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मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

३१३ | मृच्छकटिकम्

रदनिका--ण केवलं रूवं सीलं पि तक्केमि, एदिणा अज्जचारुदत्तो अत्ताणं विणोदेदि । ( न केवलं रूपम्, शीलमपि तर्कयामि । एतेन आर्यचारुदत्त आत्मानं विनोदयति । )

वसन्तसेना--अध किं णिमित्तं एसो रोअदि ? ( अथ किं निमित्तमेष रोदिति ? )

रदनिका--एदिणा पडिवेसअ-गहवइ-दारअ-केरिआइए सुवण्ण-सअड़िआए कीलिदं, तेण अ सा णीदा, तदो उण तं मग्गन्तस्स मए इमं मट्टिआ-सअड़िआ कडुअ दिण्णा । तदो भणादि-रदणिए ! किं मम एदाए मट्टिआ-सअड़िआए, तं ज्जेव सोवण्ण-सअड़िअं देहि' त्ति । ( एतेन प्रतिवेशिकगृहपति-दारकस्य सुवर्णशकटिकया क्रीडितम्, तेन च सा नीता, ततः पुनस्तां याचतो मया इयं मृत्तिकाशकटिका कृत्वा दत्ता । ततो भणति—'रदनिके ! किं मम एतया मृत्तिका-शकटिकया, तामेव सौवर्ण-शकटिकां देहि' इति । )

वसन्तसेना--हद्धी हद्धी ! अअं पि णाम पर-सम्पत्तीए सन्तप्पदि ! भअवं कदन्त ! पोक्खर-पत्त-वडिद-जलविन्दु-सरिसेहिं कीळसि तुमं पुरिस-भाअधेएहि ( इति सास्त्रा ) जाद ! मा रोद, सोवण्ण-सअड़िआए केलिस्ससि । ( हा धिक्, हा धिक्, अयमपि नाम परसम्पत्त्या सन्तप्यते । भगवन् कृतान्त ! पुष्कर-पत्र-पतित-जलविन्दु-सदृशैः क्रीडसि त्वं पुरुषभाग-धेयैः । जात ! मा रोदिहि, सौवर्णशकटिकया क्रीडिष्यसि । )

दारकः--रदणिए ! का एसा ? ( रदनिके ! का एषा ? )


रदनिका—केवल रूप की ही नहीं, स्वभाव की भी ( नकल की है ); ऐसा सोचती हूँ । आर्य चारुदत्त इसके साथ अपना मनोविनोद करते हैं ।

वसन्तसेना—अच्छा, यह किसलिये रो रहा है ?

रदनिका—इसने पड़ोस के घर के मालिक के बच्चे की सोने की गाड़ी से खेला है, और उसने वह गाड़ी ले ली है, इसके बाद उसको मांगते हुये इसे मैंने मिट्टी की गाड़ी बनाकर दे दी । इसके बाद यह कह रहा है—'रदनिके ! इस मिट्टी की गाड़ी से मेरा क्या ( प्रयोजन ) ? वही सोने की बनी हुई गाड़ी दो ।'

वसन्तसेना—हाय ! हाय ! यह भी दूसरे की सम्पत्ति के कारण दुःखी हो रहा है । भगवन् भाग्य ! तुम कमलपत्र पर गिरे हुये पानी के बूंद के समान पुरुष के भाग्य से खेल करते हो । ( इस प्रकार अश्रुयुक्त होकर ) बेटा ! मत रोओ, (फिर) सोने की गाड़ी से खेलोगे ।

बालक—रदनिके ! यह कौन है ?

षष्ठोऽङ्कः ३७३

वसन्तसेना—पिदुणो दे गुणणिज्जिदा दासी। (पितुस्ते गुणनिर्जिता दासी।)

रदनिका—जाद ! अज्जआ दे जणणी भोदि। (जात ! आर्या ते जननी भवति।)

दारकः—रदणिए ! अलिअं तुमं भणासि, जइ अम्हाणं अज्जआ जणणी, ता कीस अलङ्किदा ? (रदनिके ! अलीकं त्वं भणसि, यद्यस्माकमार्या जननी, तत् केन अलङ्कृता ?)

वसन्तसेना—जाद ! मुद्धेण मुहेण अतिकरुणं मन्तेसि। (नाट्येनाभरणान्यवतार्य रोदती।) एसा दाणिं दे जणणी संवृत्ता, ता गेण्ह एवं अलङ्कारं सोवण्ण-सअडिअं घड़ावेहि। (जात ! मुग्धेन मुखेन अतिकरुणं मन्त्रयसि।) (एषा इदानीं ते जननी संवृत्ता। तत् गृहाणैतमलङ्कारम्, सौवर्णशकटिकां घटय।)

दारकः—अवेहि, ण गेण्हिस्सं, रोदसिं तुमं। (अपेहि, न ग्रहीष्यामि, रोदिषि त्वम्।)

वसन्तसेना—(अश्रूणि प्रमृज्य) जाद ! ण रोदिस्सं गच्छ, कील। (अलङ्कारैर्मृच्छकटिकां पूरयित्वा) जाद ! कारेहि सोवण्णसअडिअं। (जात ! न रोदिष्यामि, गच्छ, क्रीड।) (जात ! कारय सौवर्णशकटिकाम्।)

(इति दारकमादाय निष्क्रान्ता रदनिका।)


वसन्तसेना—तुम्हारे पिता के गुणों से वश में की गयी दासी।

रदनिका—बेटा ! यह तुम्हारी माता लगती हैं।

बालक—रदनिके ! तुम झूठ बोलती हो, यदि आर्या हमारी जननी है, तो किसलिये सजी हुयी हैं ?

वसन्तसेना—बेटे ! भोले मुख से अति कठिन बात कह रहे हो। (अभिनय के साथ गहने उतार कर रोती हुई) लो, यह मैं अब तुम्हारी जननी बन गई। तो इन गहनों को ले लो, सोने की गाड़ी बनवा लो।

बालक—हट जाओ, नहीं लूंगा, तुम रो रही हो।

वसन्तसेना—(आंसू पोंछकर) बेटे ! नहीं रोऊँगी, जाओ, खेलो। बेटे ! सोने की गाड़ी बनवा लो।

(इस प्रकार बच्चे को लेकर रदनिका चली जाती है।)

टीका—दारकम्=बालकम्, सनिर्वेदम्=निर्वेदः=कष्टम्, तेन सह, सौवर्णशकटिकाम्=सुवर्णेन निर्मिता सौवर्णा, सा चासौ शकटिका=यानम्, सुवर्णव्यवहारः=हेम्नो व्यवहारः=प्रयोगः, अनलंकृतं शरीरं यस्य तादृशः=आभूषणशून्यदेहः, चन्द्रमुखः=चन्द्र-सदृशमुखः, अनुकृतम् = धृतम्, प्रतिवेशिगृहपतेः=प्रतिवेशिगृहस्वामिनः, शारकस्य=

३७४मृच्छकटिकम्

( प्रविश्य प्रवहणाधिरूढः )

चेटः—रदणिए ! रदणिए ! णिवेदेहि अज्जआए वशन्तशेणाए—'ओहालिअं पक्खदुआलाए शज्जं पवहणं चिट्ठति ।' ( रदनिके ! रदनिके ! निवेदय आर्यायं वसन्तसेनायै—'अपवारितं पक्षद्वारके सज्जं प्रवहणम् तिष्ठति' । )

( प्रविश्य )

रदनिका—अज्जए ! एसो वड्ढमाणओ विष्णवेदि—'पक्खदुआरए


बालकस्य, सन्तप्यते=सन्तापमनुभवति, पुष्करपत्रे=कमलपत्रे, पतितः=निपतितो यो जलबिन्दुः, तेन सदृशः = समानः, पुरुषभागधेयैः=मनुष्यभाग्यैः, 'भागरूपनामभ्यो धेयः' इति स्वार्थे धेयप्रत्ययः, सास्त्रा=अश्रुसहिता, जननी भवति=जननी लगति, न तु वस्तुतः जन्मदात्रीति भावः, अतिकरुणम्=सकारुण्यम्, मन्त्रयसि=वदसि, अवतार्य=स्वशरीरात् पृथक्कृत्य, घटय=निर्मापय, अपेहि=दूरं याहि, मृच्छकटिकाम्=मृन्मयीं शकटिकामित्यर्थः ॥

विमर्श—इस प्रकरण के नाम का आधार यहीं की घटना है। मिट्टी की गाड़ी से न खेलने की जिद करनेवाले रोहसेन के साथ वसन्तसेना का व्यवहार अनुकरणीय है। वह गणिका केवल चारुदत्त के साथ वासनात्मक सम्बन्ध की ही भूखी नहीं है, वह उसके प्रत्येक सुख-दुःख की भागीदार बनना चाहती है। वह चारुदत्त के बालक की मार्मिक बात "यदि अस्माकमार्या जननी, तत् केन अलंकृता' सुनकर स्त्रीसुलभ करुणा से पिघल जाती है और तत्काल सभी आभूषण उतारकर बच्चे को सोने की गाड़ी बनाने के लिये दे देती है।

यद्यपि यह घटना अत्यल्पकालिक है तथापि वसन्तसेना के चरित्र को उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने के लिये पर्याप्त है।

