भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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पृष्ठ 462
३७४मृच्छकटिकम्

( प्रविश्य प्रवहणाधिरूढः )

चेटः—रदणिए ! रदणिए ! णिवेदेहि अज्जआए वशन्तशेणाए—'ओहालिअं पक्खदुआलाए शज्जं पवहणं चिट्ठति ।' ( रदनिके ! रदनिके ! निवेदय आर्यायं वसन्तसेनायै—'अपवारितं पक्षद्वारके सज्जं प्रवहणम् तिष्ठति' । )

( प्रविश्य )

रदनिका—अज्जए ! एसो वड्ढमाणओ विष्णवेदि—'पक्खदुआरए


बालकस्य, सन्तप्यते=सन्तापमनुभवति, पुष्करपत्रे=कमलपत्रे, पतितः=निपतितो यो जलबिन्दुः, तेन सदृशः = समानः, पुरुषभागधेयैः=मनुष्यभाग्यैः, 'भागरूपनामभ्यो धेयः' इति स्वार्थे धेयप्रत्ययः, सास्त्रा=अश्रुसहिता, जननी भवति=जननी लगति, न तु वस्तुतः जन्मदात्रीति भावः, अतिकरुणम्=सकारुण्यम्, मन्त्रयसि=वदसि, अवतार्य=स्वशरीरात् पृथक्कृत्य, घटय=निर्मापय, अपेहि=दूरं याहि, मृच्छकटिकाम्=मृन्मयीं शकटिकामित्यर्थः ॥

विमर्श—इस प्रकरण के नाम का आधार यहीं की घटना है। मिट्टी की गाड़ी से न खेलने की जिद करनेवाले रोहसेन के साथ वसन्तसेना का व्यवहार अनुकरणीय है। वह गणिका केवल चारुदत्त के साथ वासनात्मक सम्बन्ध की ही भूखी नहीं है, वह उसके प्रत्येक सुख-दुःख की भागीदार बनना चाहती है। वह चारुदत्त के बालक की मार्मिक बात "यदि अस्माकमार्या जननी, तत् केन अलंकृता' सुनकर स्त्रीसुलभ करुणा से पिघल जाती है और तत्काल सभी आभूषण उतारकर बच्चे को सोने की गाड़ी बनाने के लिये दे देती है।

यद्यपि यह घटना अत्यल्पकालिक है तथापि वसन्तसेना के चरित्र को उत्कृष्टता के शिखर पर पहुँचाने के लिये पर्याप्त है।

शब्दार्थअपवारितम्=वस्त्रादि से ढकी हुई, प्रवहणम्=बैलगाड़ी, पक्षद्वारके=बगलवाले दरवाजे पर, सज्जम्=हर प्रकार की सुविधा से सजी हुई, प्रसाधयामि=सजा लूं, यानास्तरणम् = गाड़ी का बिछौना, नस्यरज्जुकटुका=नाक में पड़ी हुई रस्सी के कारण और तेज भागने वाले, गतागतिम् = आना-जाना। उपनय=ले आओ ।

( गाड़ी पर बैठा हुआ प्रवेश करके )

अर्थचेट—रदनिके ! रदनिके ! आर्या वसन्तसेना से यह निवेदन कर दो कि---'वस्त्र=पर्दे से ढकी हुई गाड़ी बगलवाले दरवाजे पर तैयार खड़ी है ।'

( प्रवेश करके )

रदनिका—आर्ये ! यह वर्धमानक सूचित कर रहा है कि—बगलवाले दरवाजे