मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३७१
रदनिका-एहि बच्छ ! सअड़िआए कीलम्ह । ( एहि वत्स ! शकटिकया क्रीडावः । )
दारकः---( सकरुणम् ) रदणिए ! किं मम एदाए मट्टिआसक्कडिआए, तं ज्जेव सोवण्ण-सअड़िअं देहि । ( रदनिके ! किं मम एतया मृत्तिकाशकटिकया; तामेव सौवर्णशकटिकां देहि । )
रदनिका--( सनिर्वेदं निश्वस्य ) जाद ! कुदो अम्हाणं सुवण्णववहारो ? तादस्स पुणो वि रिद्धीए सुवण्णसअड़िआए कीलिस्ससि । ता जाव विणोदेमि णं, अज्जआ-वसन्तसेणाआए समीवं उवसप्पिस्सं । ( उपसृत्य ) अज्जए ! पणमामि । ( जात ! कुतोऽस्माकं सुवर्णव्यवहारः ? तातस्य पुनरपि ऋद्ध्या सुवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि । तद्यावद्विनोदयाम्येनम् । आर्यावसन्तसेनायाः समीपमुपसर्पिष्यामि । ) ( आर्ये ! प्रणमामि । )
वसन्तसेना--रदणिए ! साअदं दे । कस्स उण अअं दारओ ? अणलंककिद-सरीरो वि चन्दमुहो आणन्देदि मम हिअअं । ( रदनिके ! स्वागतं ते । कस्य पुनरयं दारकः ? अनलङ्कृतशरीरोऽपि चन्द्रमुख आनन्दयति मम हृदयम् । )
रदनिका--एसो क्खु अज्जचारुदत्तस्स पुत्तो रोहसेणो णाम । ( एष खलु आर्यचारुदत्तस्य पुत्रो रोहसेनो नाम । )
वसन्तसेना--( बाहू प्रसार्य ) एहि मे पुत्तअ ! आलिङ्ग । ( इत्यङ्क उपवेश्य ) अणुकिदं अणेण पिदुणो रूवं । ( एहि मे पुत्रक ! आलिङ्ग । अनुकृतमनेन पितुः रूपम् । )
रदनिका-- आओ बच्चे ! गाड़ी से खेलें ।
बालक --( करुणा के साथ ) रदनिके, इस मिट्टी की गाड़ी से मेरा क्या [ प्रयोजन ] ? मुझे वही सोने की बनी गाड़ी दीजिये ।
रदनिका --( दुःख के साथ निःश्वास लेकर ) बेटे ! हम लोगों का सोने का व्यवहार कहाँ ? पिता की पुनः सम्पन्नता से सोने की गाड़ी से खेलोगे । तब तक इस बालक का मन बहलाती हूँ, आर्या वसन्तसेना के पास चलती हूँ । ( पास जाकर ) आर्ये ! प्रणाम करती हूँ ।
वसन्तसेना--रदनिके ! तुम्हारा स्वागत है । यह किसका बेटा है ? आभूषण-शून्य शरीरवाला भी चन्द्रतुल्य मुखवाला यह मेरे हृदय को आनन्दित कर रहा है ।
रदनिका-- यह आर्यचारुदत्त का पुत्र रोहसेन है ।
वसन्तसेना--( दोनों हाथ फैलाकर ) आओ मेरे प्यारे बेटे ! आलिङ्गन करो । ( यह कह कर गोद में बैठा कर ) इसने अपने पिता के रूप की नकल की है, वह भी अपने पिता के समान ही है ।