भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 468
३८०मृच्छकटिकम्

भोः ! अहं खलु सिद्धादेश-जनित-परित्रासेन राज्ञा पालकेन घोषा- दानीय विशसने गूढागारे बन्धनेन बद्धः । तस्माच्च प्रियसहृच्छर्विलक- प्रसादेन बन्धनात् परिभ्रष्टोऽस्मि । ( अश्रूणि विसृज्य । )

बन्धनात्=जंजीर आदि बन्धन से, प्रभ्रष्टः=छूटे हुये, गजः=हाथी, इव=के समान, भ्रमामि=घूम रहा हूँ ॥ १ ॥

अर्थ— राजा की कैद के बहाने होनेवाली बहुत बड़ी आपित्तरूपी संकटरूपी समुद्र को पारकर एक पैर के नीचे की ओर लगी हुई बेड़ीरूप एक पाश (फन्दे) को खींचता हुआ मैं, बन्धन से छूटे हुये हाथी के समान घूम रहा हूँ ॥ १ ॥

टीका — सिद्धादेशभीतेन राज्ञा पालकेन कारागारे बद्धः गोपालदारकः आर्यकः कथञ्चित् कारागारबन्धनात् मुक्तः आत्मनो गजमुल्यतां प्रतिपादयति—हित्वेति । महान्तम्=अतिविशालम्, दुस्तरमित्यर्थः, नरपतिना=राज्ञा पालकेन; बन्धनम्=कारागारे निग्रहः, तदेव अपदेशः=व्याजः, यद् वा नरपतिबन्धनम् अपदेशः यस्याः सा नरपतिबन्धनापदेशा या व्यापत्तिः=महाविपत्तिः, तद्रूपं तत्सम्बन्धि यद् व्यसनम्, तदेव महार्णवः=महासमुद्रः, तम्, हित्वा=त्यक्त्वा, समुत्तीर्य, पादाग्रे=एकपादस्याधोभागे, स्थितः=विद्यमानः, यो निगडः=बन्धनशृङ्खला; 'बेड़ी' इति भाषायाम्, स एव एकपाशः, तं कर्षति=धारयति, तथोक्तः, अहम्=गोपालदारक आर्यकः, बन्धनात्=शृंखलादितः, प्रभ्रष्टः=प्रमुक्तः, गजः=हस्ती, इव=यथा, भ्रमामि=इतस्ततो विचरामि । उपमालंकारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ १ ॥

विमर्श— किसी सिद्ध पुरुष ने यह भविष्यवाणी की थी कि गोपालपुत्र आर्यक राजा बनेगा । वह सुन कर तत्कालीन राजा पालक घबड़ा गया । उसने आर्यक को बिना अपराध ही जेल में बन्द करवा दिया था । वह शर्विलक के सहयोग से किसी प्रकार जेल से निकलकर बाहर आ गया । वह अपनी अवस्था बन्धन से छूटे हुये हाथी के समान बता रहा है ।

बन्धन के बहाने —यहाँ अपह्नुति, संकटरूपी महार्णव में रूपक और गज इव में उपमा है, सभी का संकर है, प्रहर्षिणी छन्द है ॥ १ ॥

शब्दार्थ — सिद्धादेशजनितपरित्रासेन=सिद्ध महापुरुष की भविष्यवाणी से भयभीत, घोषात्-अहीरों की बस्ती से, विशसने=मृत्युतुल्य कष्टकारक, परिभ्रष्टः=प्रमुक्त हो गया ।

अर्थ — अरे ! सिद्ध महात्मा द्वारा की गई भविष्यवाणी से भयभीत राजा पालक द्वारा अहीरों की बस्ती से लाकर मृत्युकारक गूढ़ कारागार में बन्धनों ( हथकड़ी और बेड़ियों ) से बांध दिया गया था । उस कारागार के बन्धन से प्रिय मित्र शर्विलक की कृपा से मुक्त हो गया हूँ । ( आंसू गिराकर )