भारतकोश
मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

मृच्छकटिकम् (सटीक संस्कृत नाटक)

Mricchakatikam with Sanskrit-Hindi Commentary

महाराज शूद्रक / पं. जयशंकर लाल त्रिपाठी द्वारा

DevanagariSanskritpublished760 पृष्ठ

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३८२ | मृच्छकटिकम्

तत् कुत्र गच्छामि मन्दभाग्यः ? (विलोक्य) इदं कस्यापि साधोरनावृतपक्षद्वारं गेहम्।

इदं गृहं भिन्नमदत्तदण्डो विशीर्णसन्धिश्च महाकपाटः।
ध्रुवं कुटुम्बी व्यसनाभिभूतां दशां प्रपन्नो मम तुल्यभाग्यः ॥ ३ ॥

प्राप्स्यतीति ज्ञात्वा न केनापि तद् वारयितुं शक्यते । तथापि=पूर्वस्थितौ सत्यामपि, नृपः=राजा, गम्यः=सर्वैः सेव्यः, भवतीति शेषः, यतो हि, बलवता=बलशालिना लोकेन सह, कः=कीदृशः, विरोधः=वैरम्, निर्बलस्येति शेषः । एवञ्च नाहं तेन सह शत्रुतामिच्छामीति तस्य भावः । अत्रोपमार्थान्तरन्यासावलंकारौ, वसन्ततिलका वृत्तम् ॥ २ ॥

विमर्श—आर्यक भाग्य की महिमा बताते हुये राजा पालक की आलोचना करता हुआ भी उससे वैर करने के पक्ष में नहीं है। इस श्लोक में उपमा और अर्थान्तरन्यास अलंकार हैं। वसन्ततिलका छन्द है ॥ २ ॥

शब्दार्थ—मन्दभाग्यः=अभागा, साधोः=सज्जन पुरुष का, अनावृतपक्षद्वारम्=खुले हुये बगल के दरवाजा वाला, गेहम्=घर ।

अर्थ—तो अब अभागा मैं कहाँ जाऊ ? (देखकर) यह किसी सज्जन पुरुष का घर है जिसका बगलवाला दरवाजा खुला हुआ है ।

टीका—मन्दभाग्यः=मन्दं भाग्यं यस्य सः, भाग्यहीन इत्यर्थः, साधोः=सज्जनस्य, पक्षस्य=पार्श्वस्य, द्वारम्=पक्षद्वारम्, अनावृतम्=उद्घाटितं पक्षद्वारं यस्य तत् गेहम्=गृहम् ।

अन्वयः—इदम्, गृहम्, भिन्नम्, अदत्तदण्डः, विशीर्णसन्धिः, महाकपाटः, च, अस्ति, (एतेन प्रतीयते यत्) मम, तुल्यभाग्यः, कुटुम्बी, ध्रुवम्, व्यसनाभिभूताम्, दशाम्, प्रपन्नः, [अस्ति] ॥ ३ ॥

शब्दार्थ—इदम्=यह, सामने दिखाई देनेवाला, गृहम्=घर, भिन्नम्=टूटा फूटा हुआ, च=और, अदत्तदण्डः=ब्योड़ा से शून्य, विशीर्णसन्धिः=खुले हुये जोड़ोंवाला, महाकपाटः=विशाल किवाड़ है, [अतः इससे, प्रतीयते=प्रतीत होता है, यत्=कि], मम=मेरे, तुल्यभाग्यः=समान भाग्यवाला, अभागा, कुटुम्बी=परिवारवाला, ध्रुवम्=निश्चित ही, व्यसनाभिभूताम् = परेशानियों से युक्त, दशाम्=दुर्दशा को, प्रपन्नः=प्राप्त हो चुका है ॥ ३ ॥

अर्थ—यह घर टूटा फूटा है। बिना ब्योड़ावाला, ढीले हुये जोड़ोंवाला विशाल किवाड़ है। [इससे यह प्रतीत होता है कि] मेरे समान भाग्यवाला अर्थात् अभागा यह परिवारवाला निश्चित ही दुःखों से युक्त दुर्दशा को प्राप्त हो चुका है ॥ ३ ॥

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