् ।)


अच्छा तो फिर यह कौन है ? अथवा मुझे इससे क्या [ प्रयोजन ] ? शीघ्र चलूँगा । अरे गाँववालों ! दूर हटो । ( सुनकर ) क्या कह रहे हो—'कुछ देर रुक जाओ, ( फंसे ) पहिये को घुमाने में सहायता कर दो ।' अरे मैं राजा के साले संस्थानक का बहादुर आदमी पहिया घुमाने में सहायता करूँगा ? अथवा यह बेचारा अकेला है । तो ऐसा करता हूँ ( इसकी सहायता कर देता हूँ । ) यह गाड़ी चारुदत्त के बगीचे के किनारे वाले दरवाजे के पास खड़ी करता हूँ । ( गाड़ी को खड़ी करके ) यह मैं आ गया । ( यह कहकर चला जाता है ।)

**चेटी—**आर्ये ! धुरी की आवाज सुनाई देती है, अतः गाड़ी आ गई [ ऐसा लगता है ] ।

**वसन्तसेना—**सखि ! आओ, मेरा हृदय मिलने के लिये उतावला है । अतः बगलवाला दरवाजा दिखाओ ।

**चेटी—**आर्या, आइये, आइये ।

वसन्तसेना—( घूमकर ) सखि ! तुम विश्राम करो ।

३७८मृच्छकटिकम्

चेटी--जं अज्जआ आणवेदि । (यदार्या आज्ञापयति) (इति निष्क्रान्ता ।)

वसन्तसेना--(दक्षिणाक्षिस्पन्दं सूचयित्वा प्रवहणमधिरुह्य च ।) किण्णेदं फुरदि दाहिणं लोअअं ? अथवा चारुदत्तस्स ज्जेव दंसणं अणिमित्तं पमज्जइस्यदि । (किन्नु इदं स्फुरति दक्षिणं लोचनम् ? अथवा चारुदत्तस्यैव दर्शनमनिमित्तं प्रमार्जयिष्यति ।)

(प्रविश्य)

स्थावरकचेटः—ओशालिदा मए शअड़ा, ता जाव गच्छामि । (इति नाट्येनाधिरुह्य चालयित्वा स्वगतम् ।) भालिके पवहणे । अथवा चक्कप-लिवट्टिआए पल्लिशन्तरश भालिके पवहणे पडिभाशेदि । भोदु, गमिश्शं । जाध गोणा जाध । (अपसारिता मया शकटाः तद् यावद् गच्छामि । भारिकं प्रवहणम् । अथवा चक्र-परिवृत्तिकया परिश्रान्तस्य भारिकं प्रवहणं प्रतिभासते । भवतु, गमिष्यामि । यातं गावौ ! यातम् ।)


चेटी—आर्या की जैसी आज्ञा । (वह निकल जाती हैं।)

वसन्तसेना--(दाहिनी आँख का फड़कना सूचित करके और गाड़ी पर बैठकर) यह दाहिनी आंख किस लिये फड़क रही है ? अथवा चारुदत्त का दर्शन ही अपशकुन दूर करेगा ।

(प्रवेश करके)

स्थावरक चेट—मैंने गाड़ियाँ हटा दीं हैं, तो अब चलता हूँ । (यह कहकर अभिनय के साथ गाड़ी पर चढ़कर और चलाकर—अपने में) गाड़ी बोझदार लगती है । अथवा पहिया घुमाने में परिश्रम करने से थके हुये मुझको गाड़ी बोझ-वाली लग रही है । अच्छा, चलूं । चलो बैलों ! चलो ।।