शब्दार्थअपवारितम्=वस्त्रादि से ढकी हुई, प्रवहणम्=बैलगाड़ी, पक्षद्वारके=बगलवाले दरवाजे पर, सज्जम्=हर प्रकार की सुविधा से सजी हुई, प्रसाधयामि=सजा लूं, यानास्तरणम् = गाड़ी का बिछौना, नस्यरज्जुकटुका=नाक में पड़ी हुई रस्सी के कारण और तेज भागने वाले, गतागतिम् = आना-जाना। उपनय=ले आओ ।

( गाड़ी पर बैठा हुआ प्रवेश करके )

अर्थचेट—रदनिके ! रदनिके ! आर्या वसन्तसेना से यह निवेदन कर दो कि---'वस्त्र=पर्दे से ढकी हुई गाड़ी बगलवाले दरवाजे पर तैयार खड़ी है ।'

( प्रवेश करके )

रदनिका—आर्ये ! यह वर्धमानक सूचित कर रहा है कि—बगलवाले दरवाजे

षष्ठोऽङ्कः | ३७५

सज्जं पवहणं' त्ति । (आर्ये ! एष वर्द्धमानको विज्ञापयति—'पक्षद्वारे सज्जं प्रवहणम्' इति ।)

वसन्तसेना—हञ्जे ! चिट्ठदु मुहुत्तअं, जाव अहं अत्ताणअं पसाधेमि ।
(हञ्जे ! तिष्ठतु मुहूर्त्तकम्, यावदहमात्मानं प्रसाधयामि ।)
(निष्क्रम्य)

रदनिका—वड्ढमाणअ ! चिट्ठ मुहुत्तं जाव अज्जआ अत्ताणअं पसाधेदि । (वर्द्धमानक ! तिष्ठ मुहूर्त्तकं, यावदार्या आत्मानं प्रसाधयति ।)

चेटः—ही ही भो ! मए वि जाणत्थलके विसुमरिदे, ता जाव गेण्हिअ आगच्छामि । एदे णश्या—लज्जु—कडुका वइल्ला । भोदु, पवहणेण ज्जेव गदागदिं कलिस्शं । (इति निष्क्रान्तश्चेटः ।) (हीही भोः ! मयापि यानास्तरणं विस्मृतम्, तत् यावद् गृहीत्वा आगच्छामि । एतौ नस्यरज्जु-कटुकौ बलीवर्द्दोः । भवतु, प्रवहणेनैव गतागतिं करिष्यामि ।)

वसन्तसेना—हञ्जे ! उवणेहि मे पसाधणं. अत्ताणअं पसाधइस्सं ।
(हञ्जे उपनय मे प्रसाधनम्, आत्मानं प्रसाधयिष्यामि ।) (इति प्रसाधयन्ती स्थिता ।)


पर गाड़ी तैयार खड़ी है।

वसन्तसेना—सखि ! वह कुछ देर रुक जाय, तब तक मैं अपने को सजा लेती हूँ, [ तैयार कर लेती हूँ । ]

(निकल कर)

रदनिका—वर्धमानक ! कुछ देर रुक जाओ, जब तक आर्या अपने को सजा लेती हैं।

चेट—अरे आश्चर्य है, मैं भी गाड़ी का विछावन भूल गया, तो तब तक जाकर ले आता हूँ। नथी हुई नाक में रस्सी पड़ी होने से ये बैल और तेज भागने वाले हो गये हैं। अच्छा तो मैं गाड़ी से ही जाना आना कर लेता हूँ [ गाड़ी से जाऊँगा और गाड़ी से वापस आऊँगा । ] (ऐसा कह कर चेट निकल जाता है ।)

वसन्तसेना—सखि ! सजाने की सामग्री लाओ, मैं अपने को सजाऊँगी ।
(ऐसा कह कर सजाती हुई खड़ी है ।)

टीका—प्रवहतेऽनेनेति प्रवहणम्, तत्र आरूढः=आसीनः, चेटः=सेवकविशेषः, अपवारितम्=वस्त्रादिपरिवृतम्, पक्षद्वारके=पक्षस्थं=पार्श्वस्थं द्वारम् एव द्वार कम्, तत्र, सज्जम्=अपेक्षितवस्तुयुक्तमिति भावः, मुहूर्त्तकम्=अल्पकालम्, तिष्ठतु=प्रतीक्षताम्, प्रसाधयामि = सज्जीकरोमि, यानास्तरणम्=यातस्य उपवेशनोपयोगिवस्त्रादिकम्, नस्या=नासिकायां स्थिता रज्जुः, सा चासौ तथोक्ता, तया कटुकाः=अतितीव्रधावकाः, बलीवर्दाः=वृषभाः, गतागतिम्=गमनागमनम्, उपनय=आनीय समर्पय, प्रसाधनम्=अलंकरणपदार्थम् ।

३७६ | मृच्छकटिकम्

( प्रविश्य प्रवहणाधिरूढः )

स्थावरकः चेटः--आणत्तोम्हि लाअ-शालअशण्ठाणेण-'थावलआ ! पवहणं गेण्हिअ पुप्फकलण्डअं जिण्णुज्जाणं तुलिदं आअच्छेहि' त्ति । भोदु, तहिं ज्जेव गच्छामि । वहध वइल्ला ! वहध । ( परिक्रम्यावलोक्य च । ) कधं गामशअलेहिं लुद्धे मग्गे । किं दाणि एत्थ कलइश्शं । ( साटोपम् ) अले ले ! ओशलध ओशलध । ( आकण्र्य ) किं भणाध-'एशे कश्श केलके पवहणे' त्ति । एशे लाअ-शालअ-शण्ठाणकेलके पवहणे त्ति । ता शिग्धं ओशलध । ( अवलोक्य । ) कधं एशे अवले शहिअं विअ मं पेक्खिअ शहश ज्जेव जूदपलाइदे विअ जूदिअले ओहालिअ अत्ताणं अण्णदो अवक्कन्ते ! ता को उण एशे ? अथवा किं मम एदिणा । तुलिदं गमिश्शं । अले ले गामेलुआ ! ओशलध ओशलध । किं भणाध-'मुहुत्तअं, चिट्ठ, चक्कपलिबट्टि देहि' त्ति । अले ले ! लाअशालअ-शष्टाण-केलके हग्गे शूले चक्केपलिबट्टि दइश्शं ? अथवा


शब्दार्थ--राजश्यालकसंस्थानेन=राजा के साले संस्थानक नामवाले के द्वारा, पुष्पकरण्डक=बगीचा-विशेष, वहतम् = दोनों चलो, ग्रामशकटैः = गांववालों की गाड़ियों से, अपसरत=अलग हटो, सभिकम्=प्रधान जुआड़ी, द्यूतपलायितः=जुये से हारकर भागा हुआ, अपवार्य=छिपा कर, अपक्रान्तः=निकल कर भाग गया, चक्र-परिवृत्तिम्=पहिये को घुमाने में सहारा, तपस्वी=असहाय, नेमीशब्दः=धुरी की आवाज, त्वरते=मिलने के लिये जल्दीबाजी कर रहा है, विश्राम्य=विश्राम करो, दक्षिणाक्षिस्पन्दम्=दाहिनी आँख का फड़कना, अधिरुह्य=चढ़कर, अनिमित्तम्=अपशकुन, प्रमार्जयिष्यति=दूर करेगा, अपसारिताः=हटा दिये, भारिकम्=वजन वाला, चक्रपरिवृत्तिकया=पहिया घुमाने में होनेवाले कष्ट के कारण, परिश्रान्तस्य=अधिक थक जानेवाले ।

( गाड़ी पर चढ़ा हुआ चेट प्रवेश करके )

अर्थ —स्थावरक-चेट—राजा के साले संस्थानक ने मुझे यह आज्ञा दी है—'स्थावरक ! गाड़ी लेकर पुष्पकरण्डक जीर्ण उद्यान में जल्दी से आ जाना।' अच्छा, वहीं चलता हूँ। अच्छा चलो बैलों ! चलो । ( घूम कर और देख कर ) क्या गाँव की गाड़ियों से रास्ता रुक गया ? अब यहाँ क्या करूँ ? (गर्व के साथ) अरे रे ! हटो,हटो । (सुनकर) क्या कह रहे हो-'यह किसकी गाड़ी है ? यह राजा के साले संस्थानक की गाड़ी है।' इसलिये जल्दी से हट जाओ । ( देखकर ) जुआ से भागे हुये जुआड़ी के समान यह दूसरा ( पुरुष ) जुआ खिलाने वाले ( प्रधान जुआरी ) के समान मुझे देखकर अपने को छिपा कर जल्दी से दूसरी ओर क्यों भाग गया ?

