मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)
Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary
महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा
पृष्ठ 461, कुल 760 में से
संदर्भ में पढ़ेंषष्ठोऽङ्कः ३७३
वसन्तसेना—पिदुणो दे गुणणिज्जिदा दासी। (पितुस्ते गुणनिर्जिता दासी।)
रदनिका—जाद ! अज्जआ दे जणणी भोदि। (जात ! आर्या ते जननी भवति।)
दारकः—रदणिए ! अलिअं तुमं भणासि, जइ अम्हाणं अज्जआ जणणी, ता कीस अलङ्किदा ? (रदनिके ! अलीकं त्वं भणसि, यद्यस्माकमार्या जननी, तत् केन अलङ्कृता ?)
वसन्तसेना—जाद ! मुद्धेण मुहेण अतिकरुणं मन्तेसि। (नाट्येनाभरणान्यवतार्य रोदती।) एसा दाणिं दे जणणी संवृत्ता, ता गेण्ह एवं अलङ्कारं सोवण्ण-सअडिअं घड़ावेहि। (जात ! मुग्धेन मुखेन अतिकरुणं मन्त्रयसि।) (एषा इदानीं ते जननी संवृत्ता। तत् गृहाणैतमलङ्कारम्, सौवर्णशकटिकां घटय।)
दारकः—अवेहि, ण गेण्हिस्सं, रोदसिं तुमं। (अपेहि, न ग्रहीष्यामि, रोदिषि त्वम्।)
वसन्तसेना—(अश्रूणि प्रमृज्य) जाद ! ण रोदिस्सं गच्छ, कील। (अलङ्कारैर्मृच्छकटिकां पूरयित्वा) जाद ! कारेहि सोवण्णसअडिअं। (जात ! न रोदिष्यामि, गच्छ, क्रीड।) (जात ! कारय सौवर्णशकटिकाम्।)
(इति दारकमादाय निष्क्रान्ता रदनिका।)
वसन्तसेना—तुम्हारे पिता के गुणों से वश में की गयी दासी।
रदनिका—बेटा ! यह तुम्हारी माता लगती हैं।
बालक—रदनिके ! तुम झूठ बोलती हो, यदि आर्या हमारी जननी है, तो किसलिये सजी हुयी हैं ?
वसन्तसेना—बेटे ! भोले मुख से अति कठिन बात कह रहे हो। (अभिनय के साथ गहने उतार कर रोती हुई) लो, यह मैं अब तुम्हारी जननी बन गई। तो इन गहनों को ले लो, सोने की गाड़ी बनवा लो।
बालक—हट जाओ, नहीं लूंगा, तुम रो रही हो।
वसन्तसेना—(आंसू पोंछकर) बेटे ! नहीं रोऊँगी, जाओ, खेलो। बेटे ! सोने की गाड़ी बनवा लो।
(इस प्रकार बच्चे को लेकर रदनिका चली जाती है।)
टीका—दारकम्=बालकम्, सनिर्वेदम्=निर्वेदः=कष्टम्, तेन सह, सौवर्णशकटिकाम्=सुवर्णेन निर्मिता सौवर्णा, सा चासौ शकटिका=यानम्, सुवर्णव्यवहारः=हेम्नो व्यवहारः=प्रयोगः, अनलंकृतं शरीरं यस्य तादृशः=आभूषणशून्यदेहः, चन्द्रमुखः=चन्द्र-सदृशमुखः, अनुकृतम् = धृतम्, प्रतिवेशिगृहपतेः=प्रतिवेशिगृहस्वामिनः, शारकस्य=