मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३७६
( नेपथ्ये )
अरे रे दोवारिआ ! अप्पमत्ता सएसु सएसु गुम्मट्ठाणेसु होध । एसो अज्ज गोवालदारओ गुत्तिं भञ्जिअ, गुत्तिवालं वावादिअ, बन्धणं भेदिअ, परिब्भट्टो अवक्कमदि । ता गेण्हध गेण्हध । ( अरे रे दौवारिकाः ! अप्रमत्ताः स्वकेषु स्वकेषु गुल्मस्थानेषु भवत । एषोद्य गोपालदारको गुप्तिं भङ्क्त्वा, गुप्तिपालकं व्यापाद्य, बन्धनं भित्त्वा, परिभ्रष्टोऽपक्रामति । तद्गृह्णीत गृह्णीत । )
(प्रविश्य अपटीक्षेपेण सम्भ्रान्त एकचरणलग्ननिगडोऽवगुण्ठित आर्यकः परिक्रामति ।)
चेटः—(स्वगतम् ।) महन्ते णअरीए सम्भमे उप्पण्णे, ता तुलिदं तुलिदं गमिश्शं । ( महान् नगर्यां सम्भ्रम उत्पन्नः, तत् त्वरितं त्वरितं गमिष्यामि । )
( इति निष्क्रान्तः । )
आर्यकः—
हित्वाऽहं नरपतिबन्धनापदेश-
व्यापत्ति-व्यसन-महार्णवं महान्तम् ।
पादाग्र-स्थित-निगडैक-पाश-कर्षी
प्रभ्रष्टो गज इव बन्धनाद् भ्रमामि ॥ १ ॥
परिश्रान्तस्य = अत्यन्तश्रान्तस्य, प्रतिभासते = प्रतीयते, वस्तुतस्तथाऽभावेऽपि तथा प्रतीयते इति भावः, यातम्=युवां गच्छतम् ।।
शब्दार्थ—दौवारिकः = चौकीदार, गुल्मस्थानेषु = रक्षणीय स्थानों अर्थात् चौकियों पर, अप्रमत्ताः = सावधान, गुप्तिम्=कैदखाना, गुप्तिपालक=कैदखाने के रक्षक को, व्यापाद्य = मारकर, बन्धनम्=हथकड़ी, बेड़ी, परिभ्रष्टः=कारागार से निकला हुआ ।
अर्थ—अरे रे द्वारपालो ! अपने अपने गुल्मस्थानों ( सेना की चौकियों ) पर सावधान हो जाओ । आज वह अहीर का लड़का जेलखाना को तोड़कर रक्षक ( चौकीदार ) को मारकर बन्धन ( हथकड़ी-बेड़ी ) तोड़ कर निकला हुआ भागा जा रहा है । अतः उसे पकड़ो, पकड़ो ।
( पर्दा गिराये विना ही प्रवेश करके घबड़ाया हुआ, एक पैर में बेड़ीवाला, कपड़े से मुख ढके हुये आर्यक घूमता है । )
अर्थ—चेट--( अपने में ) नगरी में बहुत घबड़ाहट हो गई है, अतः अब जल्दी जल्दी चलता हूँ ।।
अन्वयः—महान्तम्, नरपतिबन्धनापदेशव्यापत्ति-व्यसन-महार्णवम्, हित्वा, पादाग्रस्थितनिगडैकपाशकर्षी, अहम्, बन्धनात्, प्रभ्रष्टः, गजः, इव, भ्रमामि ॥१॥
शब्दार्थ—महान्तम्=बहुत विशाल, नरपतिबन्धनापदेशव्यापत्तिव्यसनमहा-र्णवम्=राजा की कैद के बहाने होनेवाली महती विपत्तिरूपी संकटरूपी समुद्र को, हित्वा-छोड़कर, पारकर, पादाग्रस्थितनिगडैकपाशकर्षी=पैर के अगले-नीचे भाग में बन्धी हुई बेड़ीरूप पाश = फन्दे को खींचने वाला, अहम्-मैं, गोपालदारक,