षष्ठोऽङ्कः ३७७

एशे एआइ तवश्शी । ता एव्वं कलेमि, एदं पवहणं अज्जचालुदत्तश्श रुक्खवाड़िआए पक्खदुआलए थावेमि । ( इति प्रवहणं संस्थाप्य । ) एशे म्हि आअदे । ( आज्ञप्तोऽस्मि राज-श्यालक-संस्थानेन-'स्थावरक ! प्रवहणं गृहीत्वा पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं त्वरितमागच्छ' इति । भवतु तत्रैव गच्छामि । वहतं बलीवदौ ! वहतम् । कथं यामशकटैः रुद्धो मार्गः । किमिदानीमत्र करिष्यामि ? अरे रे ! अपसरत अपसरत । किं भणत-'एतत् कस्य प्रवहणम् ?' इति । एतत् राज्यश्यालक-संस्थानस्य प्रवहणमिति । तत् शीघ्रमपसरत । कथम् एषः अपरः सभिकमिव मां प्रेक्ष्य सहसैव द्यूतपलायित इव द्यूतकरः अपवार्यात्मानम् अन्यतः अपक्रान्तः । तत् कः पुनरेषः ? अथवा किं मम एतेन ? त्वरितं गमिष्यामि । अरे रे ग्राम्याः ! अपसरत अपसरत । किं भणथ-‘मुहूर्त्तकं तिष्ठ, चक्रपरिवृत्तिं देहि' इति । अरे रे ! राज-श्यालक-संस्थानस्य अहं शूरः चक्रपरिवृत्तिं दास्यामि ? अथवा एष एकाकी तपस्वी । तदेगं करोमि । एतत् प्रवहणमार्यचारुदत्तस्य वृक्षवाटिकायाः पक्षद्वारके स्थापयामि । एषोऽस्मि आगतः । ) ( इति निष्क्रान्तः । )

**चेटी—**अज्जए ! णेमिसद्दो विअ सुणीअदि, ता आअदो पवहणो । ( आर्ये ! नेमिशब्द इव श्रूयते, तदागतं प्रवहणम् । )

**वसन्तसेना—**हञ्जे ! गच्छ, तुवरदि मे हिअअं । ता आदेसेहि पक्खदुआरअं । ( हञ्जे ! गच्छ, त्वरते मे हृदयम् । तदादेशय पक्षद्वारकम् । )

**चेटी—**एदु, एदु अज्जआ । ( एतु, एतु आर्या । )

वसन्तसेना—(परिक्रम्य ।) हञ्जे ! वीसम तुमं । (हञ्जे विश्राम्य त्वम् ।)


अच्छा तो फिर यह कौन है ? अथवा मुझे इससे क्या [ प्रयोजन ] ? शीघ्र चलूँगा । अरे गाँववालों ! दूर हटो । ( सुनकर ) क्या कह रहे हो—'कुछ देर रुक जाओ, ( फंसे ) पहिये को घुमाने में सहायता कर दो ।' अरे मैं राजा के साले संस्थानक का बहादुर आदमी पहिया घुमाने में सहायता करूँगा ? अथवा यह बेचारा अकेला है । तो ऐसा करता हूँ ( इसकी सहायता कर देता हूँ । ) यह गाड़ी चारुदत्त के बगीचे के किनारे वाले दरवाजे के पास खड़ी करता हूँ । ( गाड़ी को खड़ी करके ) यह मैं आ गया । ( यह कहकर चला जाता है ।)

**चेटी—**आर्ये ! धुरी की आवाज सुनाई देती है, अतः गाड़ी आ गई [ ऐसा लगता है ] ।

**वसन्तसेना—**सखि ! आओ, मेरा हृदय मिलने के लिये उतावला है । अतः बगलवाला दरवाजा दिखाओ ।

**चेटी—**आर्या, आइये, आइये ।

वसन्तसेना—( घूमकर ) सखि ! तुम विश्राम करो ।

३७८मृच्छकटिकम्

चेटी--जं अज्जआ आणवेदि । (यदार्या आज्ञापयति) (इति निष्क्रान्ता ।)

वसन्तसेना--(दक्षिणाक्षिस्पन्दं सूचयित्वा प्रवहणमधिरुह्य च ।) किण्णेदं फुरदि दाहिणं लोअअं ? अथवा चारुदत्तस्स ज्जेव दंसणं अणिमित्तं पमज्जइस्यदि । (किन्नु इदं स्फुरति दक्षिणं लोचनम् ? अथवा चारुदत्तस्यैव दर्शनमनिमित्तं प्रमार्जयिष्यति ।)

(प्रविश्य)

स्थावरकचेटः—ओशालिदा मए शअड़ा, ता जाव गच्छामि । (इति नाट्येनाधिरुह्य चालयित्वा स्वगतम् ।) भालिके पवहणे । अथवा चक्कप-लिवट्टिआए पल्लिशन्तरश भालिके पवहणे पडिभाशेदि । भोदु, गमिश्शं । जाध गोणा जाध । (अपसारिता मया शकटाः तद् यावद् गच्छामि । भारिकं प्रवहणम् । अथवा चक्र-परिवृत्तिकया परिश्रान्तस्य भारिकं प्रवहणं प्रतिभासते । भवतु, गमिष्यामि । यातं गावौ ! यातम् ।)


चेटी—आर्या की जैसी आज्ञा । (वह निकल जाती हैं।)

वसन्तसेना--(दाहिनी आँख का फड़कना सूचित करके और गाड़ी पर बैठकर) यह दाहिनी आंख किस लिये फड़क रही है ? अथवा चारुदत्त का दर्शन ही अपशकुन दूर करेगा ।

(प्रवेश करके)

स्थावरक चेट—मैंने गाड़ियाँ हटा दीं हैं, तो अब चलता हूँ । (यह कहकर अभिनय के साथ गाड़ी पर चढ़कर और चलाकर—अपने में) गाड़ी बोझदार लगती है । अथवा पहिया घुमाने में परिश्रम करने से थके हुये मुझको गाड़ी बोझ-वाली लग रही है । अच्छा, चलूं । चलो बैलों ! चलो ।।

टीका--**प्रवहणाधिरूढः=**वाह्नारूढः, **ग्रामशकटैः=**ग्राम्यवाहनैः, **रुद्धः=**अवरुद्धः, **अपसरत=**अपगच्छत, सभिकमिव = द्यूतसभाध्यक्षमिव, **प्रेक्ष्य=**विलोक्य, **द्यूतपला-यितः=**पराजितः सन् द्यूतस्थलात् अन्यत्र प्रयात:, **अपवार्य=**गोपायित्वा, **अपक्रान्तः=**पलायितः, **किम् एतेन=**एतेन किमपि साध्यं नास्ति, **चक्रपरिवृत्तिम्=**भूमादावरुद्ध-चक्रनिःसारणे साहाय्यमिति भावः, **शूरः=**वीरः, **तपस्वी=**वराकः, **एकाकी=**असहायः, नेमिशब्दः = चक्राधारयन्त्रावयवविशेषस्य ध्वनिः, **त्वरते=**प्रियमिलनायोत्कण्ठितं भवतीति भावः, **पक्षद्वारकम्=**पक्षद्वारगमनाय मार्गमित्यर्थः, **विश्राम्य=**विश्रामं कुरु, अत्रैव तिष्ठेति भावः, **दक्षिणाक्षिस्पन्दम्=**सव्येतरनेत्रस्फुरणम्, स्त्रीणां दक्षिणाङ्ग-स्फुरणमनिष्टसूचकमिति शास्त्रादावुक्तम्, **अनिमित्तम्=**अपशकुनम्, **प्रमार्जयिष्यति=**विनाशयिष्यति, भारिकम् = भारवत्, ठकि प्रत्यये साधु—भारमस्ति अस्येत्यर्थः,

षष्ठोऽङ्कः ३७६

( नेपथ्ये )

अरे रे दोवारिआ ! अप्पमत्ता सएसु सएसु गुम्मट्ठाणेसु होध । एसो अज्ज गोवालदारओ गुत्तिं भञ्जिअ, गुत्तिवालं वावादिअ, बन्धणं भेदिअ, परिब्भट्टो अवक्कमदि । ता गेण्हध गेण्हध । ( अरे रे दौवारिकाः ! अप्रमत्ताः स्वकेषु स्वकेषु गुल्मस्थानेषु भवत । एषोद्य गोपालदारको गुप्तिं भङ्क्त्वा, गुप्तिपालकं व्यापाद्य, बन्धनं भित्त्वा, परिभ्रष्टोऽपक्रामति । तद्गृह्णीत गृह्णीत । )

(प्रविश्य अपटीक्षेपेण सम्भ्रान्त एकचरणलग्ननिगडोऽवगुण्ठित आर्यकः परिक्रामति ।)

चेटः—(स्वगतम् ।) महन्ते णअरीए सम्भमे उप्पण्णे, ता तुलिदं तुलिदं गमिश्शं । ( महान् नगर्यां सम्भ्रम उत्पन्नः, तत् त्वरितं त्वरितं गमिष्यामि । )

( इति निष्क्रान्तः । )

आर्यकः

हित्वाऽहं नरपतिबन्धनापदेश-
व्यापत्ति-व्यसन-महार्णवं महान्तम् ।
पादाग्र-स्थित-निगडैक-पाश-कर्षी
प्रभ्रष्टो गज इव बन्धनाद् भ्रमामि ॥ १ ॥

परिश्रान्तस्य = अत्यन्तश्रान्तस्य, प्रतिभासते = प्रतीयते, वस्तुतस्तथाऽभावेऽपि तथा प्रतीयते इति भावः, यातम्=युवां गच्छतम् ।।

शब्दार्थदौवारिकः = चौकीदार, गुल्मस्थानेषु = रक्षणीय स्थानों अर्थात् चौकियों पर, अप्रमत्ताः = सावधान, गुप्तिम्=कैदखाना, गुप्तिपालक=कैदखाने के रक्षक को, व्यापाद्य = मारकर, बन्धनम्=हथकड़ी, बेड़ी, परिभ्रष्टः=कारागार से निकला हुआ ।

