मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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( ततः प्रवहणेन सह प्रविश्य । )
शब्दार्थ-—इदम्=यह सामने आती हुई, विषमशीलैः=बुरे लोगों द्वारा, अधिगतम्=युक्त, बैठी हुयी, गोष्ठीयानम्=उत्सव या सभा आदि में जानेवाली गाड़ी, न च = न, भवेत्=हो, वा=अथवा, वधूसंयानम् = बहू को ले जानेवाली गाड़ी, तदभिगमनोपस्थितम्=उसे ले जाने के लिये आयी हुई, हो, वा=अथवा, प्रवरजनयोग्यम्=श्रेष्ठ लोगों के योग्य, बहिः=बाहर, नेतव्यम्=ले जाने योग्य, [ न भवेत्= न हो ] अथवा, विधिवशात् = भाग्यवश, विविक्तत्वात्=खाली होने से, मम=मेरे लिये, खलु=निश्चित रूप से, दैवविहितम्=विधि द्वारा भेजी हुई, भवेत्=हो ।।४।।
अर्थ—आर्यक— ( सुनकर ) यह गाड़ी इधर ही आ रही है—
यह बुरे लोगों द्वारा चढ़ी गई किसी उत्सवादि में जानेवाली गाड़ी न हो, अथवा बहू की गाड़ी उसे ले जाने के लिये आई हुई न हो, अथवा श्रेष्ठ व्यक्तियों के योग्य बाहर ले जानेवाली हो, अथवा भाग्यवश और किसी के न होने के कारण शून्य यह निश्चित ही परिजनादिरहित मेरे भाग्य से आई हुई हो ।। ४ ।।
टीका-—पुरोदृश्यमानं यानं विलोक्य विविधं संकल्पयति आर्यकः—भवेदिति । इदम्=पुरोविद्यमानम्, विषमम्=अनुचितं, शीलम्=स्वभावो येषां तादृशैः, दुर्जनैरित्यर्थः, अधिगतम् = आरूढम्, गोष्ठीयानम्=सभोत्सवादिवाहनम्, न च, भवेत्, सम्भावनायां लिङ्, वा=अथवा, वधूसंयानम्=वध्वाः पतिगृहादौ नयनाय वाहनम्, तस्या अभिगमनायोपस्थितम् भवेत्, अथवा, प्रवराणाम्=श्रेष्ठानां जनानां योग्यम्=अनुरूपम्, बहिः नेतव्यम्=बाह्यप्रदेशे नेतुं योग्यम्, भवेत्, विधिवशात्=भाग्यवशात्, विक्तित्वात्=परिजनादिरहितत्वात्, शून्यम्=रिक्तम्, आरोहणयोग्यमिति भावः, मम=आर्यकस्य, खलु=निश्चयेन, दैवविहितम्=विधिप्रेषितम्, भवेत् । अत्र सन्देहालंकार इति केचित् । शिखरिणी वृत्तम् ।। ४ ।।
**विमर्श—**सामने आती हुई गाड़ी को देखकर आर्यक अनेक संकल्प-विकल्प करता हुआ अपने लिये ही आयी हुई समझने लगता है । गोष्ठीयानम्=गोष्ठी में ले जानेवाली गाड़ी । विविक्तत्वात् शून्यम् = परिजन आदि किसी के न होने से खाली है; अतः मेरे बैठने योग्य है । यहाँ अनेक विकल्प होने से सन्देह नामक अलंकार है । शिखरिणी छन्द है ।। ४ ।।
शब्दार्थ-—अवस्थितम् = सामने खड़ी है, गणिकाप्रवहणम्=वेश्या की गाड़ी, बहिर्यानम्=बाहर जानेवाली, अधिरोहामि=चढ़ता हूँ, नस्यकटुकौ=नाक में नांथ=रस्सी पड़ी होने से तेज भागनेवाले, पादोत्फालचालितानाम्=पैरों को ऊपर उठाने के लिये चलाये = हिलाये गये, विश्रान्तः = बन्द हो गया, भाराक्रान्तम् = बोझा से भरी हुई ।
( इसके बाद प्रवहण=गाड़ी के साथ प्रवेश करके )