मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३७६ | मृच्छकटिकम्
( प्रविश्य प्रवहणाधिरूढः )
स्थावरकः चेटः--आणत्तोम्हि लाअ-शालअशण्ठाणेण-'थावलआ ! पवहणं गेण्हिअ पुप्फकलण्डअं जिण्णुज्जाणं तुलिदं आअच्छेहि' त्ति । भोदु, तहिं ज्जेव गच्छामि । वहध वइल्ला ! वहध । ( परिक्रम्यावलोक्य च । ) कधं गामशअलेहिं लुद्धे मग्गे । किं दाणि एत्थ कलइश्शं । ( साटोपम् ) अले ले ! ओशलध ओशलध । ( आकण्र्य ) किं भणाध-'एशे कश्श केलके पवहणे' त्ति । एशे लाअ-शालअ-शण्ठाणकेलके पवहणे त्ति । ता शिग्धं ओशलध । ( अवलोक्य । ) कधं एशे अवले शहिअं विअ मं पेक्खिअ शहश ज्जेव जूदपलाइदे विअ जूदिअले ओहालिअ अत्ताणं अण्णदो अवक्कन्ते ! ता को उण एशे ? अथवा किं मम एदिणा । तुलिदं गमिश्शं । अले ले गामेलुआ ! ओशलध ओशलध । किं भणाध-'मुहुत्तअं, चिट्ठ, चक्कपलिबट्टि देहि' त्ति । अले ले ! लाअशालअ-शष्टाण-केलके हग्गे शूले चक्केपलिबट्टि दइश्शं ? अथवा
शब्दार्थ--राजश्यालकसंस्थानेन=राजा के साले संस्थानक नामवाले के द्वारा, पुष्पकरण्डक=बगीचा-विशेष, वहतम् = दोनों चलो, ग्रामशकटैः = गांववालों की गाड़ियों से, अपसरत=अलग हटो, सभिकम्=प्रधान जुआड़ी, द्यूतपलायितः=जुये से हारकर भागा हुआ, अपवार्य=छिपा कर, अपक्रान्तः=निकल कर भाग गया, चक्र-परिवृत्तिम्=पहिये को घुमाने में सहारा, तपस्वी=असहाय, नेमीशब्दः=धुरी की आवाज, त्वरते=मिलने के लिये जल्दीबाजी कर रहा है, विश्राम्य=विश्राम करो, दक्षिणाक्षिस्पन्दम्=दाहिनी आँख का फड़कना, अधिरुह्य=चढ़कर, अनिमित्तम्=अपशकुन, प्रमार्जयिष्यति=दूर करेगा, अपसारिताः=हटा दिये, भारिकम्=वजन वाला, चक्रपरिवृत्तिकया=पहिया घुमाने में होनेवाले कष्ट के कारण, परिश्रान्तस्य=अधिक थक जानेवाले ।
( गाड़ी पर चढ़ा हुआ चेट प्रवेश करके )
अर्थ —स्थावरक-चेट—राजा के साले संस्थानक ने मुझे यह आज्ञा दी है—'स्थावरक ! गाड़ी लेकर पुष्पकरण्डक जीर्ण उद्यान में जल्दी से आ जाना।' अच्छा, वहीं चलता हूँ। अच्छा चलो बैलों ! चलो । ( घूम कर और देख कर ) क्या गाँव की गाड़ियों से रास्ता रुक गया ? अब यहाँ क्या करूँ ? (गर्व के साथ) अरे रे ! हटो,हटो । (सुनकर) क्या कह रहे हो-'यह किसकी गाड़ी है ? यह राजा के साले संस्थानक की गाड़ी है।' इसलिये जल्दी से हट जाओ । ( देखकर ) जुआ से भागे हुये जुआड़ी के समान यह दूसरा ( पुरुष ) जुआ खिलाने वाले ( प्रधान जुआरी ) के समान मुझे देखकर अपने को छिपा कर जल्दी से दूसरी ओर क्यों भाग गया ?