अर्थ—अरे रे द्वारपालो ! अपने अपने गुल्मस्थानों ( सेना की चौकियों ) पर सावधान हो जाओ । आज वह अहीर का लड़का जेलखाना को तोड़कर रक्षक ( चौकीदार ) को मारकर बन्धन ( हथकड़ी-बेड़ी ) तोड़ कर निकला हुआ भागा जा रहा है । अतः उसे पकड़ो, पकड़ो ।

( पर्दा गिराये विना ही प्रवेश करके घबड़ाया हुआ, एक पैर में बेड़ीवाला, कपड़े से मुख ढके हुये आर्यक घूमता है । )

अर्थचेट--( अपने में ) नगरी में बहुत घबड़ाहट हो गई है, अतः अब जल्दी जल्दी चलता हूँ ।।

अन्वयः—महान्तम्, नरपतिबन्धनापदेशव्यापत्ति-व्यसन-महार्णवम्, हित्वा, पादाग्रस्थितनिगडैकपाशकर्षी, अहम्, बन्धनात्, प्रभ्रष्टः, गजः, इव, भ्रमामि ॥१॥

शब्दार्थमहान्तम्=बहुत विशाल, नरपतिबन्धनापदेशव्यापत्तिव्यसनमहा-र्णवम्=राजा की कैद के बहाने होनेवाली महती विपत्तिरूपी संकटरूपी समुद्र को, हित्वा-छोड़कर, पारकर, पादाग्रस्थितनिगडैकपाशकर्षी=पैर के अगले-नीचे भाग में बन्धी हुई बेड़ीरूप पाश = फन्दे को खींचने वाला, अहम्-मैं, गोपालदारक,

३८०मृच्छकटिकम्

भोः ! अहं खलु सिद्धादेश-जनित-परित्रासेन राज्ञा पालकेन घोषा- दानीय विशसने गूढागारे बन्धनेन बद्धः । तस्माच्च प्रियसहृच्छर्विलक- प्रसादेन बन्धनात् परिभ्रष्टोऽस्मि । ( अश्रूणि विसृज्य । )

बन्धनात्=जंजीर आदि बन्धन से, प्रभ्रष्टः=छूटे हुये, गजः=हाथी, इव=के समान, भ्रमामि=घूम रहा हूँ ॥ १ ॥

अर्थ— राजा की कैद के बहाने होनेवाली बहुत बड़ी आपित्तरूपी संकटरूपी समुद्र को पारकर एक पैर के नीचे की ओर लगी हुई बेड़ीरूप एक पाश (फन्दे) को खींचता हुआ मैं, बन्धन से छूटे हुये हाथी के समान घूम रहा हूँ ॥ १ ॥

टीका — सिद्धादेशभीतेन राज्ञा पालकेन कारागारे बद्धः गोपालदारकः आर्यकः कथञ्चित् कारागारबन्धनात् मुक्तः आत्मनो गजमुल्यतां प्रतिपादयति—हित्वेति । महान्तम्=अतिविशालम्, दुस्तरमित्यर्थः, नरपतिना=राज्ञा पालकेन; बन्धनम्=कारागारे निग्रहः, तदेव अपदेशः=व्याजः, यद् वा नरपतिबन्धनम् अपदेशः यस्याः सा नरपतिबन्धनापदेशा या व्यापत्तिः=महाविपत्तिः, तद्रूपं तत्सम्बन्धि यद् व्यसनम्, तदेव महार्णवः=महासमुद्रः, तम्, हित्वा=त्यक्त्वा, समुत्तीर्य, पादाग्रे=एकपादस्याधोभागे, स्थितः=विद्यमानः, यो निगडः=बन्धनशृङ्खला; 'बेड़ी' इति भाषायाम्, स एव एकपाशः, तं कर्षति=धारयति, तथोक्तः, अहम्=गोपालदारक आर्यकः, बन्धनात्=शृंखलादितः, प्रभ्रष्टः=प्रमुक्तः, गजः=हस्ती, इव=यथा, भ्रमामि=इतस्ततो विचरामि । उपमालंकारः, प्रहर्षिणी वृत्तम् ॥ १ ॥

विमर्श— किसी सिद्ध पुरुष ने यह भविष्यवाणी की थी कि गोपालपुत्र आर्यक राजा बनेगा । वह सुन कर तत्कालीन राजा पालक घबड़ा गया । उसने आर्यक को बिना अपराध ही जेल में बन्द करवा दिया था । वह शर्विलक के सहयोग से किसी प्रकार जेल से निकलकर बाहर आ गया । वह अपनी अवस्था बन्धन से छूटे हुये हाथी के समान बता रहा है ।

बन्धन के बहाने —यहाँ अपह्नुति, संकटरूपी महार्णव में रूपक और गज इव में उपमा है, सभी का संकर है, प्रहर्षिणी छन्द है ॥ १ ॥

शब्दार्थ — सिद्धादेशजनितपरित्रासेन=सिद्ध महापुरुष की भविष्यवाणी से भयभीत, घोषात्-अहीरों की बस्ती से, विशसने=मृत्युतुल्य कष्टकारक, परिभ्रष्टः=प्रमुक्त हो गया ।

अर्थ — अरे ! सिद्ध महात्मा द्वारा की गई भविष्यवाणी से भयभीत राजा पालक द्वारा अहीरों की बस्ती से लाकर मृत्युकारक गूढ़ कारागार में बन्धनों ( हथकड़ी और बेड़ियों ) से बांध दिया गया था । उस कारागार के बन्धन से प्रिय मित्र शर्विलक की कृपा से मुक्त हो गया हूँ । ( आंसू गिराकर )

षष्ठोऽङ्कः ३८१

भाग्यानि मे यदि तदा मम कोऽपराधो यद्वन्यनाग इव संयमितोऽस्मि तेन । दैवी च सिद्धिरपि लङ्घयितुं न शक्या गम्यो नृपो बलवता सह को विरोधः ? ॥ २ ॥

टीका—सिद्धस्य=सिद्धिसम्पन्नस्य महापुरुषस्य, आदेशेन=कथनेन, घोषणया, जनितः=उत्पन्नः, परित्रासः=स्वराज्यहानिरूपं भयं यस्य तादृशेन, पालकेन=एतन्नामकेन, घोषात्=आभीरपल्लीतः, विशसने=मृत्युतुल्यकष्टकारके, गूढ़ागारे=गुप्ते कठिने च कारागारे, तस्मात्=गूढ़ागारात्, बन्धनात्=हस्तपादसंलग्न-लोहादि-बन्धनात्, परिभ्रष्टः=प्रमुक्तः ।

अन्वयः—यदि, मे, भाग्यानि, तदा, मम, कः, अपराधः, यत्, तेन, वन्यनागः, इव, संयमितः, अस्मि, दैवी, च, सिद्धिः, अपि, लङ्घयितुम्, न, शक्या, [तथापि], नृपः, गम्यः, बलवता, सह, कः, विरोधः ? ॥ २ ॥

शब्दार्थ—यदि=यदि, मे=मुझ आर्यक के, भाग्यानि=( राजा बनने के ) भाग्य हैं, तदा=तब, मम=मेरा, कः=कौन सा, अपराधः=गलती, है, यत्=जिसके कारण, तेन=इस राजा पालक ने, वन्यनागः इव=जंगली हाथी के समान, संयमितः=बांध दिया गया, अस्मि=हूँ, दैवी=भाग्य से होने वाली, सिद्धिः=राज्यादि की प्राप्ति, अपि=भी, लंघयितुम्=टाली जाने के लिये, न=नहीं, शक्या=योग्य, है, [ तथापि=फिर भी ] नृपः=राजा, गम्यः=सभी के द्वारा सेवा करने योग्य होता है, बलवता=बलशाली के साथ, कः=कौन, विरोधः=झगड़ा ? ॥ २ ॥

अर्थ—यदि [ राज्यप्राप्ति करना ] मेरे भाग्य हैं तो इसमें मेरा क्या अपराध है जिसके कारण उस राजा पालक ने मुझे जंगली हाथी के समान बन्धन में डलवा दिया था । भाग्य से होने वाली सिद्धि ( राज्यादिप्राप्ति ) टाली नहीं जा सकती । ( यह सच है फिर भी ) राजा ( सभी के लिये ) सेवा करने योग्य है, ( क्योंकि ) बलवान् के साथ क्या विरोध ? [ भाग्य में यदि राज्यप्राप्ति है तो वह अवश्य होगी अतः राजा के साथ मेरे विरोध का औचित्य नहीं है । ] ॥२॥

टीका - भाग्यवशात् राज्यप्राप्तिनिश्चये सति राज्ञा विरोधो न करणीय इति प्रतिपादयति—यदीति । यदि=चेत्, मे=मम आर्यकस्य, भाग्यानि=राज्यादिसुखभोगादीनि पूर्वतः निश्चितानि, अवश्यप्राप्तव्यानि, तदा=तर्हि, मम=मे; कः=कीदृशः, अपराधः=दोषः ? अत्र विषये अहं कथमपि न दोषीति भावः । यत्=यस्मात्, तेन=पालकेन राज्ञा, वन्यः=वने भवः, नागः=गजः, आरण्यो हस्ती, इव; संयमितः=बद्धः, अस्मि, दैवी=देवाद् आगता; सिद्धिः=राज्यादिप्राप्तिः, अपि, लंघयितुम्=वारयितुम्, न=नैव, शक्या=योग्या, मम भाग्ये यल्लिखितं तदवश्यमेव,

