मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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रदनिका--ण केवलं रूवं सीलं पि तक्केमि, एदिणा अज्जचारुदत्तो अत्ताणं विणोदेदि । ( न केवलं रूपम्, शीलमपि तर्कयामि । एतेन आर्यचारुदत्त आत्मानं विनोदयति । )
वसन्तसेना--अध किं णिमित्तं एसो रोअदि ? ( अथ किं निमित्तमेष रोदिति ? )
रदनिका--एदिणा पडिवेसअ-गहवइ-दारअ-केरिआइए सुवण्ण-सअड़िआए कीलिदं, तेण अ सा णीदा, तदो उण तं मग्गन्तस्स मए इमं मट्टिआ-सअड़िआ कडुअ दिण्णा । तदो भणादि-रदणिए ! किं मम एदाए मट्टिआ-सअड़िआए, तं ज्जेव सोवण्ण-सअड़िअं देहि' त्ति । ( एतेन प्रतिवेशिकगृहपति-दारकस्य सुवर्णशकटिकया क्रीडितम्, तेन च सा नीता, ततः पुनस्तां याचतो मया इयं मृत्तिकाशकटिका कृत्वा दत्ता । ततो भणति—'रदनिके ! किं मम एतया मृत्तिका-शकटिकया, तामेव सौवर्ण-शकटिकां देहि' इति । )
वसन्तसेना--हद्धी हद्धी ! अअं पि णाम पर-सम्पत्तीए सन्तप्पदि ! भअवं कदन्त ! पोक्खर-पत्त-वडिद-जलविन्दु-सरिसेहिं कीळसि तुमं पुरिस-भाअधेएहि ( इति सास्त्रा ) जाद ! मा रोद, सोवण्ण-सअड़िआए केलिस्ससि । ( हा धिक्, हा धिक्, अयमपि नाम परसम्पत्त्या सन्तप्यते । भगवन् कृतान्त ! पुष्कर-पत्र-पतित-जलविन्दु-सदृशैः क्रीडसि त्वं पुरुषभाग-धेयैः । जात ! मा रोदिहि, सौवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि । )
दारकः--रदणिए ! का एसा ? ( रदनिके ! का एषा ? )
रदनिका—केवल रूप की ही नहीं, स्वभाव की भी ( नकल की है ); ऐसा सोचती हूँ । आर्य चारुदत्त इसके साथ अपना मनोविनोद करते हैं ।
वसन्तसेना—अच्छा, यह किसलिये रो रहा है ?
रदनिका—इसने पड़ोस के घर के मालिक के बच्चे की सोने की गाड़ी से खेला है, और उसने वह गाड़ी ले ली है, इसके बाद उसको मांगते हुये इसे मैंने मिट्टी की गाड़ी बनाकर दे दी । इसके बाद यह कह रहा है—'रदनिके ! इस मिट्टी की गाड़ी से मेरा क्या ( प्रयोजन ) ? वही सोने की बनी हुई गाड़ी दो ।'
वसन्तसेना—हाय ! हाय ! यह भी दूसरे की सम्पत्ति के कारण दुःखी हो रहा है । भगवन् भाग्य ! तुम कमलपत्र पर गिरे हुये पानी के बूंद के समान पुरुष के भाग्य से खेल करते हो । ( इस प्रकार अश्रुयुक्त होकर ) बेटा ! मत रोओ, (फिर) सोने की गाड़ी से खेलोगे ।
बालक—रदनिके ! यह कौन है ?