टीका--**प्रवहणाधिरूढः=**वाह्नारूढः, **ग्रामशकटैः=**ग्राम्यवाहनैः, **रुद्धः=**अवरुद्धः, **अपसरत=**अपगच्छत, सभिकमिव = द्यूतसभाध्यक्षमिव, **प्रेक्ष्य=**विलोक्य, **द्यूतपला-यितः=**पराजितः सन् द्यूतस्थलात् अन्यत्र प्रयात:, **अपवार्य=**गोपायित्वा, **अपक्रान्तः=**पलायितः, **किम् एतेन=**एतेन किमपि साध्यं नास्ति, **चक्रपरिवृत्तिम्=**भूमादावरुद्ध-चक्रनिःसारणे साहाय्यमिति भावः, **शूरः=**वीरः, **तपस्वी=**वराकः, **एकाकी=**असहायः, नेमिशब्दः = चक्राधारयन्त्रावयवविशेषस्य ध्वनिः, **त्वरते=**प्रियमिलनायोत्कण्ठितं भवतीति भावः, **पक्षद्वारकम्=**पक्षद्वारगमनाय मार्गमित्यर्थः, **विश्राम्य=**विश्रामं कुरु, अत्रैव तिष्ठेति भावः, **दक्षिणाक्षिस्पन्दम्=**सव्येतरनेत्रस्फुरणम्, स्त्रीणां दक्षिणाङ्ग-स्फुरणमनिष्टसूचकमिति शास्त्रादावुक्तम्, **अनिमित्तम्=**अपशकुनम्, **प्रमार्जयिष्यति=**विनाशयिष्यति, भारिकम् = भारवत्, ठकि प्रत्यये साधु—भारमस्ति अस्येत्यर्थः,

षष्ठोऽङ्कः ३७६

( नेपथ्ये )

अरे रे दोवारिआ ! अप्पमत्ता सएसु सएसु गुम्मट्ठाणेसु होध । एसो अज्ज गोवालदारओ गुत्तिं भञ्जिअ, गुत्तिवालं वावादिअ, बन्धणं भेदिअ, परिब्भट्टो अवक्कमदि । ता गेण्हध गेण्हध । ( अरे रे दौवारिकाः ! अप्रमत्ताः स्वकेषु स्वकेषु गुल्मस्थानेषु भवत । एषोद्य गोपालदारको गुप्तिं भङ्क्त्वा, गुप्तिपालकं व्यापाद्य, बन्धनं भित्त्वा, परिभ्रष्टोऽपक्रामति । तद्गृह्णीत गृह्णीत । )

(प्रविश्य अपटीक्षेपेण सम्भ्रान्त एकचरणलग्ननिगडोऽवगुण्ठित आर्यकः परिक्रामति ।)

चेटः—(स्वगतम् ।) महन्ते णअरीए सम्भमे उप्पण्णे, ता तुलिदं तुलिदं गमिश्शं । ( महान् नगर्यां सम्भ्रम उत्पन्नः, तत् त्वरितं त्वरितं गमिष्यामि । )

( इति निष्क्रान्तः । )

आर्यकः

हित्वाऽहं नरपतिबन्धनापदेश-
व्यापत्ति-व्यसन-महार्णवं महान्तम् ।
पादाग्र-स्थित-निगडैक-पाश-कर्षी
प्रभ्रष्टो गज इव बन्धनाद् भ्रमामि ॥ १ ॥

परिश्रान्तस्य = अत्यन्तश्रान्तस्य, प्रतिभासते = प्रतीयते, वस्तुतस्तथाऽभावेऽपि तथा प्रतीयते इति भावः, यातम्=युवां गच्छतम् ।।

शब्दार्थदौवारिकः = चौकीदार, गुल्मस्थानेषु = रक्षणीय स्थानों अर्थात् चौकियों पर, अप्रमत्ताः = सावधान, गुप्तिम्=कैदखाना, गुप्तिपालक=कैदखाने के रक्षक को, व्यापाद्य = मारकर, बन्धनम्=हथकड़ी, बेड़ी, परिभ्रष्टः=कारागार से निकला हुआ ।

अर्थ—अरे रे द्वारपालो ! अपने अपने गुल्मस्थानों ( सेना की चौकियों ) पर सावधान हो जाओ । आज वह अहीर का लड़का जेलखाना को तोड़कर रक्षक ( चौकीदार ) को मारकर बन्धन ( हथकड़ी-बेड़ी ) तोड़ कर निकला हुआ भागा जा रहा है । अतः उसे पकड़ो, पकड़ो ।

( पर्दा गिराये विना ही प्रवेश करके घबड़ाया हुआ, एक पैर में बेड़ीवाला, कपड़े से मुख ढके हुये आर्यक घूमता है । )