३८२ | मृच्छकटिकम्

तत् कुत्र गच्छामि मन्दभाग्यः ? (विलोक्य) इदं कस्यापि साधोरनावृतपक्षद्वारं गेहम्।

इदं गृहं भिन्नमदत्तदण्डो विशीर्णसन्धिश्च महाकपाटः।
ध्रुवं कुटुम्बी व्यसनाभिभूतां दशां प्रपन्नो मम तुल्यभाग्यः ॥ ३ ॥

प्राप्स्यतीति ज्ञात्वा न केनापि तद् वारयितुं शक्यते । तथापि=पूर्वस्थितौ सत्यामपि, नृपः=राजा, गम्यः=सर्वैः सेव्यः, भवतीति शेषः, यतो हि, बलवता=बलशालिना लोकेन सह, कः=कीदृशः, विरोधः=वैरम्, निर्बलस्येति शेषः । एवञ्च नाहं तेन सह शत्रुतामिच्छामीति तस्य भावः । अत्रोपमार्थान्तरन्यासावलंकारौ, वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ २ ॥

विमर्श—आर्यक भाग्य की महिमा बताते हुये राजा पालक की आलोचना करता हुआ भी उससे वैर करने के पक्ष में नहीं है। इस श्लोक में उपमा और अर्थान्तरन्यास अलंकार हैं। वसन्ततिलका छन्द है ॥ २ ॥

शब्दार्थ—मन्दभाग्यः=अभागा, साधोः=सज्जन पुरुष का, अनावृतपक्षद्वारम्=खुले हुये बगल के दरवाजा वाला, गेहम्=घर ।

अर्थ—तो अब अभागा मैं कहाँ जाऊ ? (देखकर) यह किसी सज्जन पुरुष का घर है जिसका बगलवाला दरवाजा खुला हुआ है ।

टीका—मन्दभाग्यः=मन्दं भाग्यं यस्य सः, भाग्यहीन इत्यर्थः, साधोः=सज्जनस्य, पक्षस्य=पार्श्वस्य, द्वारम्=पक्षद्वारम्, अनावृतम्=उद्घाटितं पक्षद्वारं यस्य तत् गेहम्=गृहम् ।

अन्वयः—इदम्, गृहम्, भिन्नम्, अदत्तदण्डः, विशीर्णसन्धिः, महाकपाटः, च, अस्ति, (एतेन प्रतीयते यत्) मम, तुल्यभाग्यः, कुटुम्बी, ध्रुवम्, व्यसनाभिभूताम्, दशाम्, प्रपन्नः, [अस्ति] ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—इदम्=यह, सामने दिखाई देनेवाला, गृहम्=घर, भिन्नम्=टूटा फूटा हुआ, च=और, अदत्तदण्डः=ब्योड़ा से शून्य, विशीर्णसन्धिः=खुले हुये जोड़ोंवाला, महाकपाटः=विशाल किवाड़ है, [अतः इससे, प्रतीयते=प्रतीत होता है, यत्=कि], मम=मेरे, तुल्यभाग्यः=समान भाग्यवाला, अभागा, कुटुम्बी=परिवारवाला, ध्रुवम्=निश्चित ही, व्यसनाभिभूताम् = परेशानियों से युक्त, दशाम्=दुर्दशा को, प्रपन्नः=प्राप्त हो चुका है ॥ ३ ॥

अर्थ—यह घर टूटा फूटा है। बिना ब्योड़ावाला, ढीले हुये जोड़ोंवाला विशाल किवाड़ है। [इससे यह प्रतीत होता है कि] मेरे समान भाग्यवाला अर्थात् अभागा यह परिवारवाला निश्चित ही दुःखों से युक्त दुर्दशा को प्राप्त हो चुका है ॥ ३ ॥

षष्ठोऽङ्कः

३८३

तदत्र तावत् प्रविश्य तिष्ठामि ।
( नेपथ्ये )
जाध गोणा ! जाध । ( यातं गावो ! यातम् । )
आर्यकः—( आकर्ण्य ) अये ! प्रवहणमित एवाभिवर्त्तते ।

भवेद् गोष्ठीयानं न च विषमशीलैरधिगतं
वधूसंयानं वा तदभिगमनोपस्थितमिदम् ।
बहिर्नेतव्यं वा प्रवह्र-जन-योग्यं विधिवशाद्
विविक्तत्वाच्छून्यं मम खलु भवेद्दैवविहितम् ॥ ४ ॥


इसलिये इसमें घुसकर ( छिपकर ) बैठता हूँ ॥ ३ ॥

टीका—सम्मुखस्थं जीर्णं शीर्णं गृहं विलोक्य तत्स्वामिनोऽपि स्वतुल्यां दुर्दशां प्रतिपादयति —इदमिति । इदम् = पुरोदृश्यमानम्, गृहम्=भवनम्, भिन्नम्=अनेक-भागेषु विदीर्णम्, अस्ति, च=तथा, अदत्तदण्डः=अदत्तः दण्डः=पृष्ठभागे अवरोधाय काष्ठविशेषः, अर्गला वा यस्य तादृशः, विशीर्णसन्धिः=विशीर्णः=विश्रृंखलितः सन्धिः = काष्ठखण्डानां संयोजनस्थानानि यस्य सः, एतद् द्वयमपि महाकपाटस्य विशेषणम्, महाकपाटः=विशालकपाटः, अस्ति, [ एतेन इदं प्रतीयते=ज्ञायते यत् ] मम=आर्यकस्य, तुल्यभाग्यः=सदृशं भाग्यं यस्य तादृशः, भाग्यहीन इत्यर्थः, कुटुम्बी=गृहाधिपतिः, ध्रुवम्=निश्चितरूपेण, व्यसनाभिभूताम्=विपत्तिसमाक्रान्ताम्, दशाम्=दुरवस्थाम्, प्रपन्नः=प्राप्तः, एवञ्चायमपि मत्सदृश एव वर्तते । अतोऽयं मां रक्षिष्यतीति भावः । अत्रोपमालंकारः, उपेन्द्रवज्रा च वृत्तम् ॥ ३ ॥

विमर्शः—यहाँ 'अदत्तदण्डः' और 'विशीर्णसन्धिः' ये दोनों महाकपाट के विशेषण हैं। किवाड़ों के पीछे की ओर सुरक्षा के लिये एक लकड़ी लगाई जाती है, जिसे 'व्योड़ा' कहा जाता है, वह बन्द दरवाजे में ही लगता है। सांकड़ के स्थान पर भी इसका प्रयोग होता है। यह यहाँ नहीं लगा है क्योंकि दरवाजा खुला है। लकड़ियों के जोड़ ढीले होने से उस किवाड़ में कई काष्ठखण्ड लगे हुये प्रतीत होते हैं। विशाल भवन और विशाल दरवाजा देखकर मकान-मालिक की बीती हुई सम्पन्नता का अनुमान होता है। यहाँ उपमा अलंकार और उपेन्द्रवज्रा छन्द है ॥ ३ ॥

( नेपथ्य में )

अर्थ—चलो बैलों, चलो ।

अन्वयः—इदम्, विषमशीलैः, अधिगतम्, गोष्ठीयानम्, न, च, भवेत्, वा, वधूसंयानम्, तदभिगमनोपस्थितम्, [ भवेत् ], अथवा, प्रवरजनयोग्यम्, बहिः, नेतव्यम्, [ भवेत् ], विधिवशात्, विविक्तत्वात्, शून्यम्, मम, खलु, दैवविहितम्, भवेत् ॥ ४ ॥

३८४मृच्छकटिकम्

( ततः प्रवहणेन सह प्रविश्य । )

शब्दार्थ-—इदम्=यह सामने आती हुई, विषमशीलैः=बुरे लोगों द्वारा, अधिगतम्=युक्त, बैठी हुयी, गोष्ठीयानम्=उत्सव या सभा आदि में जानेवाली गाड़ी, न च = न, भवेत्=हो, वा=अथवा, वधूसंयानम् = बहू को ले जानेवाली गाड़ी, तदभिगमनोपस्थितम्=उसे ले जाने के लिये आयी हुई, हो, वा=अथवा, प्रवरजनयोग्यम्=श्रेष्ठ लोगों के योग्य, बहिः=बाहर, नेतव्यम्=ले जाने योग्य, [ न भवेत्= न हो ] अथवा, विधिवशात् = भाग्यवश, विविक्तत्वात्=खाली होने से, मम=मेरे लिये, खलु=निश्चित रूप से, दैवविहितम्=विधि द्वारा भेजी हुई, भवेत्=हो ।।४।।

अर्थ—आर्यक— ( सुनकर ) यह गाड़ी इधर ही आ रही है—

यह बुरे लोगों द्वारा चढ़ी गई किसी उत्सवादि में जानेवाली गाड़ी न हो, अथवा बहू की गाड़ी उसे ले जाने के लिये आई हुई न हो, अथवा श्रेष्ठ व्यक्तियों के योग्य बाहर ले जानेवाली हो, अथवा भाग्यवश और किसी के न होने के कारण शून्य यह निश्चित ही परिजनादिरहित मेरे भाग्य से आई हुई हो ।। ४ ।।

