मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३८५
वर्द्धमानकश्चेटः—हीणामहे ! आणीदे मए जाणत्थलके । रदणिए ! णिवेदेहि अज्जआए वशन्तशेणाए 'अवत्थिदे शज्जे पवहणे अहिलुहिअ पुप्फकलण्डअं जिण्णुज्जाणं गच्छदु अज्जआ।' ( आश्चर्यम् ! आनीतं मया यानास्तरणम् । रदनिके ! निवेदय आर्यायै वसन्तसेनायै 'अवस्थितं सज्जं प्रवहणम्, अधिरुह्य पुष्पकरण्डकं जीर्णोद्यानं गच्छतु आर्या ।' )
आर्यकः—( आकर्ण्य । ) गणिकाप्रवहणमिदं बहिर्यानिञ्च । भवतु, अधिरोहामि । ( इति स्वैरमुपसर्पति । )
चेटः—( श्रुत्वा ) कथं णेउलशद्दे ? ता आअदा क्खु अज्जआ । अज्जए ! इमे णश्श-कडुआ वइल्ला, ता पिट्ठदो ज्जेव आलुहदु अज्जआ । ( कथं नूपुरशब्दः ? तदागता खलु आर्या । आर्ये ! इमौ नस्यकटुकौ बलीवर्दौ; तत् पृष्ठत एवारोहतु आर्या । )
( आर्यकस्तथा करोति )
चेटः—पादुप्फाल-चालिदाणं णेउलाणं वीशन्तो शद्दो, भलक्कन्ते अ पवहणे; तधा तक्केमि शम्पदं अज्जआए आलुढाए होदव्वं; ता गच्छामि । जाध गोणा ! जाध । ( पादोत्फालचालितानां नूपुराणां विश्रान्तः शब्दः । भाराक्रान्तं च प्रवहणम्, तथा तर्कयामि, साम्प्रतमार्यया आरूढया भवितव्यम्, तद्गच्छामि । यातं गावौ यातम् । ) ( इति परिक्रामति । )
अर्थ—वर्धमानक चेट—आश्चर्य है ! मैं गाड़ी का बिछावन ले आया हूँ । रदनिके ! वसन्तसेना से यह निवेदन कर दो—'सजी हुई गाड़ी तैयार खड़ी है उस पर चढ़कर आर्या पुष्पकरण्डक नामक जीर्णोद्यान के लिये प्रस्थान करें ।'
आर्यक—( सुनकर ) यह गणिका की गाड़ी है और बाहर जानेवाली है । अच्छा, चढ़ता हूँ । ( यह कहकर धीरे-धीरे पास जाता है । )
चेट—( सुनकर ) क्या नूपुरों की आवाज है ? इसलिये लगता है कि आर्या आ गईं । आर्ये ! नाक में नाथ (रस्सी) पड़ी होने से अधिक तेज भागनेवाले ये बैल हैं । इसलिये आप पीछे की ओर से ही गाड़ी पर चढ़िये ।
( आर्यक वैसा ही करता है अर्थात् पीछे से चढ़ता है । )
चेट—पैर ऊपर उठाने से हिले हुये नूपुरों की आवाज शान्त हो गई है । और गाड़ी बोझ से भर गई है, इसलिये यह अनुमान करता हूँ कि आर्या चढ़ चुकी होंगी, अतः अब चलूं । चलो, बैलों ! चलो । ( यह कहकर घूमता है । )
टीका—पृष्ठतः=पृष्ठभागादेव, पादयोः = चरणयोः, उत्फालनेन=आरोहणा-वसरे उन्नयनेन चालितानाम् = सञ्चालितानाम्, प्रकम्पितानाम्, शब्दः = ध्वनिः,
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