अर्थचेट--( अपने में ) नगरी में बहुत घबड़ाहट हो गई है, अतः अब जल्दी जल्दी चलता हूँ ।।

अन्वयः—महान्तम्, नरपतिबन्धनापदेशव्यापत्ति-व्यसन-महार्णवम्, हित्वा, पादाग्रस्थितनिगडैकपाशकर्षी, अहम्, बन्धनात्, प्रभ्रष्टः, गजः, इव, भ्रमामि ॥१॥

शब्दार्थमहान्तम्=बहुत विशाल, नरपतिबन्धनापदेशव्यापत्तिव्यसनमहा-र्णवम्=राजा की कैद के बहाने होनेवाली महती विपत्तिरूपी संकटरूपी समुद्र को, हित्वा-छोड़कर, पारकर, पादाग्रस्थितनिगडैकपाशकर्षी=पैर के अगले-नीचे भाग में बन्धी हुई बेड़ीरूप पाश = फन्दे को खींचने वाला, अहम्-मैं, गोपालदारक,

३८०मृच्छकटिकम्

भोः ! अहं खलु सिद्धादेश-जनित-परित्रासेन राज्ञा पालकेन घोषा- दानीय विशसने गूढागारे बन्धनेन बद्धः । तस्माच्च प्रियसहृच्छर्विलक- प्रसादेन बन्धनात् परिभ्रष्टोऽस्मि । ( अश्रूणि विसृज्य । )

बन्धनात्=जंजीर आदि बन्धन से, प्रभ्रष्टः=छूटे हुये, गजः=हाथी, इव=के समान, भ्रमामि=घूम रहा हूँ ॥ १ ॥

अर्थ— राजा की कैद के बहाने होनेवाली बहुत बड़ी आपित्तरूपी संकटरूपी समुद्र को पारकर एक पैर के नीचे की ओर लगी हुई बेड़ीरूप एक पाश (फन्दे) को खींचता हुआ मैं, बन्धन से छूटे हुये हाथी के समान घूम रहा हूँ ॥ १ ॥

टीका — सिद्धादेशभीतेन राज्ञा पालकेन कारागारे बद्धः गोपालदारकः आर्यकः कथञ्चित् कारागारबन्धनात् मुक्तः आत्मनो गजमुल्यतां प्रतिपादयति—हित्वेति । महान्तम्=अतिविशालम्, दुस्तरमित्यर्थः, नरपतिना=राज्ञा पालकेन; बन्धनम्=कारागारे निग्रहः, तदेव अपदेशः=व्याजः, यद् वा नरपतिबन्धनम् अपदेशः यस्याः सा नरपतिबन्धनापदेशा या व्यापत्तिः=महाविपत्तिः, तद्रूपं तत्सम्बन्धि यद् व्यसनम्, तदेव महार्णवः=महासमुद्रः, तम्, हित्वा=त्यक्त्वा, समुत्तीर्य, पादाग्रे=एकपादस्याधोभागे, स्थितः=विद्यमानः, यो निगडः=बन्धनशृङ्खला; 'बेड़ी' इति भाषायाम्, स एव एकपाशः, तं कर्षति=धारयति, तथोक्तः, अहम्=गोपालदारक आर्यकः, बन्धनात्=शृंखलादितः, प्रभ्रष्टः=प्रमुक्तः, गजः=हस्ती, इव=यथा, भ्रमामि=इतस्ततो विचरामि । उपमालंकारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ १ ॥

विमर्श— किसी सिद्ध पुरुष ने यह भविष्यवाणी की थी कि गोपालपुत्र आर्यक राजा बनेगा । वह सुन कर तत्कालीन राजा पालक घबड़ा गया । उसने आर्यक को बिना अपराध ही जेल में बन्द करवा दिया था । वह शर्विलक के सहयोग से किसी प्रकार जेल से निकलकर बाहर आ गया । वह अपनी अवस्था बन्धन से छूटे हुये हाथी के समान बता रहा है ।

बन्धन के बहाने —यहाँ अपह्नुति, संकटरूपी महार्णव में रूपक और गज इव में उपमा है, सभी का संकर है, प्रहर्षिणी छन्द है ॥ १ ॥