टीका-—पुरोदृश्यमानं यानं विलोक्य विविधं संकल्पयति आर्यकः—भवेदिति । इदम्=पुरोविद्यमानम्, विषमम्=अनुचितं, शीलम्=स्वभावो येषां तादृशैः, दुर्जनैरित्यर्थः, अधिगतम् = आरूढम्, गोष्ठीयानम्=सभोत्सवादिवाहनम्, न च, भवेत्, सम्भावनायां लिङ्, वा=अथवा, वधूसंयानम्=वध्वाः पतिगृहादौ नयनाय वाहनम्, तस्या अभिगमनायोपस्थितम् भवेत्, अथवा, प्रवराणाम्=श्रेष्ठानां जनानां योग्यम्=अनुरूपम्, बहिः नेतव्यम्=बाह्यप्रदेशे नेतुं योग्यम्, भवेत्, विधिवशात्=भाग्यवशात्, विक्तित्वात्=परिजनादिरहितत्वात्, शून्यम्=रिक्तम्, आरोहणयोग्यमिति भावः, मम=आर्यकस्य, खलु=निश्चयेन, दैवविहितम्=विधिप्रेषितम्, भवेत् । अत्र सन्देहालंकार इति केचित् । शिखरिणी वृत्तम् ।। ४ ।।

**विमर्श—**सामने आती हुई गाड़ी को देखकर आर्यक अनेक संकल्प-विकल्प करता हुआ अपने लिये ही आयी हुई समझने लगता है । गोष्ठीयानम्=गोष्ठी में ले जानेवाली गाड़ी । विविक्तत्वात् शून्यम् = परिजन आदि किसी के न होने से खाली है; अतः मेरे बैठने योग्य है । यहाँ अनेक विकल्प होने से सन्देह नामक अलंकार है । शिखरिणी छन्द है ।। ४ ।।

शब्दार्थ-—अवस्थितम् = सामने खड़ी है, गणिकाप्रवहणम्=वेश्या की गाड़ी, बहिर्यानम्=बाहर जानेवाली, अधिरोहामि=चढ़ता हूँ, नस्यकटुकौ=नाक में नांथ=रस्सी पड़ी होने से तेज भागनेवाले, पादोत्फालचालितानाम्=पैरों को ऊपर उठाने के लिये चलाये = हिलाये गये, विश्रान्तः = बन्द हो गया, भाराक्रान्तम् = बोझा से भरी हुई ।

( इसके बाद प्रवहण=गाड़ी के साथ प्रवेश करके )

षष्ठोऽङ्कः ३८५

वर्द्धमानकश्चेटः—हीणामहे ! आणीदे मए जाणत्थलके । रदणिए ! णिवेदेहि अज्जआए वशन्तशेणाए 'अवत्थिदे शज्जे पवहणे अहिलुहिअ पुप्फकलण्डअं जिण्णुज्जाणं गच्छदु अज्जआ।' ( आश्चर्यम् ! आनीतं मया यानास्तरणम् । रदनिके ! निवेदय आर्यायै वसन्तसेनायै 'अवस्थितं सज्जं प्रवहणम्, अधिरुह्य पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं गच्छतु आर्या ।' )

आर्यकः—( आकर्ण्य । ) गणिकाप्रवहणमिदं बहिर्यानिञ्च । भवतु, अधिरोहामि । ( इति स्वैरमुपसर्पति । )

चेटः—( श्रुत्वा ) कथं णेउलशद्दे ? ता आअदा क्खु अज्जआ । अज्जए ! इमे णश्श-कडुआ वइल्ला, ता पिट्ठदो ज्जेव आलुहदु अज्जआ । ( कथं नूपुरशब्दः ? तदागता खलु आर्या । आर्ये ! इमौ नस्यकटुकौ बलीवर्दौ; तत् पृष्ठत एवारोहतु आर्या । )

( आर्यकस्तथा करोति )

चेटः—पादुप्फाल-चालिदाणं णेउलाणं वीशन्तो शद्दो, भलक्कन्ते अ पवहणे; तधा तक्केमि शम्पदं अज्जआए आलुढाए होदव्वं; ता गच्छामि । जाध गोणा ! जाध । ( पादोत्फालचालितानां नूपुराणां विश्रान्तः शब्दः । भाराक्रान्तं च प्रवहणम्, तथा तर्कयामि, साम्प्रतमार्यया आरूढया भवितव्यम्, तद्गच्छामि । यातं गावौ यातम् । ) ( इति परिक्रामति । )


अर्थवर्धमानक चेट—आश्चर्य है ! मैं गाड़ी का बिछावन ले आया हूँ । रदनिके ! वसन्तसेना से यह निवेदन कर दो—'सजी हुई गाड़ी तैयार खड़ी है उस पर चढ़कर आर्या पुष्पकरण्डक नामक जीर्णोद्यान के लिये प्रस्थान करें ।'

आर्यक—( सुनकर ) यह गणिका की गाड़ी है और बाहर जानेवाली है । अच्छा, चढ़ता हूँ । ( यह कहकर धीरे-धीरे पास जाता है । )

चेट—( सुनकर ) क्या नूपुरों की आवाज है ? इसलिये लगता है कि आर्या आ गईं । आर्ये ! नाक में नाथ (रस्सी) पड़ी होने से अधिक तेज भागनेवाले ये बैल हैं । इसलिये आप पीछे की ओर से ही गाड़ी पर चढ़िये ।

( आर्यक वैसा ही करता है अर्थात् पीछे से चढ़ता है । )

चेट—पैर ऊपर उठाने से हिले हुये नूपुरों की आवाज शान्त हो गई है । और गाड़ी बोझ से भर गई है, इसलिये यह अनुमान करता हूँ कि आर्या चढ़ चुकी होंगी, अतः अब चलूं । चलो, बैलों ! चलो । ( यह कहकर घूमता है । )

टीकापृष्ठतः=पृष्ठभागादेव, पादयोः = चरणयोः, उत्फालनेन=आरोहणा-वसरे उन्नयनेन चालितानाम् = सञ्चालितानाम्, प्रकम्पितानाम्, शब्दः = ध्वनिः,

२५ मृ०

३८६ | मृच्छकटिकम्

( प्रविश्य )

वीरकः--अरे रे अरे ! जय-जयमाण-चन्दनअ-मङ्गलफुल्ल-भद्दप्पमुहा !
( अरे रे अरे ! जय-जयमान-चन्दनक-मङ्गल-पुष्पभद्र-प्रमुखाः ! )

किं अच्छध वीसद्धा जो सो गोवालदारओ रुद्धो ।
भेत्तूण समं वच्चइ णरवइ-हिअअं बन्धणं अ ॥ ५ ॥
( किं स्थ विश्रब्धाः, यः स गोपालदारको रुद्धः ।
भित्वा समं व्रजति नरपतिहृदयं बन्धनञ्च ॥ ५ ॥ )

**विश्रान्तः=**शान्तिमुपगतः, **भारेण आक्रान्तम्=**व्याप्तम्, **आरूढया=**आरुह्य स्थितया, **यातम्=**चलंतम् ।

**अन्वयः--**विश्रब्धाः, किम्, स्थ, यः, गोपालदारकः, अवरुद्धः, सः, नरपति-हृदयम्, बन्धनम्, च, समम्, भित्वा, व्रजति ॥ ५ ॥

**शब्दार्थ--**विश्रब्धाः = निश्चिन्त होकर, किम्=क्यों, स्थ=बैठे हो, यः=जो, गोपालदारकः=अहीर का लड़का आर्यक, अवरुद्धः=कारागार में बन्दी किया गया था, सः = वह, नरपतिहृदयम् = राजा के हृदय को, च=और, बन्धनम्=बन्धन, हथकड़ी बेड़ी को, समम्=एक साथ, भित्वा=तोड़कर, व्रजति=भाग रहा है, भाग गया है ॥ ५ ॥

( प्रवेश करके )

अर्थ—वीरक— अरे रे अरे ! जय, जयमान, चन्दनक, मंगल और पुष्पभद्र आदि प्रधान रक्षकों !

तुम लोग निश्चिन्त होकर क्यों बैठे हुये हो, अहीर का जो लड़का ( आर्यक ) जेलमें बन्द किया गया था वह राजा ( पालक ) के हृदय को और बन्धन को एक साथ तोड़कर जा रहा है, भाग गया है ॥ ५ ॥

टीका—आर्यकस्य पलायनं सूचयति—किमिति । अरे रे इत्यादिगद्यस्थेना-न्वयः । **विश्रब्धाः=**विश्वस्ताः, निश्चिन्ता इति भावः, **किम्=**कथम्, **स्थ=**तिष्ठथ, **यः, गोपालस्य दारकः=**पुत्रकः आर्यकनामा, **रुद्धः=**कारागारेऽवरुद्धः, **सः, नरपतेः=**पाल-कस्य, **हृदयम्=**चित्तम्, जीवनमिति भावः, **बन्धनम्=**शृंखलादिकम्, **च, समम्=**सहैव, **भित्त्वा=**विदार्य, **व्रजति=**इतः पलाप्य गच्छतीत्यर्थः । सहोक्तिरलंकारः आर्या वृत्तम् ॥ ५ ॥

विमर्श—वीरक का आशय यह है कि वह गोपाल बन्धन तोड़कर ही नहीं अपितु राजा पालक का दिल भी तोड़कर भागा है क्योंकि उसके भाग जाने से राजा को भविष्यवाणी के अनुसार अपने राज्य की हानि की शंका बढ़ जाती है । यहाँ सहोक्ति अलंकार है, आर्या छन्द है ॥ ५ ॥

शब्दार्थ — पुरस्तात्=पूरब की ओर, प्रतोलीद्वारे=गली के मुहाने, प्राकारखण्डः=चहारदीवारी का हिस्सा, अधिरुह्य=चढ़कर ।

षष्ठोऽङ्कः ३८७.