शब्दार्थ — सिद्धादेशजनितपरित्रासेन=सिद्ध महापुरुष की भविष्यवाणी से भयभीत, घोषात्-अहीरों की बस्ती से, विशसने=मृत्युतुल्य कष्टकारक, परिभ्रष्टः=प्रमुक्त हो गया ।

अर्थ — अरे ! सिद्ध महात्मा द्वारा की गई भविष्यवाणी से भयभीत राजा पालक द्वारा अहीरों की बस्ती से लाकर मृत्युकारक गूढ़ कारागार में बन्धनों ( हथकड़ी और बेड़ियों ) से बांध दिया गया था । उस कारागार के बन्धन से प्रिय मित्र शर्विलक की कृपा से मुक्त हो गया हूँ । ( आंसू गिराकर )

षष्ठोऽङ्कः ३८१

भाग्यानि मे यदि तदा मम कोऽपराधो यद्वन्यनाग इव संयमितोऽस्मि तेन । दैवी च सिद्धिरपि लङ्घयितुं न शक्या गम्यो नृपो बलवता सह को विरोधः ? ॥ २ ॥

टीका—सिद्धस्य=सिद्धिसम्पन्नस्य महापुरुषस्य, आदेशेन=कथनेन, घोषणया, जनितः=उत्पन्नः, परित्रासः=स्वराज्यहानिरूपं भयं यस्य तादृशेन, पालकेन=एतन्नामकेन, घोषात्=आभीरपल्लीतः, विशसने=मृत्युतुल्यकष्टकारके, गूढ़ागारे=गुप्ते कठिने च कारागारे, तस्मात्=गूढ़ागारात्, बन्धनात्=हस्तपादसंलग्न-लोहादि-बन्धनात्, परिभ्रष्टः=प्रमुक्तः ।

अन्वयः—यदि, मे, भाग्यानि, तदा, मम, कः, अपराधः, यत्, तेन, वन्यनागः, इव, संयमितः, अस्मि, दैवी, च, सिद्धिः, अपि, लङ्घयितुम्, न, शक्या, [तथापि], नृपः, गम्यः, बलवता, सह, कः, विरोधः ? ॥ २ ॥

शब्दार्थ—यदि=यदि, मे=मुझ आर्यक के, भाग्यानि=( राजा बनने के ) भाग्य हैं, तदा=तब, मम=मेरा, कः=कौन सा, अपराधः=गलती, है, यत्=जिसके कारण, तेन=इस राजा पालक ने, वन्यनागः इव=जंगली हाथी के समान, संयमितः=बांध दिया गया, अस्मि=हूँ, दैवी=भाग्य से होने वाली, सिद्धिः=राज्यादि की प्राप्ति, अपि=भी, लंघयितुम्=टाली जाने के लिये, न=नहीं, शक्या=योग्य, है, [ तथापि=फिर भी ] नृपः=राजा, गम्यः=सभी के द्वारा सेवा करने योग्य होता है, बलवता=बलशाली के साथ, कः=कौन, विरोधः=झगड़ा ? ॥ २ ॥

अर्थ—यदि [ राज्यप्राप्ति करना ] मेरे भाग्य हैं तो इसमें मेरा क्या अपराध है जिसके कारण उस राजा पालक ने मुझे जंगली हाथी के समान बन्धन में डलवा दिया था । भाग्य से होने वाली सिद्धि ( राज्यादिप्राप्ति ) टाली नहीं जा सकती । ( यह सच है फिर भी ) राजा ( सभी के लिये ) सेवा करने योग्य है, ( क्योंकि ) बलवान् के साथ क्या विरोध ? [ भाग्य में यदि राज्यप्राप्ति है तो वह अवश्य होगी अतः राजा के साथ मेरे विरोध का औचित्य नहीं है । ] ॥२॥

टीका - भाग्यवशात् राज्यप्राप्तिनिश्चये सति राज्ञा विरोधो न करणीय इति प्रतिपादयति—यदीति । यदि=चेत्, मे=मम आर्यकस्य, भाग्यानि=राज्यादिसुखभोगादीनि पूर्वतः निश्चितानि, अवश्यप्राप्तव्यानि, तदा=तर्हि, मम=मे; कः=कीदृशः, अपराधः=दोषः ? अत्र विषये अहं कथमपि न दोषीति भावः । यत्=यस्मात्, तेन=पालकेन राज्ञा, वन्यः=वने भवः, नागः=गजः, आरण्यो हस्ती, इव; संयमितः=बद्धः, अस्मि, दैवी=देवाद् आगता; सिद्धिः=राज्यादिप्राप्तिः, अपि, लंघयितुम्=वारयितुम्, न=नैव, शक्या=योग्या, मम भाग्ये यल्लिखितं तदवश्यमेव,

३८२ | मृच्छकटिकम्

तत् कुत्र गच्छामि मन्दभाग्यः ? (विलोक्य) इदं कस्यापि साधोरनावृतपक्षद्वारं गेहम्।

इदं गृहं भिन्नमदत्तदण्डो विशीर्णसन्धिश्च महाकपाटः।
ध्रुवं कुटुम्बी व्यसनाभिभूतां दशां प्रपन्नो मम तुल्यभाग्यः ॥ ३ ॥

प्राप्स्यतीति ज्ञात्वा न केनापि तद् वारयितुं शक्यते । तथापि=पूर्वस्थितौ सत्यामपि, नृपः=राजा, गम्यः=सर्वैः सेव्यः, भवतीति शेषः, यतो हि, बलवता=बलशालिना लोकेन सह, कः=कीदृशः, विरोधः=वैरम्, निर्बलस्येति शेषः । एवञ्च नाहं तेन सह शत्रुतामिच्छामीति तस्य भावः । अत्रोपमार्थान्तरन्यासावलंकारौ, वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ २ ॥

विमर्श—आर्यक भाग्य की महिमा बताते हुये राजा पालक की आलोचना करता हुआ भी उससे वैर करने के पक्ष में नहीं है। इस श्लोक में उपमा और अर्थान्तरन्यास अलंकार हैं। वसन्ततिलका छन्द है ॥ २ ॥

शब्दार्थ—मन्दभाग्यः=अभागा, साधोः=सज्जन पुरुष का, अनावृतपक्षद्वारम्=खुले हुये बगल के दरवाजा वाला, गेहम्=घर ।

अर्थ—तो अब अभागा मैं कहाँ जाऊ ? (देखकर) यह किसी सज्जन पुरुष का घर है जिसका बगलवाला दरवाजा खुला हुआ है ।

टीका—मन्दभाग्यः=मन्दं भाग्यं यस्य सः, भाग्यहीन इत्यर्थः, साधोः=सज्जनस्य, पक्षस्य=पार्श्वस्य, द्वारम्=पक्षद्वारम्, अनावृतम्=उद्घाटितं पक्षद्वारं यस्य तत् गेहम्=गृहम् ।

अन्वयः—इदम्, गृहम्, भिन्नम्, अदत्तदण्डः, विशीर्णसन्धिः, महाकपाटः, च, अस्ति, (एतेन प्रतीयते यत्) मम, तुल्यभाग्यः, कुटुम्बी, ध्रुवम्, व्यसनाभिभूताम्, दशाम्, प्रपन्नः, [अस्ति] ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—इदम्=यह, सामने दिखाई देनेवाला, गृहम्=घर, भिन्नम्=टूटा फूटा हुआ, च=और, अदत्तदण्डः=ब्योड़ा से शून्य, विशीर्णसन्धिः=खुले हुये जोड़ोंवाला, महाकपाटः=विशाल किवाड़ है, [अतः इससे, प्रतीयते=प्रतीत होता है, यत्=कि], मम=मेरे, तुल्यभाग्यः=समान भाग्यवाला, अभागा, कुटुम्बी=परिवारवाला, ध्रुवम्=निश्चित ही, व्यसनाभिभूताम् = परेशानियों से युक्त, दशाम्=दुर्दशा को, प्रपन्नः=प्राप्त हो चुका है ॥ ३ ॥