अले पुरत्थिमे पदोली-दुआरे चिट्ठ तुमं। तुमं पि पच्छिमे, तुमं पि दक्खिणे, तुमं पि उत्तरे। जो वि एसो पांआरखण्डो, एदं अधिरुहिअ चन्दणेण समं गदुअ अवलोएमि। एहि चन्दणअ ! एहि, इदो दाव। ( अरे ! पुरस्तात् प्रतोलीद्वारे तिष्ठ त्वं, त्वमपि पश्चिमे, त्वमपि दक्षिणे, त्वमपि उत्तरे। योऽपि एष प्रकारखण्डः, एतमधिरुह्य चन्दनेन समं गत्वा अवलोकयामि। एहि चन्दनक ! एहि, इतस्तावत् । )

( प्रविश्य सम्भ्रान्तः )

चन्दनकः— अरे रे वीरअ-विसल्ल-भीमङ्गअ-दण्डकालअ-दण्डसूर-प्पमुहा ! ( अरे रे वीरक-विशल्य-भीमाङ्गद-दण्डकाल-दण्ड-शूरप्रमुखाः ! )

आअच्छध वीसतथा तुरिअं जत्तेह लहु करेज्जाह ।
लच्छी जेण ण रण्णो पहवइ गोत्तांतरं गंतुं ॥ ६ ॥
( आगच्छत विश्वस्तास्त्वरितं यतध्वं लघु कुरुत ।
लक्ष्मीर्येन न राज्ञः प्रभवति गोत्रान्तरं गन्तुम् ॥ ६ ॥ )


अर्थ— अरे ! पूरब की ओर गली के मुहाने पर तुम बैठो, तुम पश्चिम की ओर, तुम दक्षिण की ओर, तुम उत्तर की ओर । जो यह चहारदीवार का हिस्सा है, इस पर चढ़ कर चन्दनक के साथ मैं देखता हूँ । आओ चन्दनक ! आओ इधर आओ ।

अन्वयः— हे विश्वस्ताः ! आगच्छत, त्वरितम्, यतध्वम्, लघु, कुरुत, येन, राज्ञः, लक्ष्मीः, गोत्रान्तरम्, गन्तुम्, न, प्रभवति ॥ ६ ॥

शब्दार्थ— हे विश्वस्ताः = विश्वास रखनेवाले लोगों, आगच्छत = आओ, त्वरितम्=शीघ्र ही, यतध्वम्=प्रयास करो, लघु=शीघ्र ही, कुरुत=आवश्यक काम करो, येन=जिससे, राज्ञः=राजा पालक की, लक्ष्मीः=राज्यलक्ष्मी, गोत्रान्तरम्=किसी दूसरे वंश के पास, गन्तुम् = जाने के लिये, न = नहीं, प्रभवति = समर्थ हो सके ॥ ६ ॥

( घबड़ाया हुआ प्रवेश करके )

अर्थ—चन्दनक— अरे ! वीरक, विशल्य, भीम, अंगद, दण्डकाल, दण्डशूर आदि प्रधान रक्षकों !

विश्वस्त लोगों आओ, शीघ्र ही प्रयास करो, जल्दी ( अपेक्षित ) कार्य करो, जिससे राजा पालक की राज्यलक्ष्मी दूसरे कुल [ में उत्पन्न व्यक्ति ] के पास न जा सके ॥ ६ ॥

टीका— आर्यकग्रहणार्थं ये विश्वासयुक्ताः ते त्वरितमागत्य यथोचितं कुर्युरिति सूचयितुमाह--आगच्छतेति । विश्वस्ताः = आर्यकं ग्रहीष्यामीति विश्वासवन्तः,

३८८ | मृच्छकटिकम्

अवि अ (अपि च)

उज्जाणेसु सभासु अ मग्गे णअरीअ आवणे घोसे । तं तं जोहह तुरिअं संका वा जाएए जत्थ ॥ ७ ॥ ( उद्यानेषु सभासु च मार्गे नगर्यामापणे घोषे । तं तमन्वेषयत त्वरितं शङ्का वा जायते यत्र ॥ ७ ॥ )

रे रे वीरअ ! किं किं दरिसेसि भणाहि दाव वीसद्धं । भेत्तूण अ बन्धणअं को सो गोवालदारअं हरइ ॥ ८ ॥ ( रे रे वीरक ! किं किं दर्शयसि भणसि तावद्विश्रब्धम् । भित्त्वा, च बन्धनकं कः स गोपालदारकं हरति ॥ ८ ॥ )


यद्वा मयि विश्वासवन्तः, जनाः, आगच्छत=आयात, त्वरितम्=सत्वरम्, यतध्वम्=तद्ग्रहणाय प्रयत्नं कुरुध्वम्, लघु=शीघ्रमेव, कुरुध्वम्=अपेक्षितं कार्यं सम्पादयत, येन=येन हेतुना, राज्ञः=नृपस्य पालकस्य, राज्यलक्ष्मीः=राज्यश्रीः, गोत्रान्तरम्=पालकाद्भिन्नस्य आर्यकस्य समीपम्, गन्तुम्=व्रजितुम्, न=नैव, प्रभवति=समर्था भवेत् । गाथा वृत्तम् ॥ ६ ॥

**अन्वयः—**उद्यानेषु, सभासु, मार्गे, नगर्याम्, आपने, घोषे, च, यत्र, वा, शङ्का जायते, तम्, तम्, त्वरितम्, अन्वेषयत ॥ ७ ॥

**शब्दार्थ—**उद्यानेषु=बगीचों में, सभासु=सभाओं में, मार्गे=रास्ते में, नगर्याम्=नगरी में, आपने=बाजार में, च=और, घोषे=अहीरों की बस्ती में, वा=अथवा, यत्र यत्र=जहाँ जहाँ, शंका=सन्देह, जायते=उत्पन्न होता हो, तम् तम्=उस उसको, त्वरितम्=शीघ्र ही, अन्वेषयत=खोजो ॥ ७ ॥

**अर्थ—**बगीचों में, सभाओं में, रास्ते में, नगर में, बाजार में और बस्ती में अथवा जहाँ जहाँ सन्देह हो जाय उस उसको शीघ्र ही खोजो ॥ ७ ॥

**टीका—**रक्षकान् अन्वेषणीयस्थानानि सूचयति-उद्यानेष्विति । उद्यानेषु=आक्रीडेषु, सभासु=उत्सवादिस्यथलेषु, मार्गे=पथि, नगर्याम्=नगरमध्ये, आपने=हट्टे, च=तथा, घोषे=आभीरपल्ल्याम्, वा=अथवा, यत्र यत्र==यस्मिन् यस्मिन् स्थाने, शङ्का=आर्यकसद्भावसन्देहः, जायते=उत्पद्यते, तम् तम्=स्थानविशेषम्, त्वरितम्=शीघ्रमेव, अन्वेषयत=गवेषयत । आर्या वृत्तम् ॥ ७ ॥

**विमर्श—**यहाँ सभा शब्द से वे सभी स्थान लेने चाहिये जहाँ कई लोग एकत्रित होकर बैठे हों । 'नगरी' इससे नगर का घनी आबादीवाला क्षेत्र लेना चाहिये । यहाँ आर्या अथवा गाथा छन्द है ॥ ७ ॥

**अन्वय—**रे रे वीरक ! किम्, किम्, दर्शयसि, विश्रब्धम्, तावत्, भणसि, बन्धनकम्, भित्त्वा, सः, कः, गोपालदारकम्, हरति ? ॥ ८ ॥

षष्ठोऽङ्कः ३८६

( युग्मकम् )

कस्सट्ठमो दिणअरो कस्स चउत्थो अ बट्टाए चन्दो ।
छट्ठो अ भग्गवगहो भूमिसुओ पंचमो कस्स ॥ ६ ॥
( कस्याष्टमो दिनकरः कस्य चतुर्थश्च वर्तते चन्द्रः ।
षष्ठश्च भार्गवग्रहो भूमिसुतः पञ्चमः कस्य ॥ ६ ॥ )


शब्दार्थरे रे वीरक ! = अरे वीरक !, किम् किम् = क्या क्या, दर्शयसि = दिखा रहे हो, दूसरों को देखने के लिये कह रहे हो, विश्रब्धम् = विश्वस्त होते हुये, तावत् = निश्चय रूप से, भणसि = कह रहे हो, बन्धनकम् = हथकड़ी और बेड़ीको, भित्त्वा = तोड़कर, सः = वह, कः = कौन, गोपालदारकम् = अहीर के बच्चे को, आर्यकं को, हरति = लेकर भाग रहा है ? ॥ ८ ॥

अर्थ—अरे अरे वीरक ! क्या क्या दिखला रहे हो ? ( देखने के लिये कह रहे हो ? ) विश्वास के साथ क्या कह रहे हो, बन्धन तोड़कर वह कौन गोपाल के बेटे आर्यक को लेकर भाग रहा है ॥ ८ ॥