अर्थ—यह घर टूटा फूटा है। बिना ब्योड़ावाला, ढीले हुये जोड़ोंवाला विशाल किवाड़ है। [इससे यह प्रतीत होता है कि] मेरे समान भाग्यवाला अर्थात् अभागा यह परिवारवाला निश्चित ही दुःखों से युक्त दुर्दशा को प्राप्त हो चुका है ॥ ३ ॥

षष्ठोऽङ्कः

३८३

तदत्र तावत् प्रविश्य तिष्ठामि ।
( नेपथ्ये )
जाध गोणा ! जाध । ( यातं गावो ! यातम् । )
आर्यकः—( आकर्ण्य ) अये ! प्रवहणमित एवाभिवर्त्तते ।

भवेद् गोष्ठीयानं न च विषमशीलैरधिगतं
वधूसंयानं वा तदभिगमनोपस्थितमिदम् ।
बहिर्नेतव्यं वा प्रवह्र-जन-योग्यं विधिवशाद्
विविक्तत्वाच्छून्यं मम खलु भवेद्दैवविहितम् ॥ ४ ॥


इसलिये इसमें घुसकर ( छिपकर ) बैठता हूँ ॥ ३ ॥

टीका—सम्मुखस्थं जीर्णं शीर्णं गृहं विलोक्य तत्स्वामिनोऽपि स्वतुल्यां दुर्दशां प्रतिपादयति —इदमिति । इदम् = पुरोदृश्यमानम्, गृहम्=भवनम्, भिन्नम्=अनेक-भागेषु विदीर्णम्, अस्ति, च=तथा, अदत्तदण्डः=अदत्तः दण्डः=पृष्ठभागे अवरोधाय काष्ठविशेषः, अर्गला वा यस्य तादृशः, विशीर्णसन्धिः=विशीर्णः=विश्रृंखलितः सन्धिः = काष्ठखण्डानां संयोजनस्थानानि यस्य सः, एतद् द्वयमपि महाकपाटस्य विशेषणम्, महाकपाटः=विशालकपाटः, अस्ति, [ एतेन इदं प्रतीयते=ज्ञायते यत् ] मम=आर्यकस्य, तुल्यभाग्यः=सदृशं भाग्यं यस्य तादृशः, भाग्यहीन इत्यर्थः, कुटुम्बी=गृहाधिपतिः, ध्रुवम्=निश्चितरूपेण, व्यसनाभिभूताम्=विपत्तिसमाक्रान्ताम्, दशाम्=दुरवस्थाम्, प्रपन्नः=प्राप्तः, एवञ्चायमपि मत्सदृश एव वर्तते । अतोऽयं मां रक्षिष्यतीति भावः । अत्रोपमालंकारः, उपेन्द्रवज्रा च वृत्तम् ॥ ३ ॥

विमर्शः—यहाँ 'अदत्तदण्डः' और 'विशीर्णसन्धिः' ये दोनों महाकपाट के विशेषण हैं। किवाड़ों के पीछे की ओर सुरक्षा के लिये एक लकड़ी लगाई जाती है, जिसे 'व्योड़ा' कहा जाता है, वह बन्द दरवाजे में ही लगता है। सांकड़ के स्थान पर भी इसका प्रयोग होता है। यह यहाँ नहीं लगा है क्योंकि दरवाजा खुला है। लकड़ियों के जोड़ ढीले होने से उस किवाड़ में कई काष्ठखण्ड लगे हुये प्रतीत होते हैं। विशाल भवन और विशाल दरवाजा देखकर मकान-मालिक की बीती हुई सम्पन्नता का अनुमान होता है। यहाँ उपमा अलंकार और उपेन्द्रवज्रा छन्द है ॥ ३ ॥

( नेपथ्य में )

अर्थ—चलो बैलों, चलो ।

अन्वयः—इदम्, विषमशीलैः, अधिगतम्, गोष्ठीयानम्, न, च, भवेत्, वा, वधूसंयानम्, तदभिगमनोपस्थितम्, [ भवेत् ], अथवा, प्रवरजनयोग्यम्, बहिः, नेतव्यम्, [ भवेत् ], विधिवशात्, विविक्तत्वात्, शून्यम्, मम, खलु, दैवविहितम्, भवेत् ॥ ४ ॥