टीकाचन्दनकः गोपालदारकहरणे आश्चर्यं व्यक्तिरे रे इति । रे रे वीरक ! = अरे अरे वीरक ! सेनाप्रमुख !, किम् किम् = स्थानविशेषम्, दर्शयसि = अवलोकनाय निर्दिशसि; विश्रब्धम् = विश्वासपूर्वकम्, तावत् = वाक्यालंकारे, आश्चर्यं वा, भणसि = कथयसि, बन्धनकम् = कारागृहसम्बन्धिबन्धनसमूहम्, भित्त्वा = विदार्य, सः, कः = किन्नामा, गोपालदारकम् = आभीरपुत्रम् आर्यकमित्यर्थः हरति = रक्षिणः पराभूय बलपूर्वकम् नयति । आर्या गाथा वा वृत्तम् ॥ ८ ॥

विमर्शदर्शयसि—'यह देखने के लिये प्रेरित कर रहे हो'—इस भाव का सूचक है। विश्रब्धं भणसि तावत्—तुम क्या विश्वासपूर्वक ऐसा कह रहे हो। 'कः सः' किसमें इतनी शक्ति आ गई जो यह दुःसाहस कर रहा है ॥ ८ ॥

अन्वयकस्य, अष्टमः, दिनकरः, कस्य, चतुर्थः, चन्द्रः, कस्य, षष्ठः, भार्गवग्रहः, कस्य, च, पञ्चमः, भूमिसुतः, वर्तते ॥ ६ ॥

शब्दार्थकस्य = किसका, अष्टमः = आठवां, दिनकरः = सूर्य (है), कस्य = किसका, चतुर्थः = चौथा, चन्द्रः = चन्द्रमा ( है ), कस्य = किसका, षष्ठः = छठा, भार्गवग्रहः = शुक्र (है), = और, पञ्चमः = पांचवां, भूमिसुतः = मंगल, वर्तते = है ॥९॥

अर्थ—किसका आठवाँ सूर्य है ? किसका चौथा चन्द्रमा है ? किसका छठा शुक्र है ? और किसका पाँचवाँ मंगल है। अर्थात् इन स्थानों में उक्त ग्रह किसके जन्मपत्र में हैं ? ॥ ९ ॥

टीकाआर्यकस्यापहारकस्य मृत्युयोगमाहकस्येति । कस्य = जनस्य, अष्टमः = अष्टमस्थानीयः, दिनकरः = सूर्यः, कस्य = जनस्य, चतुर्थः = चतुर्थस्थानीयः, चन्द्रः = निशाकरः, कस्य = जनस्य, भार्गवग्रहः = शुक्रः, षष्ठः = षष्ठस्थानीयः, च = तथा, कस्य =

३९० | मृच्छकटिकम्

भण कस्स जन्म-छट्ठो जीवो णवमो तहेअ सूरसुओ । जीवंते चंदणए को सो गोवालदारअं हरइ ॥ १० ॥ ( भण कस्य जन्मषष्ठो जीवो नवमस्तथैव सूरसुतः । जीवति चन्दनके कः स गोपालदारकं हरति ॥ १० ॥ )

वीरकः--भड चन्दणआ ! ( भट चन्दनक ! )

अवहरइ कोवि तुरिअं चंदणअ ! सवामि तुज्ज हिअएण । जह अद्धधुइद-दिणअरे गोवालअ-दारओ खुडिदो ॥ ११ ॥

जन्मस्य, पञ्चमः = पञ्चमस्थानीयः, भूमिसुतः = भौमः, वर्तते इति शेषः । एवञ्चै-तादृशग्रहयोगवतस्तस्य गोपालदारकापहारकस्य तस्य मृत्युर्ध्रुव इति भावः । आर्या वृत्तम् ॥ ६ ॥

विमर्श--यहाँ ज्योतिषशास्त्रानुसार मृत्युयोग का लक्षण बताया गया है । इसे और अग्रिम श्लोक को मिलाकर यह 'युग्मक' है ॥ ६ ॥

अन्वयः--भण, कस्य, जीवः, जन्मषष्ठः, तथा, सूरसुतः, नवमः, कः, सः, चन्दनके, जीवति, गोपालदारकम्, हरति ॥ १० ॥

शब्दार्थ--भण = बताओ, कस्य = किसके, जीवः=बृहस्पति, जन्मषष्ठः= जन्मराशि से या लग्न से छठें है, तथा, सूरसुतः=शनि, नवमः=नवें स्थान पर है, कः सः = वह कौन है, (जो), चन्दनके = चन्दनक के, जीवति=जीवित रहते, गोपालदारकम् = अहीर के बेटा आर्यक को, हरति = (कारागार से) ले जा रहा है ॥ १० ॥

अर्थ--बताओ, किसका बृहस्पति जन्मराशि (या लग्न) से छठे स्थान पर है और शनि नवम स्थान पर है ? वह कौन है जो (मुझ) चन्दनक के जीवित रहते गोपालपुत्र आर्यक को ले जा रहा है ? ॥ १० ॥

टीका--पुनरपि अपहारकस्य मृत्युयोगमेवाह-भणेति । भण=कथय, कस्य=जन्मस्य, जीवः = बृहस्पतिः, जन्मषष्ठः=जन्मराशेः लग्नात् वा षष्ठस्थानीयः, तथा, सूरसुतः=सूर्यपुत्रः शनिः, नवमः=नवमस्थानीयः, कः सः=किन्नामा सः, यः, चन्दनके=एतन्नामके मयि, जीवति = जीवनं धारयति सति, गोपालदारकम्=गोपालपुत्रम्, आर्यकमित्यर्थः, हरति=बन्धनान्मोचयित्वा, नयति, एवञ्च यस्यैतादृशाः मारणकारका ग्रहाः सञ्जाताः स एव तस्य अपहरणं करिष्यतीति भावः । गाथा वृत्तम् ॥ १० ॥

अन्वयः--हे चन्दनक !, तव, हृदयेन, शपे, कोऽपि, (आर्यकम्) त्वरितम्, अपहरति, यथा, अर्धोदितदिनकरे, गोपालदारकः, त्रुटितः ॥ ११ ॥

षष्ठोऽङ्कः ३९१

( अपहरति कोऽपि त्वरितं चन्दनक ! शपे तव हृदयेन ।
यथा अर्द्धोदितदिनकरे गोपालक-दारकः खुडितः ॥ ११ ॥ ),

चेटः—जाध गोणा ! जाध । ( यातं गावो ! यातम् । )
चन्दनकः—(दृष्ट्वा) अरे रे ! पेक्ख पेक्ख । ( अरे रे ! प्रेक्षस्व प्रेक्षस्व । )

ओहारिओ पवहणो वच्चइ मज्झेण राअमग्गस्स ।
एदं दाव विआरह, कस्स कहिं पवसिओ पवहणो त्ति ॥ १२ ॥
( अपवारितं प्रवहणं व्रजति मध्येन राजमार्गस्य ।
एत्ततावद्विचारय कस्य कुत्र प्रेषितं प्रवहणमिति ॥ १२ ॥ )

शब्दार्थ—हे चन्दनक=हे चन्दनक; तव=तुम्हारी, हृदयेन=हृदय से, शपे=शपथ खाता हूँ, कोऽपि = कोई ( आर्यकम्=गोपाल के पुत्र ), त्वरितम्=शीघ्र ही, अपहरति=लेकर भाग रहा है, यथा = जैसे कि, अर्द्धोदितदिनकरे=सूर्य के आधा निकलने पर, गोपालदारकः = गोपाल का पुत्र आर्यक, खुटितः = बन्धन तोड़कर भगाया गया ॥ ११ ॥

अर्थवीरक - वीर चन्दनक !
मैं तुम्हारे हृदय की शपथ खाता हूँ। हे चन्दनक ! कोई जल्दी से ( आर्यक को छुड़ा कर) लेकर जा रहा है। सूर्य के आधा निकलने पर वह गोपालपुत्र [किसी के द्वारा ] बन्धन तोड़कर भगाया जा रहा है ॥ ११ ॥

टीका—आर्यकस्य पलायनं सत्यमिति प्रतिपादयति —अपहरतीति । हे चन्दनक !, तव=त्वदीयेन, हृदयेन=चित्तेन, शपे=शपथं गृह्णामि, कोऽपि=अज्ञातनामा, आर्यकम्, त्वरितम्=शीघ्रमेव, अपहरति=बन्धनान्मोचयित्वा नयति, यथा=यतोहि, अर्द्धोदिते दिनकरे = सूर्ये, गोपालदारकः=गोपालपुत्रः, आर्यकः, खुटितः=बन्धनं विदार्य मोचित इति भावः। आर्या वृत्तम् ॥ ११ ॥

विमर्श—तव हृदयेन शपे=तुम्हारे हृदय से शपथ लेता हूँ -- यह अर्थ सामान्यतया प्रतीत होता है । परन्तु दूसरे के हृदय की शपथ दूसरा ले, यह व्यावहारिक नहीं प्रतीत होता है । अतः हृदयेन तव शपे=अपने हृदय से तुमको शपथ लेकर कहता हूँ—ऐसा भावार्थ करना चाहिये ॥ ११ ॥

अर्थचेट - चलो बैलों ! चलो ।
चन्दनक—अरे, अरे, देखो देखो—

अन्वयः—अपवारितम्, प्रवहणम्, राजमार्गस्य, मध्येन, व्रजति, तावत्, एतत्, विचारय, कस्य, प्रवहणम्, कुत्र, प्रेषितम्, इति ॥ १२ ॥

शब्दार्थ—अपवारितम्=वस्त्रादि से ढकी हुई, प्रवहणम्=गाड़ी, राजमार्गस्य=मुख्य मार्ग के, मध्येन=बीच से, व्रजति=जा रही है, तावत्=इसलिये, एतत्=यह,